Showing posts with label शिक्षा. Show all posts
Showing posts with label शिक्षा. Show all posts

Tuesday, June 9, 2020

पत्रकारिता एवं जनसंचार पर डॉ. अशोक की पुस्तक प्रकाशित


                   
डॉ.  अशोक कुमार मिश्रा की नवप्रकाशित पुस्तक  “ जनसंचार माध्यमों का विकास और प्रभाव ” पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे विद्यार्थियों के साथ ही जनमानस के लिए पठनीय, उपयोगी और महत्वपूर्ण है। 15 अध्यायों में विभक्त इस पुस्तक के माध्यम से भारत में जनसंचार के विकास क्रम को निर्धारित करते हुए जनमानस, समाज और राष्ट्र पर उसके प्रभावों पर प्रकाश डाला गया है। यह पुस्तक मुद्रित पत्रकारिता, इलेक्ट्रानिक मीडिया और वैकल्पिक जनसंचार माध्यमों की प्रवृत्तियों और विशेषताओं की सूक्षमता से रेखांकित करती है। पुस्तक की विषयवस्तु को सारगर्भित बनाने का प्रयास किया गया है। इसकी भाषा सहज, सरल और संप्रेषणीय है। पुस्तक आनलाइन बिक्री के लिए एमेजान डाट इऩ पर उपलब्ध है।

Monday, May 21, 2012

डा. अशोक कुमार मिश्र बने रेमटेक में डीन एडमिनिस्ट्रेशन


डा. अशोक कुमार मिश्र ने शामली (प्रबुद्धनगर) सि्थत रुड़की इंजीनियरिंग एंड मैनेजमेंट टेक्नोलाजी इंस्टीट्यूट में डीन एडमिनिस्ट्रेशन के पद पर कायॅभार ग्रहण कर लिया है। इससे पू्र्व वह इंस्टीट्यूट आफ मैनेजमेंट स्टडीज, नोएडा में स्नातकोत्तर पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के अध्यक्ष थे। वह करीब ढाई दशक तक अमर उजाला, मेरठ में मुख्य उपसंपादक के पद पर कायर्रत रहे। चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग तथा पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग में भी वह फैकल्टी के रूप में संबद्ध रहे। अकादमिक, पत्रकारिता और प्रशासनिक क्षेत्र का करीब ढाई दशक का अनुभव हासिल करने वाले डा. मिश्र के मीडिया, साहित्य और ब्लाग पर अनेक शोधपत्र प्रकाशित हो चुके हैं। हिंदी के प्रतिष्टित समाचारपत्रों और पत्रिकाओं में समसामयिक विषयों पर उनके विचारपपूर्ण लेख प्रकाशित होते रहे हैं। देश के अलग-अलग हिस्सों में आयोजित अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय शोध संगोष्ठियों की उन्होंने अध्यक्षता की है। आकाशवाणी से भी उनकी रचनाओं और रेडियो वार्ताओँ का प्रकाशन होता रहा है। भोपाल से प्रकाशित पत्रिका समागम के वह विषय विशेषज्ञ भी हैं।

