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Monday, April 25, 2011

शब्दों की सत्ता

-डॉ. अशोक प्रियरंजन

आवाज जगाती है अहसास
शब्द रच देते हैं
सपनों का नया संसार।

सपने जिंदगी के
सपने अपनों के
सपने सोती आंखों के
सपने जागती आंखों के।
सपनों केमूल में है
शब्दों की अनंत सत्ता।

शब्दों से ही आकार
लेता है ब्रह्म।

शब्दों से ही आकार लेती है जिंदगी
शब्दों संग चलती जिंदगी
शब्द बन जाते हैं अर्थवान
कर देते हैं जिंदगी को सार्थक
शब्द जब हो जाते हैं निरर्थक
जिंदगी में भर देते हैं मायूसी।

शब्द हो जाते हैं मौन
तब भी देते हैं नया अर्थ
जिंदगी के लिए।
( फोटो गूगल सर्च से साभार )

Friday, April 22, 2011

पति-पत्नी के झगड़ों में बच्चों को क्यों दे रहे मौत?

-डॉ. अशोक कुमार मिश्र
मौजूदा दौर में देश के अलग-अलग हिस्सों में ऐसी बहुत सी घटनाएं हो रही हैं जिनमें पति-पत्नी के झगड़ों में बच्चों को मौत मिल रही है। गृहकलह के चलते पहले बच्चों को मौत की नींद सुलाकर खुद भी आत्महत्या करने की घटनाएं किसी भी संवेदनशील मनुष्य को झकझोर जाती हैं। सहज ही मन में यह सवाल उठता है कि इन निर्दोष मासूम बच्चों का क्या कुसूर था? इन्हें क्यों जिंदगी शुरू होने से पहले ही मौत दे दी गई? चिंता की सबसे बड़ी बात यह है कि ऐसी घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं? संभवतया बच्चों की परवरिश कौन करेगा, जैसे सवालके चलते ही खुदकुशी से पहले बच्चों को मार डालने की घटनाएं हो रही हैं। पिछले एक हफ्ते में अगर यूपी में ही ऐसी चार घटनाएं हुई हैं तो संख्या निश्चित रूप से पूरे देश के लिए चौंकाने वाली है जिसकी ओर सभी का ध्यान जाना चाहिए। जरा इन घटनाओं पर गौर करें।
२२ अप्रैल को ऐसी ही दो घटनाएं हुईं। गाजीपुर जिले के सैदपुर इलाके में दहेज केे लिए प्रताडि़त किए जाने से तंग आकर एक विवाहिता ने अपने दो मासूम बच्चों के साथ ट्रेन के आगे कूदकर जान दे दी। मामला खानपुर थाना क्षेत्र के रामपुर गांव का है। यहां के निवासी युवक की शादी वर्ष २००६ में वाराणसी के चोलापुर थाना क्षेत्र स्थित नियार गांव की २४ वर्षीया रजनी के साथ हुई थी। शुक्रवार की सुबह रजनी अपने पुत्री खुशी (०३) और पुत्र युवराज (०१) के साथ सिंधौना आई और वाराणसी से औडि़हार जा रही एक यात्री ट्रेन के आगे कूद गई। तीनों की घटनास्थल पर ही मौत हो गई। हालांकि ससुराल वाले घटना की वजह मामूली पारिवारिक खटपट बता रहे थे, जबकि मृतका के मायके वालों का कहना था कि दहेज में मोटरसाइकिल लाने की मांग को लेकर रजनी को प्रताडि़त किया जा रहा था। इसी कारण वह दोनों बच्चों संग खुुदकुशी करने को मजबूर हुई। मृतका के पिता रामदुलार की ओर से दी गई तहरीर केआधार पर मृतका के पति तथा सास के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया गया है।
दूसरी घटना बहराइच जिले के तुलसीपुर इलाके की है। यहां शादी के 22 साल बाद एक व्यक्ति ने पहली पत्नी के रहते दूसरी शादी रचा ली। पहली पत्नी से छुटकारा पाने के लिए वह अक्सर उसे मारता पीटता। चार बच्चों की मां शकुंतला अपने पति की बेवफाई तो सहन कर गई लेकिन प्रताडऩा बर्दाश्त नहीं कर सकी। उसने पहले अपने बच्चों को जहर मिला कर भोजन खिलाया फिर बाद में वही भोजन खुद भी खा लिया। इलाज के दौरान शकुंतला व उसकी पुत्री उमा देवी (१२) की मौत हो गई। जबकि जबकि तीन बच्चों की हालत नाजुक बनी हुई है। रुपईडीहा पुलिस ने आरोपी पति रामचंदर मिश्रा और उसकी पत्नी ऊषा देवी को गिरफ्तार कर लिया है।
१६ अप्रैल को भी ऐसी ही दो घटनाएं हुईं। मेरठ जिले के परीक्षितगढ़ कसबे में एक महिला ने अपने दो मासूमों को फांसी पर लटका कर खुद भी फांसी लगा ली। गंधार गेट पर रहने वाले प्रवीण की बीवी कविता ने तीन साल के बेटे आदित्य और एक साल की बेटी भावना को छत के कुंडे पर लटका दिया। बाद में खुद भी पंखे से लटककर जान दे दी। पड़ोसियों ने कमरे का दरवाजा तोडक़र शवों को निकाला।
इसी दिन सीतापुर के तालगांव थाना क्षेत्र में पत्नी से विवाद के बाद एक युवक ने अपनी दो बेटियों के साथ शारदा सहायक नहर में छलांग लगा दी। तीनों नहर में बह गए। बहादुरापुर मजरा कल्याणपुर निवासी शमशाद (२५) पुत्र अख्तर अपनी पत्नी रोजनी, दो साल की बेटी सोनी व छह माह की बेटी मोनी के साथ बस से बिसवां जा रहा था। वह तालगांव क्षेत्र के जीतामऊ चौराहे पर बस से उतर गया। इस बीच शमशाद व उसकी पत्नी में किसी बात को लेकर विवाद हो गया। विवाद के बाद शमशाद की पत्नी वापस घर चली गई। इससे नाराज शमशाद ने अपनी दोनों बेटियों के साथ मोहम्मदीपुर गांव के पास नहर में छलांग लगा दी। बिसवां क्षेत्र में बड़ी बेटी सोनी की लाश बरामद हो गई है।
ये घटनाएं इस बात की ओर संकेत कर रही हैं कि पति-पत्नी की कलह के चलते न केवल परिवार बिखर रहे हैं बल्कि बहुत बड़ी संख्या में बच्चों को जिंदगी से मुंह मोडऩे को मजबूर कर दिया जाता है? यह और कोई नहीं करता बल्कि उनके माता-पिता ही कर रहे हैं। सवाल पैदा होता है कि क्या जन्म देने वाले को यह हक है कि वह मौत भी दे दे? यह भी एक बड़ा सवाल है कि कैसे ऐसी दर्दनाक घटनाओं को रोका जाए। इस गंभीर मुद्दे पर समाजशास्त्रियों को भी विचार करने की जरूरत है। किसी भी तरह से बढ़ती हुई ऐसी घटनाओं पर तुरंत रोक लगाना जरूरी है।
( फोटो गूगल सर्च से साभार )

Wednesday, April 20, 2011

रात में रोशन रहने का इतिहास रचता गांव

-डॉ. अशोक कुमार मिश्र
मेरठ जिले के सरधना क्षेत्र के गांव ईकड़ी ने एक नया इतिहास रच दिया है। इक्कीसवीं सदी में जिस देश के बहुत सारे गांव अभी भी विद्युतीकरण से वंचित हों, वहां ईकड़ी ऐसा गांव है जहां रात में बिजली जाने पर भी अब मुख्य मार्गों पर अंधेरा नहीं रहता है। रात में रोशन रहने के मायने में यह गांव देश के लिए मिसाल बनकर उभर रहा है। यूं तो मेरठ जिला कई चीजों केलिए मशहूर रहा है, कभी नौचंदी मेले के लिए, कभी कैंची तो कभी खेल के सामान केलिए। लेकिन पिछले कुछ समय से यह जिला अपराधों केलिए भी जाना जा रहा है। अपराधियों केलिए रात का अंधेरा वारदातों को अंजाम देने केलिए सबसे मुफीद समय होता है। गांवों में रात में बिजली न होने केकारण अपराधियों केहौसले बुलंद रहते हैं। वारदात के बाद अंधेरे का फायदा उठाकर अपराधी बेखौफ फरार हो जाते हैं। लेकिन ईकड़ी गांव में हुआ प्रयोग कामयाब रहा तो बदमाशों केलिए अब रात में वहां भागना मुश्किल होगा। इसकी वजह यह है कि गांव की स्ट्रीट लाइट बिजली गुल होने के बाद भी इन्वर्टर और बैटरी से जगमग रहेंगी। ईकड़ी शायद हिंदुस्तान का अकेला पहला ऐसा गांव है जहां स्ट्रीट लाइट केलिए इन्वर्टर और बैटरी का इंतजाम किया गया है। ग्राम प्रधान अंजना त्यागी ने फिलहाल मुख्य मार्गों पर तीन-तीन इमरजेंसी स्ट्रीट लाइटों के पांच सैट गांव में लगवाए हैं। अगर यह प्रयोग कामयाब रहा तो इनकी संख्या बढ़ा दी जाएगी। इससे गांव को एक फायदा यह भी होगा कि रात में ग्रामीणों को आवागमन में कोई परेशानी नहीं होगी। गांव के बाशिंदों में जहां सुरक्षा की भावना बढ़ेगी, वहीं उनकी जिंदगी की रफ्तार रात में भी सुस्त नहीं होगी। रोजमर्रा के कामकाज निपटाने में भी सहूलियत होगी। रात में पूरे गांव का हमेशा रोशन रहना और एक शानदार मिसाल बनकर उभरना दूसरे गांवों के लिए प्रेरणा का माध्यम बन सकता है।
( फोटो गूगल सर्च से साभार )

