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Tuesday, June 25, 2013

जब हर शाम होने लगी काव्य गोष्ठी

डा. अशोक कुमार मिश्र
बात उन दिनों की है जब मैं बदायूं में था। हिंदी में सबसे पहले गजल कहने का श्रेय जाता है कवि-सम्मेलनों के सर्वाधिक लोकप्रिय कवि बलवीर सिंह रंग को। इसीलिए उनको गीत-गजल सम्राट भी कहा जाता था। उम्र के आखिरी दौर में रंगजी बदायूं आ गए थे। सरकारी अस्पताल का प्राइवेट वार्ड उनका आशियाना बना था। उन दिनों मैं भी अशोक प्रियरंजन नाम से कविताएं लिख रहा था। रंग जी का व्यक्तित्व बड़ा प्रेरणादायक था। अक्सर मैं रंग जी के पास चला जाता। बातचीत के दौरान वह अपने गीत-गजल सुनाते और मुझसे भी आग्रह करते कि कुछ लिखो और सुनाओ। जब मैं उन्हें अपनी रचना उन्हें सुनाता तो वह बड़े ध्यान से सुनते, सुधार करते और अपने सुझाव भी देते थे। कविता के प्रति उनका लगाव अद्भुत था। धीरे-धीरे लोगों को रंग जी के आने का पता चलता गया और उनसे मिलने वालों की संख्या बढ़ने लगी। उन दिनों बदायूं में कवि-सम्मेलनों के दिग्गज हस्ताक्षर मौजूद थे जिनकी वाणी पूरे देश में गूंजती थी। वीर रस के मशहूर कवि श्रद्धेय ब्रजेंद्र अवस्थी, ओज के हस्ताक्षर डा. उर्मिलेश शंखधार, मोहदत्त साथी, सुभाष बशिष्ठ, शमशेर बहादुर आंचल, काका देवेश, अवधेश पाठक और नई पीढ़ी के अनेक काव्य सर्जकों के लिए रंग जी का बदायूं आना बहुत उत्साहजनक था। ये लोग और आसपास के जिलों से लोग रंगजी का हालचाल पूछने अक्सर आते रहते थे। शाम को रोजाना दो-चार कवि और कुछ काव्य प्रेमी रंग जी के पास पहुंच जाते थे और फिर बिना किसी पूर्व योजना के अपने आप हो जाती थी काव्य गोष्ठी। ऐसी काव्य गोष्ठी जिसमें रंग जी के साथ ही कोई न कोई दिग्गज कवि भी मौजूद होता था। जब तक रंग जी बदायूं में रहे, ये सिलसिला अनवरत चलता रहा और काव्य गंगा प्रवाहित होती रही। आज भी उनकी गजल की पंक्तियां कानों में गूंजती हैं-
कुछ ऐसे प्रश्न हैं जो कि सुलझाए नहीं जाते,
और उत्तर भी ऐसे हैं कि बतलाए नहीं जाते।
बनाना चाहता हूं स्वर्ग तक सोपान सपनों का,