Monday, October 4, 2010

प्राइमरी स्कूलों की संख्या संग गुणवत्ता भी बढ़ाएं

-डॉ. अशोक प्रियरंजन
लखनऊ में १८ सितंबर को हुई बैठक में उत्तर प्रदेश सरकार ने तय किया कि अब ३०० लोगों की आबादी पर एक प्राइमरी स्कूल खोला जाएगा। शिक्षा का अधिकार अधिनियम में १४ वर्ष के तक बच्चों को मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा देने की व्यवस्था की गई है। इसकेअनुरूप बुनियादी शिक्षण संस्थान खोलने के लिए सूबे में कवायद की जा रही है। पहले सरकार ने तय किया था कि प्रदेश में स्कूल खोलने का मानक आबादी के बजाय क्षेत्रफल रहेगा। इसके मुताबिक एक किलोमीटर के दायरे में एक स्कूल खोला जाएगा लेकिन प्रदेश प्राइमरी स्कूलों की जो हालत है, उसके मुताबिक नीति में परिवर्तन किया गया है।
प्रदेश में मौजूदा समय में १ लाख ५ हजार ५०५ प्राइमरी और ४२ हजार ७४८ उच्च प्राइमरी स्कूल हैं। प्रदेश में मौजूदा समय में जितने स्कूल हैं, उनमें नए मानक के अनुसार ३.२५ लाख सहायक अध्यापकों की जरूरत होगी।
प्राइमरी शिक्षण संस्थानों की संख्या बढ़ाने से इससे सूबे में शिक्षा का बुनियादी ढांचा निश्चित रूप से बहुत मजबूत हो जाएगा लेकिन इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि इन स्कूलों में पर्याप्त संसाधन मुहैया कराए जाएं। सूबे में चाहे शहरी इलाके के स्कूल हों, या सुदूर ग्रामीण अंचलों के, सभी में बुनियादी संसाधनों का निहायत अभाव दिखाई देता है।
बड़ी संख्या में स्कूल खस्ताहाल भवनों में चल रहे हैं। अनेक स्कूल किराए की ऐसी इमारतों में चल रहे हैं जिनमें पढ़ाई करना किसी खतरे को मोल लेने से कम नहीं हैं। जिन स्कूलों के अपने भवन भी हैं वहां भी ऐसी इमारतों की संख्या ज्यादा है, जो पुराने हो चुके हैं और मरम्मत न होने के कारण गिराऊ हालत में पहुंच चुके हैं। मेरठ में तो स्कूल की हालत इतनी जर्जर थी कि पड़ोस के एक व्याक्ति ने उसे खुद ही ध्वस्त करा दिया ताकि कोई हादसा न हो जाए। गाहे-बगाहे प्राइमरी स्कूल के जर्जर भवनों की छत आदि गिरने की खबरें अखबारों में छपती भी रहती हैं। कॉम्पैक्ट ने भी सूबे में पड़ताल की तो प्राइमरी स्कूलों की खस्ताहाल तस्वीर को उजागर हुई जहां मौत के साये में मासूम पढ़ाई कर रहे हैं। खतरों की पाठशाला बने ऐसे स्कूलों में बच्चे और शिक्षक दोनों ही दुर्घटना की आशंका से सहमे रहते हैं।