Sunday, April 10, 2011

भ्रष्टाचारी करें कीर्तन


-डॉ. अशोक प्रियरंजन

अन्ना ने जब त्यागा अन्न,
पूरा देश रह गया सन्न ।

जनता ने जो दिया समर्थन,
भ्रष्टाचारी करें कीर्तन।

सत्ता हिल गई, नेता हिल गए,
राजनीति के अभिनेता हिल गए।

जनमानस में भर गया जोश,
देशद्रोहियों के उड़ गए होश।

जागृति की अलख जगा दी
गांधीजी की याद दिला दी।

चलती रहें जो ऐसी तदबीर,
देश की फिर बदले तकदीर।

Wednesday, April 6, 2011

ऐसे चलते हैं हिंदी के संस्थान

-एक संवाददाता
केंद्रीय हिंदी संस्थन, आगरा जो इस वर्ष अपनी स्थापना के 50 वर्ष मना रहा है पिछले दो वर्ष से बिना निदेशक के है और अब भी इस पद पर नियुक्ति हो पाने के आसार नहीं हैं, क्यों ?
हिंदी की सरकारी संस्थाएं किस तरह से काम करती हैं और किस हद तक चमचों, दरबारियों और छुटभइयों का अभयारण्य बन गई हैं इसका उदाहरण केंद्रीय हिंदी संस्थान है जो इस वर्ष अपनी स्थापना के 50 वर्ष मना रहा है।
संस्थान में पिछले दो वर्ष से कोई स्थायी निदेशक नहीं है। इस बीच तीन बार निदेशक के पद के लिए विज्ञापन निकाला गया। पहली बार बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के सुधाकर सिंह का चुनाव भी हो चुका था पर बीच में ही मानव संसाधन विकास मंत्री के बदल जाने से सुधाकर सिंह की नियुक्ति इस तर्क पर नहीं हुई या होने दी गई कि वह अर्जुन सिंह के आदमी थे।
दूसरे व तीसरे विज्ञापन पर आये आवेदनों में चयन समिति को कोई ऐसा आदमी ही नहीं मिला जो इस पद के लायक हो। इसलिए केंन्द्रीय हिंदी संस्थान के वरिष्ठतम प्रोफेसर रामवीर सिंह को अस्थायी निदेशक बना दिया गया। ईमानदार रामवीर सिंह के लिए नये अध्यक्ष अशोक चक्रधर के चलते काम करना आसान नहीं हुआ (उदाहरण के लिए उनके फाइव स्टार होटलों के बिलों पर आपत्ति करना)। इसके अलावा यह भी कहा जाता है कि मंत्रालय के एक संयुक्त सचिव की भी यह कोशिश रही कि संस्थान में कोई निदेशक आए ही नहीं और वह सीधे-सीधे मंत्रालय से नियंत्रित होता रहे। जो भी हो, अंततः कपिल सिब्बल के छायानुवादक (?) और कांग्रेस के लिए चुनाव प्रचार सामग्री तैयार करने वाले अशोक चक्रधर में मंत्री से अपनी नददीकी के चलते रामवीर सिंह को हटवा दिया और उनकी जगह तात्कालिक कार्यभार के. बिजय कुमार को सौंप दिया।
बिजय कुमार की हालत यह है कि वह पहले ही दो संस्थानों को संभाले हुए हैं। वैज्ञानिक तथा तकनीकी आयोग के अध्यक्ष के अलावा वह केंद्रीय हिंदी निदेशालय, दिल्ली के निदेशक का अतिरिक्त भार भी संभाले हुए हैं। मजे की बात यह है कि वह हिंदी के आदमी ही नहीं है और पहले ही अपने काम से बेजार और रिटायरमेंट के कगार पर हैं। सवाल यह है कि जब नये निदेशक का चुनाव होने ही वाला था तो फिर रामवीर सिंह को क्यों हटाया गया ? (क्या इसलिए भी कि वह अनुसूचित जनजाति के हैं ?) साफ है कि उपाध्यक्ष महोदय किसी ऐसे ही आदमी की तलाश में थे जिसकी और जो हो, हिंदी में कोई रूचि न हो। बिजय कुमार से बेहतर ऐसा आदमी कौन हो सकता था जो उपाध्यक्ष के मनोनुकूल निदेशक की नियुक्ति तक इस पद की पहरेदारी कर सके। इससे यह बात फिर से साफ हो जाती है कि सरकार हिंदी और हिंदी की संस्थाओं के लिए कितना चिंतित है। एक आदमी जिसे एक संस्था का चलाना ही कठिन हो रहा हो, उस पर तीन संस्थाओं को थोपना सरकार की मंशा को स्पष्ट कर देता है। स्पष्ट है कि वृहत्तर हिंदी समाज की बात तो छोड़िये, हिंदी के बुद्विजीवियों को भी इससे कोई लेना-देना नहीं है। इसलिए यह अचानक नहीं है कि हिंदी की संस्थाओं पर मीडयाकरों का पूरी तरह कब्जा हो चुका है। इस संस्थाओं में हो क्या रहा है, इनकी क्या उपयोगिता है, यह सवाल शायद ही कभी पूछे जाते हों। जहां तक बुढा़पे में कवि बने कपिल सिब्बल का सवाल है उनकी रूचि हिंदी व उसकी संस्थाओं में तब हो जब उन्हें 2 जी स्पेक्ट्रम और अपने हमपेशेवर वकील अरूण जेटली से वाक्युद्ध करने से फुर्सत मिले। वैसे 2 जी स्पैक्ट्रम है तो दुधारी गाय पर फिलहाल इसकी हड्डी सरकार के गले में फंसी हुई है।
पर असली किस्सा है संस्थान के नये निदेशक की नियुक्ति को लेकर। गत जनवरी में इस पद के लिए पहला विज्ञापन निकाला गया था। 15 जून, 2010 को तीन सदस्यों की सर्च कमेटी, जिसमें श्याम सिंह शशि (प्रकाशन विभाग प्रसिद्धि के), नासिरा शर्मा और रहमतुल्ला थे, मीटिंग हुई। पर किसी उम्मीदवार को उपयुक्त नही पाया गया। अक्टूबर के अंतिम सप्ताह में दोबारा से इस पद के लिए संशोधित विज्ञापन निकाला। इस में पीएच0डी0 आदि के अलावा, जो अनिवार्य योग्यताएं मांगी गई थी उनमेंः - प्रसिद्ध पत्रिकाओं में प्रकाशित कार्य और पुस्तकों के लेखन में प्रमाण के रूप में प्रकाशित कार्य - प्रशासनिक अनुभव के तौर पर: संकायाध्यक्ष/ स्नातकोत्तर काॅलेज के प्रिंसिपल/ विश्वविद्यालय का रेक्टर/पीवीसी/कुलपति/विश्वविद्यालय विभाग के अध्यक्ष के रूप में पांच वर्ष का प्रशासनिक अनुभव।
आवेदन आए। उसी पुरानी सर्च कमेटी की मीटिंग 21 फरवरी को रखी गई। कहा जाता है कि उपाध्यक्ष महोदय की रूचि अपने एक निकट के व्यक्ति/संबंधी की नियुक्त करने में थी। पर जिस व्यक्ति को अंततः चुना गया, वह थे दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के पद पर काम कर रहे मोहन (शर्मा) नाम के सज्जन, जो छह वर्ष पूर्व अचानक बर्धवान से सीधे दिल्ली में प्रकट हुए थे। मंत्रालय को भेजे गए एक गुमनाम पत्र मंे आरोप है कि इन्होंने दिल्ली में नौकरी पाने के लिए सीपीएम के दरवाजे खटखटाए थे। इस बार बतलाया जा रहा है कि इनकी सिफारिश ठोस कांग्रेस खेमे से सीधे हैदराबाद से होती हुई राज्य मंत्री की ओर से थी। जो भी हो फिलहाल जिन मोहन जी का चुनाव किया गया था वह चूंकि उपाध्यक्ष और दिल्ली विश्वविद्यालय के आचार्यो की विख्यात टोली के निकट थे और उनका लचीलापन अब तक जग जाहिर है, इसलिए उपाध्यक्ष को उन्हें स्वीकार करने में कोई दिक्कत नहीं हुई। मंत्रालय को भेजे गए इस गुमनाम पत्र लेखक ने मोहन जी की विशेषता कुछ इस प्रकार बतलाई है कि यह ‘‘प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में लेखन के कारण या किसी प्रतिष्ठित लेखक के रूप में भी नहीं जाने जाते हैं।‘‘ बल्कि ‘‘इनको दिल्ली विश्वविद्यालय में ंिहंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष (यानी सुधीश पचैरी) के क्लर्क के रूप में जाना जाता है।‘‘ साफ है कि जो आदमी जुगाड़ का ही माहिर हो और दिल्ली -कोलकाता-हैदराबाद को चुटकियों में साध सकता हो, उस बेचारे के पास लिखने-पढने की फुर्सत ही कहां होगी। फिर पढ़ने से हिंदी में होने वाला भी क्या है, यहां तो जो होता है वह जुगाड़ से ही तो होता है। वह स्वयं इसके साक्षात उदाहरण हैं ही।
पर इस आदमी को चुनने के लिए जो तरीके अपनाए गए वे अपने आप में खासे आपत्तिजनक थे। उदाहरण के लिए सबसे पहले तो सर्च कमेटी की सदस्य नासिरा शर्मा को, जो अपने स्वतंत्र व्यक्तित्व व निर्णयों के लिए जानी जाती हैं, कमेटी की मीटिंग की जानकारी ही नहीं दी गई। जब उन्हें यह बात पता चली तो इस वर्ष 22 फरवरी को उन्होंने एक पत्र मंत्रालय में संबंधित संयुक्त सचिव को यह जानने के लिए लिखा कि क्या जिस सर्च कमेटी में मेरा नाम है उसकी मीटिंग 15 फरवरी को हो चुकी हैं ? इसके बाद 27 फरवरी को नासिरा जी ने दूसरा पत्र मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल को अपना विरोध प्रकट करते हुए पत्र लिख दिया।
इस पर संस्थान ने तर्क दिया कि हमने तो नासिरा जी को पत्र लिखा था अगर उन्हें नहीं मिला तो हम क्या कर सकते हैं। यह गैरजिम्मेदाराना हरकत की इंतहा है। इस पर संबंधित अधिकारी को निलंबित किया जा सकता है। सरकार का इस संबंध में नियम यह है कि तब तक किसी भी सर्च कमेटी की बैठक नहीं की जा सकती जब तक कि उसके सभी सदस्यों को यथा समय सूचित कर उनकी सहमति नहीं ले ली जाती। अगर कोई सदस्य नहीं आना चाहता, यह भी उससे लिखित में लेने के बाद ही, उसके बगैर कमेटी की मीटिंग हो सकती है। नासिरा जी दिल्ली में ही रहती हैं। आखिर ऐसा क्या था कि उन्हें हाथों-हाथ मीटिंग के बारे में सूचित न किया जा सकता हो ? साफ है कि विभाग की मंशाही कुछ और थी और यह जानबूझ कर किया गया था।
जहां तक उपाध्यक्ष का सवाल है वह सारे मामले को स्वर्ण जयंती का बहाना बना कर अपनी ओर से आनन-फानन में निपटा, फरवरी में ही हिंदी का प्रचार करने अपनी टोली के साथ इंग्लैण्ड चले गए थे। फाइल मंत्री महोदय के पास पहुंच भी गई। पर तब तक नासिरा शर्मा का पत्र मंत्री महोदय को मिलने के अलावा विभिन्न अखबारांे में भी छप गया। इस पर मंत्री ने उस फाइल को कैबिनेट कमेटी के पास स्वीकृति लेने के लिए नहीं भेजा। पर इस बीच मधु भारद्वाज नाम की एक उम्मीदवार ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर दी। इसमें आरोप है कि संस्थान ने अपने विज्ञापन मंे हिंदी की एक संस्था के निदेशक के पद के लिए हिंदी एम0एक ही शैक्षणिक योग्यता ही नहीं मांगी। इसके कारण कई लोग आवेदन ही नहीं कर पाए। उनका कहना है कि यह जानबूझ कर भ्रम फैलाने के किया गया, क्योंकि मंत्रालय ने किसे लेना इस बाबत पहले से ही मन बना लिया था। कोर्ट ने मंत्रालय से चार सप्ताह के अंदर जवाब मांगा है।
इसी का नतीजा है कि केंद्रीय हिंदी संस्थान के स्वर्ण जयंती कार्यक्रम के निमंत्रण पत्र में, निदेशक के तौर पर के, बिजय कुमार का नाम छपा था। यानी मंत्री उस फाइल को आगे नहीं बढ़ा पाए हैं। देखना होगा कि क्या इस बार भी निदेशक की नियुक्ति हो पाएगी ?
फिलहाल हिंदी संस्थान आगरा को लेकर दो समाचार हैं। पहला, इसके स्वर्ण जयंती कार्यक्रमों की शुरूआत 28 मार्च से, आगरा में नहीं, दिल्ली में हो गई है। पर जैसा कि निमंत्रण पत्र में लिखा था यह सिब्बल के करकमलों से नही हो पाया है। संस्थान ने मंत्री महोदय के लिए सुबह साढ़े दस के समय को दस भी किया पर मंत्री महोदय ने न आना था न आए। यह दूसरी बार है जबकि मानव संसाधन विकास मंत्री ने संस्थान को ऐन वक्त पर गच्चा दिया था। नृत्यांगना राज्य मंत्री डी पुरंदेश्वरी ने भी हिन्दी को इस लायक नहीं समझा की दर्शन देतीं। इन लोगों की नजरों में हिंदी संस्थानों का महत्व अपने नाकारा लगुवे को चिपका सकने की जगहों से ज्यादा कुछ है भी नहीं।
दूसरा समाचार, जो जरा पुराना है, अशोक चक्रधर को मंत्री की सेवा करने के कारण उचित पुरस्कार मिल गया है। वह अगले तीन वर्ष के लिए उपध्यक्ष बना दिए गए हैं। पिछला एक वर्ष वह था जो रामशरण जोशी ने नये मंत्री के आ जाने के कारण नैतिक आधार पर छोड़ दिया था। कौन पूछने वाला है कि चक्रधर ने पिछले एक साल में केंद्रीय हिंदी संस्थान में पांच सितारा होटलों में ठहरने के अलावा क्या किया ? महत्वपूर्ण यह है कि उन्होंने सिब्बल को साधा और छायानुवाद की ‘जय हो‘ विधा को फिर से पुनर्जीवित किया।
(समयांतर के अप्रैल २०११ के अंक से साभार)