मगर चादर से बाहर पांव फैलाए नहीं जाते।

Tuesday, March 12, 2013

नए अध्यादेश से मिलेगी महिलाओं को सुरक्षा, रुकेंगे अपराध


डा. अशोक कुमार मिश्र
महिलाओं की सुरक्षा संबंधी कानून के विधेयक के मसौदे पर गहन मंथन के बाद भी कैबिनेट की बैठक में सहमति न बन पाने की स्थिति कई सवाल खड़े करती है। मसौदे के कड़े प्रावधानों को लेकर मंजूरी से पहले ही इसके दुरुपयोग की आशंका पैदा हो रही है जिसके चलते मंत्रियों तक को पसीने छूट रहे हैं। सवाल पैदा होता है कि दुरूपयोग की आशंका के चलते क्या सख्त कानून ही न बनाए जाएं। फिर कैसे अपराधों पर रोक लगेगी। बलात्कार की घटनाएं जिस तेजी से बढ़ रही हैं, उसके चलते जरूरी है कि इसकी रोकथाम के लिए कड़े कानून हों और उनका सही तरीके अनुपालन होना चाहिए। कानून का अगर दुरुपयोग होता है तो इसके लिए भी हमारी पुलिस और प्रशासनिक व्यवस्था ही दोषी होती है। पहली इस तरह के जघन्य अपराध को लेकर जो सामाजिक जागरूकता पैदा हुई है, सरकार ने जिस तरह से गंभीर मंथन किया है, उसका सम्मान करते हुए बिना किसी राजनीति के विधेयक को अंतिम रूप दे दिया जाना चाहिए। कई मायनों में दुष्कर्म विरोधी अध्यादेश महत्वपूर्ण है।
 इस अध्यादेश से महिलाओं के खिलाफ यौन अपराधों पर लगाम लगाना संभव होगा। प्रस्तावित आपराधिक कानून (संशोधन) विधेयक -2013 में बलात्कार की परिभाषा में ही बदलाव लाने का प्रस्ताव है। इसके लागू होने पर अंतरंग अंगों का किसी भी प्रकार से स्पर्श बलात्कार के दायरे में आएगा। इसका असर यह होगा कि अभी तक अंतरंग अंगों के स्पर्श के जो मामले छेड़छाड़ में दर्ज होते थे, यौन हमलों के दायरे में आते थे, वे अब बलात्कार के दायरे में आएंगे और दोषियों को इसी कानून के तहत सजा मिलेगी। गौरतलब है कि छेड़छाड़ की सर्वाधिक घटनाएं होती हैं जिनमें से संकोचवश अनेक मामले तो पुलिस में दर्ज भी नहीं कराए जाते हैं। यहां पर यह बहस का मुद्दा रहा कि यौन उत्पीड़न शब्द को ही बरकरार रखा जाए अथवा इसके लिए बलात्कार शब्द रखा जाना चाहिए। अब बलात्कार शब्द पर ही सहमति बन रही है।
दुष्कर्म रोधी विधेयक में यह भी प्रावधान है कि कोई डाक्टर यदि बलात्कार पीडित के इलाज से मना करता है तो उसके लिए पांच से सात साल तक की सजा हो सकती है। यह बहुत जरूरी है। इलाज के अभाव में महिलाओं की स्थिति बिगड़ जाती थी और डाक्टर कानूनी पचडे में पड़ने से बचने के लिए उसके इलाज से कतराते थे। पुलिस पर भी अध्यादेश के मार्फत लगाम कसी गई है। अगर कोई पुलिस अफसर बलात्कार के मामले की जांच करने में नाकाम रहता है तो उसे भी इस स्थिति में छह माह की सजा हो सकती है। गैंगरेप के मामलों में भी आरोपियों को पीड़त के इलाज और पुनर्वास का खर्च उठाना होगा। अध्यादेश के इस प्रावधान से पीड़ित महिला को आर्थिक सुरक्षा मिलेगी। यह अच्छी पहल है और न्याय संगत भी। सरकार ने सहमति से शारीरिक संबंध बनाने की उम्र भी 18 वर्ष से घटाकर 16 साल कर दी है। इसके भी दूरगामी परिणाम अच्छे ही होंगे। अदालती आदेश पर अलग हो चुकी पत्नी के साथ भी शारीरिक संबंध बनाना बलात्कार के दायरे में आएगा। इसके लिए दो से सात साल तक की सजा का प्रावधान किया गया है।
अध्यादेश लागू होता है तो इसके प्रावधान निश्चित रूप से महिलाओं को सुरक्षा प्रदान करने में समर्थ होंगे। इसलिए जरूरी है कि सरकार आम राय बनाकर इसे पारित कर दे। यह वक्त की जरूरत है। दुरुपयोग न हो, इसके लिए व्यवस्था की जानी चाहिए। सरकारी तंत्र सतर्क रहेगा तो कोई वजह नहीं कि दुरुपयोग हो पाए।