संसाधनों की भी भारी कमी प्राइमरी स्कूलों में दिखाई देती हैं। कहीं टाट-पट्टी फटी हुई हैं तो कहीं ब्लैक बोर्ड की खस्ताहालत है। शिक्षकों के बैठने के लिए कुर्सियां कहीं कम हैं तो कहीं पुरानी और जर्जर हैं। अनेक स्कूलों में टायलेट की व्यवस्था न होना भी विद्यार्थियों शिक्षकों केलिए परेशानी का सबब बन जाता है। स्कूलों में नियमित सफाई का भी इंतजाम नहीं हो पाता है। बिजनौर में १८ सितंबर को उच्च प्राइमरी स्कूल कुरी बंगर में गंदगी पर पाए जाने पर जिला बेसिक शिक्षाधिकारी वरूण कुमार सिंह हेड मास्टर को निलंबित कर दिया तथा अन्य स्टाफ को हटा दिया। बीएसए के मुताबिक निरीक्षण में बहुउददेशीय कक्ष की छत पर घास पाई गई तथा छत पर पानी भरा है दीवारों में सीलन एवं दरार आ गई है। शौचालय एवं मूत्रालय में भूसा एवं टूटी हुई कुर्सियां भरी पाई गर्इं।
शिक्षकों की भारी कमी प्राइमरी स्कूलों में है। ऐसे अनेक स्कूल हैं जो एक या दो शिक्षकों के सहारे चल रहे हैं। मौजूदा समय में सूबे में शिक्षकों की कमी के चलते १४ हजार २७४ एकल और १३८७ स्कूल बंद हो चुके हैं। इसकी एक वजह यह भी है कि बीच में कई वर्ष ऐसे रहे जब शिक्षक सेवानिवृत तो होते रहे लेकिन भर्ती नहीं की गई।
इन कारणों से प्राइमरी शिक्षा की गुणवत्ता भी प्रभावित हुई। शिक्षकों की कमी का असर स्कूलों की विद्यार्थी संख्या पर पड़ा। स्कूलों में छात्र के प्रवेश घटे और जिन्होंने दाखिले लिए वे कक्षा में कम दिन उपस्थित रहते। इसका सीधा असर उनकी पढ़ाई पर पड़ा।
ऐसी स्थिति में जरूरी है कि स्कूलों की संख्या बढ़ाने के साथ ही संसाधनों को भी विकसित करने की ओर ध्यान दिया जाए। साथ ही स्कूलों में पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं। अच्छे भवनों में विद्यार्थियों की पढ़ाई की व्यवस्था की जाए। शिक्षकों की संख्या भी छात्रों केअनुपात में हो। यह सब होगा तो विद्यालय में पढ़ाई में विद्यार्थियों का मन लगेगा और वह अच्छे शैक्षिक परिणाम देने में समर्थ होंगे। तभी शिक्षा की सार्थकता सिद्ध हो पाएगी और विद्यालय श्रेष्ठ नागरिक तैयार करने में समर्थ हो सकेंगे।
(फोटो गूगल सर्च से साभार)