Monday, March 14, 2011

ब्लाग पर शोध और ब्लागरों को एकजुट करने को भी हो पुरस्कार

-डॉ. अशोक कुमार मिश्र
ब्लाग के संदर्भ में इधर एक अच्छी बात हुई है कि इसके विकास में बेहतर योगदान देने वालों को पुरस्कृत भी किया जाने लगा है। इस बहाने लोगों को प्रोत्साहित करके ब्लाग की लोकप्रियता और महत्ता बढ़ाई जा सकती है। एक बार मशहूर साहित्यकार गिरिराज किशोर से मैने पूछा था पुरस्कारों की क्या महत्ता है? उन्होंने जवाब दिया जैसे लोग चले जा रहे हों और हम किसी पर टार्च से रोशनी डाल दें। पुरस्कृत करके ब्लागरों की रचनाधर्मिता को आलोकित करने के प्रयासों की निसंदेह प्रशंसा की जानी चाहिए और इसे किस तरह बेहतर बनाया जा सकता है, इस पर भी मंथन चलते रहना चाहिए। ब्लागरों के सम्मेलन हो रहे हैं, पुरस्कार वितरित किए जा रहे हैं, इससे कई नई संभवनाएं जागृत हो रही हैं।
कोई भी सृजनशीलता तब महत्वपूर्ण हो जाती है जब नई पीढ़ी उसके विषय में पढ़े और वह रोजगार से जुड़ जाए। इसीलिए विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में जो विषय शामिल हैं, वह सहजता से लोकप्रिय हो जाते हैं। कई नए क्षेत्रों में शोधकार्य भी चलते रहते हैं। ब्लाग पर भी पिछले वर्ष कई शोधपत्र लिखे गए जिनका प्रकाशन भी हुआ। इसका परिणाम यह हुआ कि जनसंचार के कुछ पाठ्यक्रमों में ब्लाग को जनसंचार के नए माध्यम के रूप में पढ़ाया जाने लगा। ब्लाग पर शोधकार्य होने से इसकी महत्ता में श्रीवृद्धि भी हुई है। इस कार्य और परंपरा को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए लेकिन ब्लाग से जुड़े पुरस्कारों की सूची में शोधकार्य को पुरस्कृत करने की ओर ध्यान नहीं गया है।
इसी तरह ऐसे लोग जिन्होंने ब्लागरों को एकजुट किया, विचार मंथन के लिए मंच प्रदान किया और उसकी गरिमा बढ़ाई, उन्हें भी पुरस्कृत किया जाना चाहिए। यह अलग बात है कि उन्होंने यह कार्य किसी पुरस्कार के लिए नहीं किया। ब्लाग के प्रति समर्पण भाव ही उनके कार्य के पीछे था लेकिन उन्हें पुरस्कृत करकेउनके काम को रेखांकित किया जाना चाहिए।
(फोटो गूगल सर्च से साभार)