Wednesday, March 6, 2013

महिलाओं की सुरक्षा के हों पुख्ता इंतजाम

-डा. अशोक कुमार मिश्र

पूरी दुनिया में आठ मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है। यह एक दिन एसा होता है जिस दिन पूरी दुनिया में महिलाओं की मौजूदा हालात पर गहन मंथन हो जाता है। अखबारों में लेख छपते हैं, गोष्ठियां होती हैं और कुछ निष्कर्ष भी निकलते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि महिलाएं पहले के मुकाबले मजबूत हुई हैं। 21 वीं सदी के कुल जमा पिछले 12 सालों में जितनी महिलाएं शिक्षिक, इंजीनियर, डाक्टर, बनी, उच्च पदों पर पहुंची और रोजगार के विविध क्षेत्रों में सक्रिय हुईं, वह अद्भुत है। आज महिलाओं ने आईटी, प्रशासन, शिक्षा और विज्ञान जैसे अनेक क्षेत्रों में अपनी भागीदारी बढ़ाकर पहचान बनाई है। 20 वीं सदी में यह संख्या काफी कम थी। आज महिला शिक्षा का प्रतिशत बढ़ा है। आर्थिक रुप से महिलाएं आत्मनिर्भर हो रही हैं, यह अच्छे संकेत है। कुछ न कुछ नकारात्मक पक्ष हमेशा रहे हैं, उन्ही को तो ठीक करने के लिए समाज में संघर्ष चलता रहता है, और आगे भी चलता रहेगा। यह भी सच है कि महिलाओं के प्रति अपराध बढ़े हैं, बाजार के गणित के चलते उनके प्रति दृष्टिकोण में बदलाव आया है, जिस पर गहनता से विचार करने की जरूरत है। कामकाजी व्यस्तताओं के चलते अब वह घर और परिवार के लिए समय कम दे पाती हैं। मौजूदा हालात में अगर सुरक्षा की बेहतर स्थितियां हों तो महिलाओं को रोजगार के अवसर अधिक मिलेंगे और वह तेजी से आगे बढ़ सकेंगीं।

Friday, April 22, 2011

पति-पत्नी के झगड़ों में बच्चों को क्यों दे रहे मौत?