Friday, February 26, 2010

अंग्रेजों की जमीन पर हिंदी के फूल खिले


-डॉ. अशोक प्रियरंजन
हिंदी भाषा और साहित्य से विदेशी भूमि भी आलोकित हो रही है। अंग्रेजी के लिए जाने जाना वाले इंग्लैंड तक में हिंदी के फूल खिल रहे हैं। यूरोप में हिंदी भाषियों की बड़ी संख्या है। भारतवंशी अनेक साहित्यकार विदेशों में हिंदी साहित्य सृजन कर रहे हैं। मेरठ में चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की ओर से १२-१४ फरवरी तक आयोजित अंतरराष्ट्रीय हिंदी संगोष्ठी में आए भारतवंशी हिंदी साहित्यकारों ने विदेशी भूमि पर हिंदी की गौरवशाली सृजनशीलता से साक्षात्कार कराया।
इजराइल से आए गेनाल्डी स्लम्पोर वहां के विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रोफेसर हैं। वह कई देशों में हिंदी शिक्षण का कार्य कर चुके हैं। उनकी हिंदी भाषा और साहित्य पर कई पुस्तकें हैं। उन्होंने बताया कि उनके देश में हिंदी सीखने की ओर रुझान है।
इंग्लैंड के नाटिंघम से आईं जया वर्मा की पहचान एक अच्छी कवयित्री के रूप में है। वह गीतांजलि बहुभाषी साहित्यिक समुदाय टैं्रथ की अध्यक्ष हैं। यह संस्था साहित्यिक गतिविधयों में सक्रिय है। संस्था की शुरुआत बर्मिंघम में १९९५ में हुई। नाटिंघम में २००३ में संस्था ने कामकाज प्रारंभ किया। यह संस्था हिंदी ज्ञान प्रतियोगिता आयोजित करती है जिसमें यूरोप, मास्को, यूक्रेन समेत कई देशों के विद्यार्थी भाग लेते हैं। इसके विजेता बच्चों को भारत भ्रमण के लिए भी भेजा जाता है। जया वर्मा ने १५ सालों तक नाटिंघम के कला निकेतन स्कूल में हिंदी का शिक्षण कार्य किया। त्रैमासिक हिंदी पत्रिका पुरवाई और प्रवासी टुडे भी इंग्लैंड से प्रकाशित होती हैं। सप्लीमेंटरी स्कूलों में यहां ए लेवल अर्थात् १२वीं तक हिंदी पढ़ाई जाती है। जया वर्मा के मुताबिक टीवी पर हिंदी के अनेक प्रमुख चैनल इंग्लैंड में देखे जाते हैं जिनकी हिंदी को लोकप्रिय बनाने में खास भूमिका है। इसके साथ ही गीतांजलि की ओर से इंग्लैंड के सात शहरों लंदन, बर्मिंघम, नाटिंघम, लेस्टर, यार्क और मेनचेस्टर में हिंदी कवि सम्मेलनों का आयोजन किया जाता है। कैंब्रिज, लंदन और योर्क यूनिवर्सिटी में बीए और एमए में हिंदी पढऩे वाले विद्यार्थी हैं।
कनाड़ा में बसी स्नेह ठाकुर के मुताबिक वहां हिंदी की स्थिति अच्छी है। वह छह वर्षों से त्रैमासिक पत्रिका वसुधा का संपादन व प्रकाशन कर रही हैं। संजीवनी, उपनिषद् दर्शन जैसी पुस्तकों की लेखिका स्नेह ठाकुर सद्भावना हिंदी साहित्यिक संस्था की अध्यक्ष हैं। यह संस्था हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए सक्रिय है। वहां से हिंदी अब्राड नामक समाचारपत्र का भी प्रकाशन होता है। मंदिरों में शनिवार को निजी प्रयासों से हिंदी स्कूल की कक्षाएं चलती हैं। विश्वविद्यालयों में भी हिंदी पढ़ाई जाती है।
मारीशस मेें बसे भारतीय मूल के डॉ. हेमराज सुंदर मोका स्थित महात्मा गांधी इंस्टीट्यूट से जुड़े हैं। वह वसंत और रिमझिम नामक पत्रिका का प्रकाशन भी करते हैं। इस इंस्टीट्यूट में एम फिल और पीएचडी तक की पढ़ाई होती है। हिंदी साहित्य सम्मेलन परीक्षाएं कराता है। डॉ. सुंदर के अनुसार मारीशस में माध्यमिक स्तर तक हिंदी पढ़ाई जाती है। लंदन यूनिवर्सिटी १२वीं तक की परीक्षा कराता है। आर्य सभा मारीशस भी धार्मिक परीक्षाएं कराता है। रेडियो पर २४ घंटे हिंदी के कार्यक्रम चलते रहते हैं। दूरदर्शन पर भी साहित्यिक कार्यक्रम और हिंदी फिल्में धडल्ले से चलती हैं। अलबत्ता हिंदी अखबारों की कमी खलती है। हिंदी जनता की भाषा के रूप में स्थापित है।