Sunday, March 6, 2011

पढऩे का घटता संस्कार, नई पीढ़ी का बड़ा संकट

- डॉ. अशोक कुमार मिश्र
मौजूदा दौर में नई पीढ़ी में पढऩे का संस्कार चिंताजनक स्थिति से घटता जा रहा है। पाठ्यक्रम से इतर किताबें पढऩे की प्रवृत्ति देश के भावी कर्णधारों में नहीं दिखाई देती। यही वजह है कि अब अभिभावक भी साहित्यिक पुस्तकों की खरीदारी को अपने महीने के बजट में शामिल नहीं करते। जो लोग बजट में किताबों को रखते भी हैं, वे कई बार आर्थिक दबाव बढऩे पर सबसे पहले पुस्तकों की खरीद में ही कटौती कर देते हैं। एक संकट यह भी है कि कई बार अच्छी पुस्तकें इतने महंगे दामों पर मिलती हैं कि उन्हें खरीदने में ही पसीने आने लगते हैं। पहले घरों में लोग पुस्तकालय बनाया करते थे जो अब घटते जा रहे हैं। इन सब बातों के चलते ही केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ने पांचवीं से बारहवीं तक की कक्षाओं के लिए पाठ्यपुस्तकों से इतर पुस्तकों को भी पढ़ाने की सलाह दी है। इसके लिए सीबीएसई ने स्कूलों को पाठ्य सामग्री के रूप में पुरस्कार प्राप्त पुस्तकों की सूची भेजी है। बोर्ड की ओर से स्कूलों को फरमान दिया गया है कि फॉर्मेटिव मूल्यांकन करने के लिए रीडिंग प्रोजेक्ट्स का भी सहारा ले सकते हैं। बोर्ड का मानना है कि बच्चों को पाठ्यपुस्तकों के अलावा भी जानकारी दी जानी चाहिए जिससे कि उनका समग्र विकास हो सके। इसके लिए बोर्ड ने एसोसिएशन ऑफ राइटरस एंड इलिस्ट्रेटर के सहयोग से भारतीय लेखकों की ऐसी पुस्तकों की सूची तैयार की है। इस रीडिंग मैटीरियल में शामिल की गई पुस्तकों में साइंस फिक्शन, हिस्टोरिक्ल फिक्शन, मिस्ट्री, वास्तविक घटनाओं की कहानियां, प्ले, पर्यावरण आधारित पुस्तकों को शामिल किया गया है। प्रधानाचार्यों को दिए गए निर्देश में कहा गया है कि लाइब्रेरी में ही ऐसे संसाधन उपलब्ध कराएं जाएं जिससे बच्चे में स्वंय पढऩे की भावना जागृत हो। बच्चों को लाइब्रेरी जाने के लिए भी प्रोत्साहित किया जाए। पाठ्येत्तर पुस्तक पढऩे की रुचि जागृत करने केलिए जरूरी है कि दूसरे बोर्ड भी इस तरह की पहल करें और अभिभावक भी शब्दों के संसार से बालकों को रूबरू कराने की ओर ध्यान दें।
(फोटो गूगल सर्च से साभार)

Monday, January 17, 2011

विश्वविद्यालयों में बहने लगी ब्लाग की बयार

डॉ. अशोक कुमार मिश्र
पिछले दो वर्षों के दौरान ब्लाग को अकादमिक क्षेत्रों में जिस गंभीरता से लिया जा रहा है, वह हिंदी ब्लागिंग के लिए नई संभावनाओं के द्वार खोलने में समर्थ है। पहले इलाहाबाद में ब्लागर सम्मेलन, वर्धा में ब्लागिंग की आचार संहिता पर राष्ट्रीय संगोष्ठी, दिल्ली ब्लागर मीट, खटीमा में ब्लागर संगोष्ठी, इंदौर की गायत्री शर्मा और धर्मशाला के केवलराम का हिंदी ब्लाग पर पीएचडी की उपाधि केलिए शोध करना इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि हिंदी ब्लाग अब इस स्थिति में पहुंच चुका है कि उस पर शोध कर निष्कर्ष निकाले जाएं ताकि भविष्य की दिशा और संभावनाएं रेखांकित की जा सकें। खुद मैने महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय विश्वविद्यालय, वर्धा, महाराष्ट्र में ०९-१० अक्टूबर को आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में ब्लागरी में नैतिकता का प्रश्न और आचार संहिता की परिकल्पना, हरियाणा के पलवल स्थित गोस्वामी गणेशदत्त सनातन धर्म स्नातकोत्तर महाविद्यालय, में २२-२३ अक्टूबर को आयोजित राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी में ब्लाग का विधायी स्वरूप और उसकी भाषा संरचना, मुरादादाबाद स्थित महाराजा हरिश्चंद्र कॉलेज में १४-१५ नवंबर को आयोजित राष्टï्रीय हिंदी संगोष्ठी में सूचना तकनीक और हिंदी पत्रकारिता विषय पर शोधपत्र प्रस्तुत किया जिसमें ब्लाग पर वैचारिक मंथन किया गया। इसके साथ ही ब्लाग पर दो अन्य शोधपत्र मैने लिखे जो यमुनानगर और दिल्ली में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय संगोष्ठी में प्रस्तुत किए जाने हैं। इसी हफ्ते मुझे सूचना मिली कि कल्याण में अगले माह ब्लाग पर राष्ट्रीय संगोष्ठी होने जा रही है। विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में बह रही ब्लाग की बयार उम्मीदों के नए झोंके लेकर आएगी, ऐसा विश्वास है। रोजाना हिंदी चिट्ठे बढ़ रहे हैं, यह भी सुखद संकेत हैं। ब्लाग पर प्रस्तुत लेखन में गुणवत्ता का समावेश करना समय की सबसे बड़ी चुनौती है।
इस बीच ब्लागवाणी और चिट्ठाजगत जैसे एग्रीगेटरों का बंद होना कुछ चिंतित करता है। एग्रीगेटर ब्लाग के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और वजह चाहे कुछ भी हो लेकिन इनका बंद होना तकलीफदेह है। ब्लाग को बेहतर और बहुआयामी बनाने की दिशा में काम किया जाना चाहिए तभी इसकी सार्थकता है।

Wednesday, January 12, 2011

तीन घंटे की रिपोर्टिंग में कैसे हो सच का संधान

-डॉ. अशोक प्रियरंजन
अखबारों में बदली कार्यप्रणाली के चलते सच की खोजबीन का काम बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। अखबार का बुनियादी काम सच को सामने लाने का है और इस काम को अंजाम देते हैं अखबार के रिपोर्टर। अब से करीब २० साल पहले रिपोर्टरों के पास मोबाइल नहीं थे। लैंडलाइन फोन भी चुनींदा रिपोर्टर के पास होते थे। इस कारण मौके पर जाक र रिपोर्टिंग करना उनकी मजबूरी होती थी। उस समय सुबह को अखबारों केदफ्तरों में मीटिंग की भी परंपरा नहीं थी। नतीजा यह कि संवाददाता मीटिंग के दबाव से मुक्त होकर समाचार तलाशने के दबाव में रहता था। इस कारण उसे अधिक समय फील्ड में बिताना पड़ता था और फिर इसका नतीजा यह होता था कि कुछ बेहतर खबरें उसके हाथ लग जाती थीं। यहीं वह खबरें होती थीं जो प्रिंट मीडिया को पहचान देती थीं। यह मिशनरी से व्यावसायिक पत्रकारिता की शुरुआत का दौर था।
अब मिशनरी भाव से मुक्त होकर पत्रकारिता पूरी तरह व्यावसायिक चोला अख्तियार कर चुकी है। इस दौरान कर कई बार पिं्रट मीडिया से जुड़े लोग शिकायत करते हैं कि अब अखबारनवीसी में सिर्फ रुटीन की खबरें हो कवर हो पाती हैं। अब संवाददाता धमाकेदार खबरें कम जुटा पाते हैं। पुराने पत्रकार अपनी समकालीन खबरों के उदाहरण अक्सर नए पत्रकारों को देते हैं। दरअसल, इसके लिए कुछ बदलाव भी जिम्मेदार है। पत्रकारिता के व्यवसाय बनने से पत्रकारों की कार्यप्रणाली भी प्रभावित हुई है। अब सुबह को रिपोर्टरों का सबसे पहला काम रिपोर्टिंग टीम की मीटिंग में शामिल होना होता है। यह मीटिंग आम तौर पर १०-११ बजे शुरू होती हैं और कम से कम एक घंटा चलती हैं। दोपहर तक मीटिंग में शामिल होने के कारण संवाददाता इस अवधि में होने वाले कार्यक्रमों में शामिल नहीं हो पाते। सबसे ज्यादा इस दौरान स्कूलों और धार्मिक स्थलों पर कार्यक्रम होते हैं। यह तमाम कार्यक्रम विज्ञप्ति के आधार पर ही प्रकाशित हो पाते हैं। दोपहर बाद करीब एक घंटे का समय संवाददाता को मिल पाता है। इसके बाद वह भोजन करने जाते हैं। फिर पांच बजे तक आफिस पहुंचने से पहले के दो घंटे उन्हें रिपोर्टिंग के लिए मिल पाते हैं। पूरे दिन में कुल जमा तीन घंटे की रिपोर्टिंग में कैसे सत्य के संधान किया जाए, यह यक्ष प्रश्न है।
एक संकट और है, कई बार संवाददाता बैठक में शामिल होने को ही अपने काम की इतिश्री मान लेते हैं। उन पर बैठक में शामिल होने का अधिक दबाव होता है, खबरों को लेकर कम। फील्ड में जाने की रही-सही कसर मोबाइल ने पूरी कर दी है। यही कारण है कि अखबारों में धारदार खबरें घटती जा रही हैं। उनमें तथ्यों से उपजे वह तेवर नहीं होते जो पाठकों को अधिक देर तक अखबार से बांधे रह सके। यही वजह है कि अखबार पढऩे का औसत समय घटकर सात मिनट पर आ गया है। इससे सबक लेना प्रिंट मीडिया की जरूरत है।

Tuesday, November 16, 2010

ब्लाग ने आम आदमी को भी बना दिया ताकतवर पत्रकार

-डॉ. अशोक कुमार मिश्र
महाराजा हश्चिंद्र स्नातकोत्तर महाविद्यालय मुरादाबाद में १४-१५ नवंबर को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से संपोषित राष्ट्रीय हिंदी संगोष्ठी में डॉ. अशोक कुमार मिश्र ने सूचना तकनीक और हिंदी पत्रकारिता विषय पर शोधपत्र प्रस्तुत किया। शोधपत्र में उन्होंने इस तथ्य को भी स्थापित किया कि सूचना तकनीक की देन ब्लाग ने आम आदमी को पत्रकारिता की ताकत दे दी है। उन्होंने कहा कि आधुनिक युग में सूचना तकनीक ने हिंदी पत्रकारिता को बहुत गहराई से प्रभावित करते हुए जनसंचार माध्यमों के विकास में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। डॉ. मिश्र ने संगोष्ठी में कहा विज्ञान, कला और शिल्प से संवारा गया मीडिया का आधुनिक वैश्विक चेहरा न केवल जनता को लुभा रहा है बल्कि उसके लिए बहुउपयोगी बनकर जीवन व्यवहार में कई प्रकार के परिवर्तनों का कारक बन गया है। उन्होंने कहा कि सूचना तकनीक के उन्नत उपकरणों के कारण जनसंचार माध्यमों से समाचार तीव्र गति से बड़े आकर्षक कलेवर में जनता तक पहुंच जाते हैं। सूचना तकनीक ने न केवल समाचार संकलन, प्रेषण बल्कि उनके प्रस्तुतीकरण में भी सकारात्मक क्रांतिकारी परिवर्तन कर दिया है। केवल कलम केसहारे पत्रकारिता करने वाले पत्रकारों के स्थान पर अब सूचना तकनीक से लैस ऐसे संवाददाताओं का वर्चस्व है जो लैपटॉप, मोबाइल और इंटरनेट का भरपूर प्रयोग करते हुए दूरस्थ स्थलों से भी बहुत शीघ्रता से समाचार जनता को उपलब्ध करा देते हैं। पहले जहां पत्रकारिता के रूप में मुद्रित माध्यम की देन समाचार पत्र और पत्रिकाएं ही थीं वहीं आज सूचना तकनीक के चलते टेलीविजन, रेडियो, इंटरनेट, मोबाइल औ वीडियो मैगजीन भी उलब्ध हैं जिन्होंने हिंदी पत्रकारिता को अत्यंत विश्वसनीय, तीव्रगामी, उपयोगी और वैश्विक बना दिया है। आधुनिक युग में व्यक्ति चाहे शिक्षित हो अथवा अनपढ़, शहर में हो अथवा सुदूर ग्रामीण अंचल में, वह सूचनाओं से वंचित नहीं है। सूचना के विस्फोट से अब कोई आदमी अछूता नहीं है। यह अलग बात है कि इसके कुछ नकारात्मक पक्ष भी हैं। इस राष्ट्रीय गोष्ठी के संयोजक डॉ. मुकेश चंद्र गुप्ता रहे।
(फोटो गूगल सर्च से साभार)

Sunday, October 31, 2010

पलवल में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में ब्लाग पर शोधपत्र

-डॉ. अशोक कुमार मिश्र
हिंदी नवलेखन की विधाओं को विस्तार देने में ब्लाग एक महत्वपूर्ण मंच की भूमिका निभा रहा है। इसीलिए अकादमिक क्षेत्र में ब्लाग को गंभीरता से लिया जा रहा है। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा में ०९-१० अक्टूबर को ब्लागिंग की आचार संहिता विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इसमें ब्लाग के विविध पक्षों पर गंभीरता से मंथन किया गया। इसके बाद २२-२३ अक्टूबर को हरियाणा के पलवल स्थित गोस्वामी गणेश दत्त सनातन धर्म महाविद्यालय में बाजारवाद और आधुनिक हिंदी साहित्य विषय पर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से संपोषित राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गई। गोष्ठी में हिंदी में नवलेखन के संदर्भ में ब्लाग पर भी वैचारिक विश्लेषण किया गया। इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में मेरठ के डॉ. अशोक कुमार मिश्र ने ब्लाग का विधायी स्वरूप और उसकी भाषा संरचना विषय पर शोधपत्र प्रस्तुत किया। शोधपत्र में ब्लाग की प्रविधि केसंदर्भ में ब्लाग बनाने की सुविधा देने वाली वेबसाइट, एग्रीगेटर, यूनीकोड आदि के विषय में जानकारी देते हुए तथ्यपरक ढंग से स्थापित किया कि विगत कुछ वर्षों के मध्य ही विकसित हुई अंतर्जाल की इस आभासी दुनिया में आज नित नई साहित्यिक कृतियों का सृजन हो रहा है। ब्लाग पर रोजना समसामयिक विषयों पर आधारित विचारपूर्ण आलेख, कविताएं, कहानियां, लघुकथाएं, सूचनापरक रिपोर्ट, यात्रावृतांत, संस्मरण आदि लिखे जा रहे हैं। साहित्य की कोई विधा ऐसी नहीं है, जो ब्लाग के माध्यम से समृद्ध नहीं हो रही है। ब्लाग की भाषा संरचना के विषय में शोधपत्र में बताया गया कि परंपरागत साहित्यिक भाषा के स्थान पर जनभाषा की प्रकृति को धारण किए हुए चिट्ठों में दूसरी भाषाओं केशब्दों को आत्मसात करने की अद्भुत क्षमता दिखाई देती है। यही कारण है कि ब्लाग की भाषा में प्रयुक्त हो रही नित नवीन शब्दावली हिंदी भाषा और साहित्य को समृद्ध कर रही है। संयोजक डॉ. केशवदेव शर्मा ने संगोष्ठी का संचालन किया।
(फोटो गूगल सर्च से साभार)