Tuesday, September 22, 2009

उच्च शिक्षा में उपजे सवाल

-डॉ. अशोक प्रियरंजन
इलाहाबाद विश्वविद्यालय परिसर में नौ सितंबर को छात्रों ने जो तांडव मचाया वह शिक्षा और राजनीति के समीकरणों से जुड़े कई सवालों पर मंथन करने के लिए विवश करता है। छात्रसंघ बहाली की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे उग्र छात्रों ने वीसी दफ्तर पर पथराव किया, कई स्थानों पर तोडफ़ोड़ की। पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा। विश्वविद्यालय के आसपास के इलाकों में करीब डेढ़ घंटे तक छात्रों का यह तांडव चलता रहा। कई लोग घायल हुए। रैगिंग से परेशान होकर १५ सितंबर को लखनऊ के आजाद इंस्टीट्ïयूट ऑफ इंजीनियरिंग टेक्नोलॉजी में बीटेक प्रथम वर्ष की छात्रा पूनम ने कैंपस में छत से कूदकर जान दे दी। वास्तव में यह अराजक स्थिति है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग लगातार परिसरों में शैक्षिक वातावरण सृजन पर जोर दे रहा है लेकिन देश के अलग-अलग हिस्सों से विश्वविद्यालय परिसरों में हो रही ऐसी अराजक घटनाएं उसके मंसूबों पर पानी फेरती लगती हैं। बेहतर पढ़ाई के लिए पहली शर्त अनुशासन की होती है लेकिन परिसरों में इसकी कमी दिखाई देती है।
कभी छात्र राजनीति के चलते तो कभी शिक्षकों अथवा कर्मचारियों के आंदोलन के कारण विद्यार्थियों की पढ़ाई में बाधा पैदा हो जाती है। कुछ स्थानों पर शिक्षकों की कमी विद्यार्थियों केलिए परेशानी का सबब बन जाती है। कई विश्वविद्यालयों के छात्रावास भी असामाजिक गतिविधियों संचालित होने के कारण चर्चा में आए हैं। इन हॉस्टलों में पढ़ाई पूरी करने के बाद भी दबंग छात्र कई कई सालों तक जमे रहतेे हैं। नए छात्रों पर रौब गांठना, रैगिंग करना और उल्टे-सीधे काम करके अपना स्वार्थ सिद्ध करना ऐसे छात्रों का उद्देश्य होता है। मेधावी छात्र ऐसी स्थिति में हॉस्टल में अपनी पढ़ाई ढंग से नहीं कर पाते हैं।
वजह कुछ भी रही हो, लेकिन इन घटनाओं के संदर्भ और सूबे में विश्वविद्यालयों की स्थितियों को देखते हुए आज यह विचार करना नितांत जरूरी है कि कैसे परिसरों का माहौल ऐसा बनाया जाए जिससे विद्यार्थी पूरे मनोयोग से वहां पढ़ाई कर पाएं। आज ऐसी घटनाएं भी बढ़ी हैं जो ज्ञान केमंदिरों का माहौल दूषित कर रही हैं, उन्हें कैसे रोका जाए। मौजूदा दौर में उच्च शिक्षा में उपज रही चुनौतियों से जुड़े सवालों के जवाब तलाशने होंगे। यह विचार करना होगा कि क्या उच्च शिक्षण संस्थानों में पढ़ाई का बेहतर माहौल है? क्या छात्रों की मानसिकता पढऩे की है या उसमें कुछ भटकाव भी शामिल हो गया है? क्या शिक्षक वर्ग अपने दायित्वों का सही प्रकार निर्वाह कर रहे हैं? क्या मोटा वेतन लेने के बदले वह विद्यार्थियों को अच्छी तरह पढ़ा रहे हैं? क्या छात्र राजनीति विश्वविद्यालयों का माहौल बना रही है या बिगाड़ रही है? अभिभावक अपनी मेहनत की कमाई से जो मोटी फीस अपने बच्चों की पढ़ाई केलिए विश्वविद्यालय को देते हैं क्या उसके बदले में विश्वविद्यालय उन्हें वह ज्ञान दे पाता है जिसकी आकांक्षा लेकर वह आते हैं? क्यों नई पीढ़ी में कई बार डिग्री लेने के बाद भी निराशा की अधिकता और आत्मïिवश्वास की कमी होती है?
(फोटो गूगल सर्च से साभार)

Friday, September 5, 2008

शिक्षकों का दयिएतव बढा

मौजूदा दौर में शिक्षकों का दाियत्व और बढ़ गया है । बेहतर शिक्षा देने के साथ ही उन्हें विद्यार्थियों को भविष्य की संभावनाओं के अनुरूप तैयार करना होगा । गुरुकुल तो नहीं रहे लेकिन गुरुकुल परंपरा की अच्छी बातों को जीवित रखना होगा । आज अनेक उच्च शिक्षण संस्थानों में विद्यार्थी हैं, शिक्षक हैं, लैब हैं, विशाल भवन हैं, पुस्तकालय हैं लेकिन पढ़ाई का माहौल नहीं है । इन शिक्षण संस्थानों में पढ़ाई का माहौल शिक्षक ही बना सकते हैं । शिक्षा के मंदिरों में अब ऐसे तत्व भी प्रवेश कर गए हैं जो विद्यार्थियों में भटकाव पैदा कर देते हैं । इस भटकाव से बचाकर विषम परिस्थित में अगर कोई शिक्षा दे सकता है तो वह गुरु ही है । आज बच्चों में शिक्षा, कैरियर और भविष्य को लेकर काफी चिंता रहती है । कई बार माता पिता भी उन पर अपनी इच्छा थोप देते हैं । ऐसे में उम्मीदें पूरी न कर पाने पर उनमें निराशा पैदा होती है और आत्मविश्वास घट जाता है । शिक्षकों का दाियत्व है, वे उन्हें आत्मविश्वास से इतना मजबूत कर दें की उनमें कभी निराशा ही पैदा न होने पाए । कैरियर को लेकर भी उचित मार्गदर्शन करें । ऐसा होने पर ही नई पीढी अपनी जिंदगी के सपनों में रंग भर पायेंगे ।