Sunday, October 24, 2010

ब्लाग में आचार संहिता नहीं, स्वअनुशासन होना चाहिए



-डॉ. अशोक कुमार मिश्र
महाराष्ट्र के वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में ०९-१० अक्टूबर को ब्लागिंग की आचार संहिता विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी कई मायनों में बड़ी महत्वपूर्ण रही। आज जब पूरी दुनिया में साहित्यिक और पत्रकारिता संबंधी विधाओं के उन्नयन में ब्लाग एक महत्वपूर्ण मंच की भूमिका निभा रहा है, तो यह जरूरी हो जाता है कि उस पर प्रकाशित सामग्री का विविधि दृष्टिकोण से विश्लेषण किया जाए। संगोष्ठी के संयोजक विश्वविद्यालय केआंतरिक सम्परीक्षा अधिकारी सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी ने इस महत्वपूर्ण पक्ष को समझकर वर्धा में ब्लागरों को एकजुट किया। इस सम्मेलन के माध्यम से कई सवाल उठे और उनके जवाब तलाशे गए। संगोष्ठी का प्रारंभ करते हुए श्री त्रिपाठी ने ब्लाग की महत्ता को रेखांकित करते हुए इसकी संभावनाओं पर प्रकाश डाला और आचार संहिता के प्रश्न को उठाया। प्रति कुलपति प्रो. अरविंदाक्षन ने भी संगोष्ठी की उपादेयता प्रतिपादित की। उद्घाटन करते हुए कुलपति व प्रसिद्ध साहित्यकार विभूति नारायण राय ने सामयिक संदर्भों का उल्लेख करते हुए कहा कि ब्लाग को बहुत गंभीरता से लिए जाने की जरूरत है। ब्लाग के माध्यम से उपलब्ध अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कहीं स्वच्छंदता में न परिवर्तित हो जाए, इसकेप्रति सचेत रहना होगा। उन्होंने कहा कि ब्लागर अपनी लक्ष्मण रेखा का स्वयं निर्धारण करें।
वस्तुत: अधिकतर ब्लागर इसी बात केपक्ष में दिखाई दिए। उनकी मान्यता थी कि ब्लाग पर यदि आचार संहिता का शिकंजा कस दिया जाएगा तो उसकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पक्ष समाप्त हो जाएगा जो कि उसकी सबसे बड़ी विशेषता है। कुछ चिट्ठाकारों की मान्यता थी कि ब्लाग पर प्रकाशित रचनाओं का यदि नियमन किया जाएगा तो इससे इसके सामाजिक सरोकारों और सार्थकता में वृद्धि हो जाएगी। बाद में, साइबर कानून विशेषज्ञ पवन दुग्गल ने ब्लागर केनिरंकुश होने से उत्पन्न खतरों से सचेत किया और संगोष्ठी के विषय की सार्थकता को स्थापित करते हुए स्पष्ट किया कि ब्लागरों के लिए भी निश्चित रूप से कुछ नियम कायदे होने चाहिए।
प्रतिष्ठित कवि आलोक धन्वा ने कहा कि ब्लाग विस्मयकारी करने वाला है। उनके लिए शब्दों का यह अद्भुत संसार है। उन्होंने कहा कि मौजूदा दौर बहुत कठिनाइयों भरा है जहां लोकतांत्रिक मूल्यों का निरंतर लोप होता जा रहा है। ऐसे में ब्लाग पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सदुपयोग करते हुए विचार तत्वों को विस्तार दिया जा सकता है। उन्होंने कहा ब्लाग जगत में पाखंड नहीं है, जो बहुत अच्छी बात है।
संगोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे हैदराबाद से आए प्रोफेसर ऋषभदेव शर्मा ने कहा कि ब्लाग पर प्रस्तुत शब्द संसार को आभासी नहीं वास्तविकता से जोड़कर ही देखा जाना चाहिए। इसलिए इसमें नैतिकता के प्रश्न पर विचार किया जाना चाहिए। उन्होंने ब्लाग पर पनप रही दुष्प्रवृत्तियों को आड़े हाथ लेते हुए आचार संहिता की वकालत की।
लंदन से आई कविता वाचक्नवी ने ब्लागिंग की आचार संहिता का समर्थन करते हुए लेखन में संयम बरतने की बात कही। उन्होंने कहा लेखन के माध्यम से सस्ती लोकप्रियता प्राप्त करने के लिए निरंकुश आचरण नहीं किया जाना चाहिए। कथाकार डॉ. अजित गुप्ता ने इस बात पर जोर दिया कि ब्लागर एक पंचायत बनाकर लेखकीय नियमन का निर्धारण करें।
कानपुर से आए अनूप शुक्ल, दिल्ली के यशवंत सिंह और हर्षवर्धन ने ब्लाग में आचार संहिता की बात को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि इससे ब्लाग की मौलिक प्रवृत्ति ही नष्ट हो जाएगी। इसकेबाद अहमदाबाद के संजय बेगाणी और दिल्ली के शैलेश भारतवासी ने विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों को ब्लाग बनाने का प्रशिक्षण दिया। जनसंचार विभागाध्यक्ष डॉ. अनिल कुमार राय अंकित ने धन्यवाद ज्ञापन दिया।

संगोष्ठी
का दूसरा दिन कई चिंतनपरक आयामों से गुजरा। सभी ब्लागरों के चार समूह बनाकर विविध विषयों पर विचार मंथन किया गया और उसके निष्कर्षों को समूह प्रतिनिधि ने मंच से प्रस्तुत किया। ब्लागिंग में नैतिकता व सभ्याचरण, हिंदी ब्लाग और उद्यमिता, आचार संहिता क्यों और किसके लिए, हिंदी ब्लाग और सामाजिक सरोकार विषयों पर गहन मंथन किया गया। चार ब्लागरों के अध्ययन पत्रों का भी प्रस्तुतीकरण किया गया। डॉ. अशोक कुमार मिश्र ने ब्लागरी में नैतिकता का प्रश्न और आचार संहिता की परिकल्पना विषय पर प्रस्तुत अपने अध्ययन पत्र में उल्लेख किया कि ब्लाग में स्वअनुशासन का होना बहुत जरूरी है। अनुशासन के दायरे में रहकर ही श्रेष्ठ लेखन संभव है। ब्लाग में नैतिकता के प्रश्न का वैचारिक विश्लेषण करते हुए कहा जा सकता है कि ब्लाग में आचार संहिता की परिकल्पना के पीछे चिट्ठाकारों में स्वअनुशासन की भावना को ही विकसित करना है। लखनऊ के रवींद्र प्रभात, ब्लाग पर पीएचडी कर रही इंदौर से आई गायत्री शर्मा, दिल्ली के अविनाश वाचस्पति ने भी अध्ययनपत्र प्रस्तुत किए। उज्जैन से आए सुरेश चिपलूनकर, लखनऊ के जाकिर अली रजनीश और बंगलौर से आए प्रवीण पांडे ने ब्लाग लेखन में शाब्दिक शालीनता बरतने, सार्थक टिप्पणियां करने, ब्लाग के माध्यम से समसामयिक प्रश्नों पर विचार करने और सामाजिक सरोकारों से जोडऩे पर जोर दिया। साहित्यकार राजकिशोर, प्रियंकर पालीवाल, महेश सिन्हा, जयराम झा, विवेक सिंह, संजीत त्रिपाठी, श्रीमती अनीता कुमार, रचना त्रिपाठी, विनोद शुक्ला की उपस्थिति ने कार्यक्रम को गरिमा प्रदान की।

Sunday, September 12, 2010

राष्ट्रभाषा चयन के लिए हो मतदान, हिंदी का बढ़ जाएगा मान


-डॉ. अशोक प्रियरंजन
आजादी के ६३ सालों बाद भी देश में राष्ट्रभाषा घोषित न किया जाना सरकारों की कमजोरी का परिचायक है। इस दौरान कई सरकारें आईं और गईं लेकिन देश की नेतृत्व भाषा को पहचान देने की दिशा में कोई खास कदम नहीं उठाए गए। इसमें कोई दो राय नहीं राजभाषा हिंदी बोलने वाले लोगों की संख्या देश में सर्वाधिक है। विदेशों में भी इस भाषा को जानने और सीखने की ललक व्यापक स्तर पर दिखाई देती है। हिंदी भाषा का शब्दकोश समृद्ध है और विविध विधाओं में प्रचुर मात्रा में इसका साहित्य है। हिंदी में रोजगार की भी व्यापक संभावनाएं हैं। कंप्यूटर पर भी लिखने-पढऩे की सहूलियत भी इस भाषा में है। ऐसे में जरूरी है कि हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित कर दिया जाए। प्रश्न यह उठता है कि इस संबंध में क्या बाधाएं हैं और उसका समाधान कैसे हो?
सत्तारूढ़ दल अभी तक राजनीतिक तुष्टिकरण की नीति पर चलते हुए राष्ट्रभाषा घोषित करने से इसलिए बचते रहे क्योंकि वह अन्य भाषा भाषियों को नाराज नहीं करना चाहते हैं। कहीं से विरोध के स्वर न उठें, इसीलिए वह राष्ट्रभाषा केमुद्दे पर चुप्पी साधे रहते हैं?
मेरी दृष्टि में इस समस्या का आसान सा समाधान है जिसे सरकार सहजता से अमल भी कर सकती है। हम लोकतांत्रिक व्यवस्था में जी रहे हैं। लोकतंत्र में जब कोई मुद्दा समस्या बन जाए, तो मतदान से उसका हल निकाला जा सकता है।
मेरी ओर से हिंदी दिवस के मौके पर यह सुझाव है कि राष्ट्रभाषा चुनने के लिए मतदान करा लिया जाए। इसके लिए अलग से व्यवस्था करने की जरूरत नहीं है, बल्कि आगामी संसदीय चुनावों के दौरान जब लोग अपना सांसद चुनें तभी उन्हें राष्ट्रभाषा चुनने के लिए भी एक दूसरा मतपत्र दे दिया जाए। संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल सभी भाषाओं को मतपत्र में स्थान देकर राष्ट्रभाषा चुनने के पक्ष में मतदान करा लिया जाए। इस स्थिति में जो भी भाषा चुनकर आएगी, उस पर कहीं से विरोध की स्थिति नहीं रह जाएगी। यह अलग बात है कि हिंदी भाषियों की जिस तरह से संख्या बढ़ी है, उससे हिंदी केराजभाषा से राष्ट्रभाषा बन जाने की प्रबल संभावनाएं हैं। आपकी इस बारे में क्या राय है। हिंदी दिवस २०१० को सार्थक बनाने के लिए आप इस मुद्दे पर अपनी राय टिप्पणी के रूप में अवश्य लिखें।
(फोटो गूगल सर्च से साभार)

Wednesday, August 25, 2010

राष्ट्रभाषा, राजभाषा, राष्ट्रमंडल खेल और राष्ट्रीय गौरव

-डॉ. अशोक प्रियरंजन
किसी भी देश की अंतरराष्ट्रीय भाषाई पहचान के लिए जरूरी है कि उसकी एक राष्ट्रभाषा होनी चाहिए। यह भाषा ऐसी हो, जिसे सीखने, उसका साहित्य पढऩे की ललक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होनी चाहिए। भारत केसंदर्भ में यह विचारणीय विषय है कि अभी तक यहां हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं मिल सका है जबकि पूरी दुनिया में यह एक लोकप्रिय भाषा के रूप में उभरकर सामने आई है। इसकी लिपि सर्वाधिक वैज्ञानिक है। हिंदी का साहित्य बहुत समृद्ध है। बहुत बड़ी संख्या में हिंदी बोलने वाले लोग है। मारीशस, फिजी, सिंगापुर, कनाडा आदि में तो हिंदी के प्रति व्यापक रुझान दिखाई देता है।
भारत में हिंदी को राजभाषा घोषित किया गया है लेकिन इसके व्यापक उपयोग को लेकर सरकार की उदासीनता दिखाई देती है। इसका सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन में हिंदी केप्रति बरती जा रही उदासीनता है। संसद में भी राष्ट्रमंडल खेलों में हिंदी को बढ़ावा देने की मांग उठ चुकी है लेकिन आयोजक और सरकार नहीं चेती है। राजभाषा समर्थन समिति मेरठ इस दिशा में पहल करते हुए जनआंदोलन के तेवर अख्तियार किए हुए है लेकिन इसमें अन्य संगठनों की भागीदारी और व्यापक जनसमर्थन की जरूरत है।
राष्ट्रमंडल खेलों में राजभाषा हिंदी को बढ़ावा देना इसलिए भी जरूरी है कि उस दौरान कई देशों के लोग आयोजन में शामिल होंगे। उन्हें न केवल भारतीय संस्कृति की जानकारी दी जाए बल्कि पूरी दुनिया में लोकप्रिय हो रही राजभाषा हिंदी से भी परिचय कराया जाना चाहिए। ऐसा करके राष्ट्रीय गौरव को बढ़ाया जा सकता है। इस सत्य से कोई इनकार नहीं कर सकता है कि देश में हिंदी बोलने वालों की संख्या सर्वाधिक है और पूरी दुनिया में हिंदी को लेकर व्यापक संभावनाएं परिलक्षित हो रही हैं। फिर देश के भाषाई गौरव केशिखर पर हिंदी को प्रतिष्ठित करने में देरी क्यों? राष्ट्रमंडल खेलों के माध्यम से हिंदी को बढ़ावा देना समय की जरूरत है। इसकेलिए राजभाषा समर्थन समिति मेरठ केसुझावों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। समिति के सुझाव हैं-
1. राष्ट्रमंडल खेलों की वेबसाइट हिंदी में तुरंत बनाई जाए।
2. दिल्ली पुलिस और नई दिल्ली नगरपालिका द्वारा सभी नामपट्टों व संकेतकों में हिंदी का भी प्रयोग हो ।
3. राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान वितरित की जाने वाली सारी प्रचार सामगी हिंदी में भी तैयार की जाए।
4. राष्ट्रमंडल खेलों के आंखों देखे हाल के प्रसारण की व्यवस्था हिंदी में भी हो।
5. पर्यटकों व खिलाडियों के लिए होटलों व अन्य स्थानों हिंदी की किट भी वितरित की जाए।
6. उदघाटन व समापन समारोह भारत की संस्कृति व भाषा का प्रतिबिम्बित करते हों। सांस्कृतिक कार्यक्रम देश की गरिमा के अनुरूप हों। राष्ट्रपति , प्रधानमंत्री व अन्य प्रमुख लोग अपनी भाषा में विचार व्यक्त करें।
7. राष्ट्रमंडल के देशों में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए कार्ययोजना तैयार की जाए।
(फोटो गूगल सर्च से साभार)

Wednesday, July 28, 2010

राष्ट्रमंडल खेलों में हिंदी प्रयोग के लिए होगा संघर्ष, प्रस्ताव पारित

-डॉ. अशोक प्रियरंजन
नई दिल्ली स्थित इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में 27 जुलाई की शाम जुटे हिंदीप्रेमियों ने एक स्वर में राष्ट्रमंडल खेलों में राजभाषा हिंदी का प्रयोग किए जाने के लिए संघर्ष करने का फैसला किया। इसे राष्ट्रीय अस्मिता का प्रश्न मानकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीयता की पहचान को प्रखर बनाने के लिए सर्वसम्मति से कुछ प्रस्ताव पारित किए गए। राजभाषा समर्थन समिति मेरठ, अक्षरम एवं वाणी प्रकाशन की ओर से आयोजित गोष्ठी पारित प्रस्ताव निम्नांकित हैं-
1. राजभाषा समर्थन समिति मेरठ एवं अक्षरम के संयोजन में एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिंमंडल जिसमें सांसद, पत्रकार, साहित्यकार शामिल होंगे गृहमंत्री, गृहराज्यमंत्री, दिल्ली की मुख्यमंत्री, राष्ट्रमंडल खेलों की आयोजन समिति के अध्यक्ष, खेल मंत्री से मुलाकात कर राजभाषा हिंदी के प्रयोग का प्रश्न उनके संज्ञान में लाएगा।
2. संसद व मीडिया में इस प्रश्न को उठाने के लिए सांसदों तथा मीडियाकर्मियों से संपर्क किया जाए।
3. राष्ट्रमंडल खेलों की वेबसाइट हिंदी में तुरंत बनाई जाए।
4. दिल्ली पुलिस और नई दिल्ली नगरपालिका द्वारा सभी नामपट्टों व संकेतकों में हिंदी का भी प्रयोग हो ।
5. राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान वितरित की जाने वाली सारी प्रचार सामगी हिंदी में भी तैयार की जाए।
6. राष्ट्रमंडल खेलों के आंखों देखे हाल के प्रसारण की व्यवस्था हिंदी में भी हो।
7. पर्यटकों व खिलाडियों के लिए होटलों व अन्य स्थानों हिंदी की किट भी वितरित की जाए।
8. उदघाटन व समापन समारोह भारत की संस्कृति व भाषा का प्रतिबिम्बित करते हों। सांस्कृतिक कार्यक्रम देश की गरिमा के अनुरूप हों। राष्ट्रपति , प्रधानमंत्री व अन्य प्रमुख लोग अपनी भाषा में विचार व्यक्त करें।
9. राष्ट्रमंडल खेलों में हिंदी के प्रयोग के लिए एक जनअभियान चलाया जाए और सरकार द्वारा सुनवाई न किये जाने पर जंतरमंतर व अन्य स्थानों पर धरने व प्रदर्शन की योजना बनाए जाए।
10. इस अवसर का उपयोग करते हुए राष्ट्रमंडल के देशों में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए कार्ययोजना तैयार की जाए।
कार्यक्रम में डॉ. रत्नाकर पांडेय , कलराज मिश्र, हुक्मदेव नारायण यादव, प्रदीप टमटा , राजेन्द्र अग्रवाल ( सांसद) पत्रकार डॉ. वेदप्रताप वैदिक, रामशरण जोशी, साहित्यकार डॉ. गंगा प्रसाद विमल, कमेट्रेटर जसदेव सिंह, रवि चतुर्वेदी, हिंदी सेवी महेश शर्मा, नारायण कुमार, प्रो. नवीन चंद्र लोहनी आदि ने अपने विचार व्यक्त किए। गोष्टी का संयोजन अक्षरम के अध्यक्ष अनिल जोशी ने किया।
(फोटो गूगल सर्च से साभार)

Friday, July 23, 2010

राष्ट्रमंडल खेलों में हिंदी का परचम फहराने को उठे हाथ

-डॉ. अशोक प्रियरंजन
राष्ट्रमंडल खेलों को लेकर सभी भारतवासी उत्साहित हैं। इन खेलों से देश का गौरव बढ़ेगा। बड़ी संख्या में आने वाले विदेशी मेहमानों को भारतीय संस्कृति से रू-ब-रू होने का मौका मिलेगा। ऐसे में जरूरी है कि वह यहां की सर्वाधिक लोकप्रिय भाषा हिंदी से भी साक्षात्कार करें। इसकेलिए जरूरी है कि राष्ट्रमंडल खेलों से जुड़ी समस्त भाषिक सामग्री हिंदी में भी उपलब्ध हो। इसकेलिए एकजुट होकर प्रयास होने चाहिए। मेरठ से बीती सात जुलाई को राजभाषा समर्थन समिति ने इसकेलिए मुहिम शुरू की। विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रोफेसर नवीन चंद्र लोहनी के प्रयासों से बृहस्पति भवन में आयोजित कार्यक्रम में सांसद राजेंद्र अग्रवाल समेत अनेक हिंदी प्रेमी वक्ताओं ने राष्ट्रमंडल खेलों में हिंदी को बढ़ावा देने की मांग जोरदार तरीके से उठाई।
अब २७ को इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में सम्मेलन
दिल्ली स्थित इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में २७ जुलाई को सायं साढ़े पांच बजे आयोजित हिंदीसेवियों के सम्मेलन में इस मुहिम को आगे बढ़ाने की रणनीति बनेगी। समिति ने ज्यादा से ज्यादा लोगों से आयोजन में शामिल होने की अपील की है।
मुख्य मांग
खेलों में हिन्दी भाषा का प्रयोग विज्ञापनों/होर्डिंग्स/सरकारी प्रपत्रों तथा आयोजक संस्थाओं द्वारा अनिवार्यत: किया जाए, जिससे देश की गरिमा का आभास दुनियाँ को हो। न्यूयार्क में संपन्न आठवें अन्तरराष्ट्रीय विश्व हिन्दी सम्मेलन में हिन्दी को अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर सुदृढ़ करने तथा संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा बनाने का अभियान प्रमुखता से लिया गया था । यह अवसर है कि हम उस विशिष्ट अवसर पर लिए गए संकल्प को लागू कराएँ।
राष्ट्रमण्डल खेल और हिन्दी की संभावनाएं
1. जब चीन में ओलंपिक खेलों के दौरान चीनी भाषा का प्रयोग हो सकता है तो भारत में आयोजित खेलों की नियमावली और होर्डिंग्स, सूचनाओं का आदान-प्रदान, प्रसारण तथा सरकारी एवं आयोजक संस्थाओं के प्रपत्रों का लेखन हिन्दी में क्यों नहीं हो सकता।
2. आयोजन में आने वाले गैर हिन्दी भाषी खिलाडिय़ों और प्रतिनिधियों को अनुवादक उपलब्ध कराए जा सकते हैं। जैसा कि प्राय: हर अन्तरराष्ट्रीय आयोजन में अन्य भाषा-भाषी लोग करते हैं।
3. राष्ट्रमण्डल खेलों में हिन्दी के प्रयोग द्वारा हम भारत की छवि को पूरी दुनियाँ के सामने मजबूती के साथ स्थापित कर सकते हैं।
4. यदि हम राष्ट्रमण्डल खेलों में हिंदी प्रयोग करते हैं तो अनुवादकों की आवश्यकता पड़ेगी। इससे अनुवादकों को रोजगार प्राप्त होगा।
5. राष्ट्रमण्डल खेल हिन्दी भाषा के लिए बड़ी संभावनाओं को खोल सकते हैं, अगर हम हिंदी का इन खेलों के दौरान अधिक से अधिक प्रयोग करेंगे। इससे विदेशी लोगों का भी हिन्दी के प्रति आकर्षण बढ़ेगा तथा इससे हिंदी के शिक्षण, पठन-पाठन की विदेशों में भी संभावनाएं बढ़ेंगी।
6. अनुच्छेद 344 के अनुसार राष्ट्रपति हिंदी भाषा की बेहतरी के लिए भाषा आयोग का गठन करेंगे। राष्ट्रमण्डल खेल भारत में हो रहे हैं, परन्तु हिन्दी भाषा को संवर्धित करने के लिए संविधान में दी गई भाषा संबंधी व्यवस्था का पालन नहीं हो रहा है, ऐसे में जरूरी है कि जन जागृति द्वारा प्रबुद्ध नागरिक राष्ट्रमण्डल खेलों में हिन्दी के प्रयोग को लेकर सरकार का ध्यान आकर्षित करें।
7. राष्ट्रमण्डल खेलों में हिन्दी के प्रयोग द्वारा हम उस रूढ़ मानसिकता पर भी चोट कर सकते हैं जो अंग्रेजी के प्रयोग द्वारा निज विशिष्टता सिद्ध करती रही है, यह हिंदी के भूगोल और मानसिकता को परिवर्तित करने का अवसर भी है।
समिति संपर्क सूत्र
राजभाषा प्रयोग के इस क्रान्तिकारी अभियान को परिणाम तक पहुँचाने के लिए राजभाषा समर्थन समिति व्यापक जनसहयोग चाहती है। आयोजन से जुड़े हुए सरकारी विभागों एवं संस्थाओं से भी आग्रह किया जाना चाहिए। समिति समपर्क सूत्र हैं -
नवीन चन्द्र लोहनी एवं समस्त साथी, राजभाषा समर्थन समिति,
हिन्दी विभाग, चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ (उ0 प्र0) मो.नं. 09412207200/09412885983/9758917725/9258040773/9897256278

Sunday, July 26, 2009

इन देशभक्त महिलाओं के जज्बे को सलाम

-डॉ. अशोक प्रियरंजन
२५ जुलाई को १७८ महिलाओं ने देश में नया इतिहास रच दिया। इस दिन पहली बार सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) में शामिल होने के लिए १७८ महिला जवानों के फस्र्ट बैच ने होशियारपुर के गांव खड़कां स्थित सहायक प्रशिक्षण केंद्र में पास आउट किया । यह इसलिए महत्वपूर्ण है कि अब इन महिला जवानों के केकंधों पर देश की सीमाओं की सुरक्षा करने की महती जिम्मेदारी होगी । पिछले साल ११ जून को जब सुरक्षा बल के जालंधर स्थित मुख्यालय में महिला जवानों भरती आयोजित की गई थी तब भी महिलाओं के देशभक्ति के जज्बे की मिसाल सामने आई थी । यह गौरव का विषय है कि विषम परिस्थितियों में फौजी दायित्वों को निभाने केलिए साढ़े आठ हजार महिलाओं ने आवेदन किया था । इनमें से ही ४८० का चयन किया गया था। इनका प्रशिक्षण गत वर्ष १० नवंबर से शुरू हुआ था और ३६ सप्ताह के कड़े प्रशिक्षण के बाद अब यह जवान तैनाती के लिए तैयार हैं । इन कांस्टेबल को मुख्यत: ५५३ किलोमीटर लंबी भारत-पाकिस्तान सीमा पर मौजूद ३०० गेटों पर गेट के आरपार आने जाने वाली महिलाओं की तलाशी के लिए तैनात किया जाएगा । इसके अलावा जरूरत के अनुसार बीएसएफ के सामान्य कामों, आंतरिक सुरक्षा ड्यूटी और आतंकवाद निरोधी आपरेशन में भी तैनात किया जाएगा ।
यह एक सुखद संकेत है कि फौज के प्रति लड़कियों का रुझान बढ़ रहा है । इसी केचलते अनेक छात्राएं एनसीसी कैडेट के रूप में प्रशिक्षण लेती हैं । सैन्य बलों में पिछले कुछ समय में बड़ी संख्या में हुई महिलाओं की भर्ती भी इसी का उदाहरण हैं । कुछ साल पहले तक सैन्य क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी नहीं होती थी। वे खुद भी इसे करियर के विकल्प के तौर पर नहीं लेती थीं। महिलाओं को शिक्षा, बैंकिग और सरकारी सेवा आदि क्षेत्र रोजगार केलिए बेहतर विकल्प लगते थे । लेकिन अब परिवेश बदला है। महिलाएं जोखिम भरे क्षेत्रों को भी सेवा और करियर केरूप में अपनाने लगी है। यही महिलाओं भविष्य में दुश्मनों केदांत खट्टे करके रानी झांसी लक्ष्मीबाई की वीरता की कहानियों की पुनरावृत्ति करेंगी । दरअसल, सैन्य बलों में वही महिलाएं भर्ती हो पाती हैं जिनमें देशसेवा का जज्बा होता है । बीएसएफ में भर्ती होने वाली इन महिलाओं में निसंदेह यह जज्बा है, इसीलिए ही उन्होंने करियर केरूप में यह विकल्प चुना है । इनके इस शानदार जज्बे को सलाम ।
(फोटो गूगल सर्च से साभार)

Thursday, October 2, 2008

इस देश के हालात से बापू उदास हैं


दंगे औ फसादात से बापू उदास हैं,
इस देश के हालात से बापू उदास हैं ।

सपनों की जगह आंख में है मौत का मंजर,
हिंसक हुए जजबात से बापू उदास हैं ।

बढते ही जा रहे हैं अंधेरों के हौसले,
जुल्मों की लंबी रात से बापू उदास हैं ।

बंदूक बोलती है कहीं तोप बोलती,
हिंसा की शह और मात से बापू उदास हैं ।

तन पे चले खंजर तो कोई मन पे करे वार
हर पल मिले सदमात से बापू उदास हैं ।

आंसू कहीं बंटते तो कहीं दर्द मिल रहा,
ऐसी अजब सौगात से बापू उदास हैं ।

रंजन तुम्हारी आंख में क्यों आ गए आंसू,
इतनी जरा सी बात से बापू उदास हैं ।

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डॉ. अशोक प्रियरंजन

( फोटो गूगल सर्च से साभार )