-डॉ. अशोक कुमार मिश्र
मौजूदा दौर में देश के अलग-अलग हिस्सों में ऐसी बहुत सी घटनाएं हो रही हैं जिनमें पति-पत्नी के झगड़ों में बच्चों को मौत मिल रही है। गृहकलह के चलते पहले बच्चों को मौत की नींद सुलाकर खुद भी आत्महत्या करने की घटनाएं किसी भी संवेदनशील मनुष्य को झकझोर जाती हैं। सहज ही मन में यह सवाल उठता है कि इन निर्दोष मासूम बच्चों का क्या कुसूर था? इन्हें क्यों जिंदगी शुरू होने से पहले ही मौत दे दी गई? चिंता की सबसे बड़ी बात यह है कि ऐसी घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं? संभवतया बच्चों की परवरिश कौन करेगा, जैसे सवालके चलते ही खुदकुशी से पहले बच्चों को मार डालने की घटनाएं हो रही हैं। पिछले एक हफ्ते में अगर यूपी में ही ऐसी चार घटनाएं हुई हैं तो संख्या निश्चित रूप से पूरे देश के लिए चौंकाने वाली है जिसकी ओर सभी का ध्यान जाना चाहिए। जरा इन घटनाओं पर गौर करें।
२२ अप्रैल को ऐसी ही दो घटनाएं हुईं। गाजीपुर जिले के सैदपुर इलाके में दहेज केे लिए प्रताडि़त किए जाने से तंग आकर एक विवाहिता ने अपने दो मासूम बच्चों के साथ ट्रेन के आगे कूदकर जान दे दी। मामला खानपुर थाना क्षेत्र के रामपुर गांव का है। यहां के निवासी युवक की शादी वर्ष २००६ में वाराणसी के चोलापुर थाना क्षेत्र स्थित नियार गांव की २४ वर्षीया रजनी के साथ हुई थी। शुक्रवार की सुबह रजनी अपने पुत्री खुशी (०३) और पुत्र युवराज (०१) के साथ सिंधौना आई और वाराणसी से औडि़हार जा रही एक यात्री ट्रेन के आगे कूद गई। तीनों की घटनास्थल पर ही मौत हो गई। हालांकि ससुराल वाले घटना की वजह मामूली पारिवारिक खटपट बता रहे थे, जबकि मृतका के मायके वालों का कहना था कि दहेज में मोटरसाइकिल लाने की मांग को लेकर रजनी को प्रताडि़त किया जा रहा था। इसी कारण वह दोनों बच्चों संग खुुदकुशी करने को मजबूर हुई। मृतका के पिता रामदुलार की ओर से दी गई तहरीर केआधार पर मृतका के पति तथा सास के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया गया है।
दूसरी घटना बहराइच जिले के तुलसीपुर इलाके की है। यहां शादी के 22 साल बाद एक व्यक्ति ने पहली पत्नी के रहते दूसरी शादी रचा ली। पहली पत्नी से छुटकारा पाने के लिए वह अक्सर उसे मारता पीटता। चार बच्चों की मां शकुंतला अपने पति की बेवफाई तो सहन कर गई लेकिन प्रताडऩा बर्दाश्त नहीं कर सकी। उसने पहले अपने बच्चों को जहर मिला कर भोजन खिलाया फिर बाद में वही भोजन खुद भी खा लिया। इलाज के दौरान शकुंतला व उसकी पुत्री उमा देवी (१२) की मौत हो गई। जबकि जबकि तीन बच्चों की हालत नाजुक बनी हुई है। रुपईडीहा पुलिस ने आरोपी पति रामचंदर मिश्रा और उसकी पत्नी ऊषा देवी को गिरफ्तार कर लिया है।
१६ अप्रैल को भी ऐसी ही दो घटनाएं हुईं। मेरठ जिले के परीक्षितगढ़ कसबे में एक महिला ने अपने दो मासूमों को फांसी पर लटका कर खुद भी फांसी लगा ली। गंधार गेट पर रहने वाले प्रवीण की बीवी कविता ने तीन साल के बेटे आदित्य और एक साल की बेटी भावना को छत के कुंडे पर लटका दिया। बाद में खुद भी पंखे से लटककर जान दे दी। पड़ोसियों ने कमरे का दरवाजा तोडक़र शवों को निकाला।
इसी दिन सीतापुर के तालगांव थाना क्षेत्र में पत्नी से विवाद के बाद एक युवक ने अपनी दो बेटियों के साथ शारदा सहायक नहर में छलांग लगा दी। तीनों नहर में बह गए। बहादुरापुर मजरा कल्याणपुर निवासी शमशाद (२५) पुत्र अख्तर अपनी पत्नी रोजनी, दो साल की बेटी सोनी व छह माह की बेटी मोनी के साथ बस से बिसवां जा रहा था। वह तालगांव क्षेत्र के जीतामऊ चौराहे पर बस से उतर गया। इस बीच शमशाद व उसकी पत्नी में किसी बात को लेकर विवाद हो गया। विवाद के बाद शमशाद की पत्नी वापस घर चली गई। इससे नाराज शमशाद ने अपनी दोनों बेटियों के साथ मोहम्मदीपुर गांव के पास नहर में छलांग लगा दी। बिसवां क्षेत्र में बड़ी बेटी सोनी की लाश बरामद हो गई है।
ये घटनाएं इस बात की ओर संकेत कर रही हैं कि पति-पत्नी की कलह के चलते न केवल परिवार बिखर रहे हैं बल्कि बहुत बड़ी संख्या में बच्चों को जिंदगी से मुंह मोडऩे को मजबूर कर दिया जाता है? यह और कोई नहीं करता बल्कि उनके माता-पिता ही कर रहे हैं। सवाल पैदा होता है कि क्या जन्म देने वाले को यह हक है कि वह मौत भी दे दे? यह भी एक बड़ा सवाल है कि कैसे ऐसी दर्दनाक घटनाओं को रोका जाए। इस गंभीर मुद्दे पर समाजशास्त्रियों को भी विचार करने की जरूरत है। किसी भी तरह से बढ़ती हुई ऐसी घटनाओं पर तुरंत रोक लगाना जरूरी है।
( फोटो गूगल सर्च से साभार )

Wednesday, April 20, 2011

रात में रोशन रहने का इतिहास रचता गांव

-डॉ. अशोक कुमार मिश्र
मेरठ जिले के सरधना क्षेत्र के गांव ईकड़ी ने एक नया इतिहास रच दिया है। इक्कीसवीं सदी में जिस देश के बहुत सारे गांव अभी भी विद्युतीकरण से वंचित हों, वहां ईकड़ी ऐसा गांव है जहां रात में बिजली जाने पर भी अब मुख्य मार्गों पर अंधेरा नहीं रहता है। रात में रोशन रहने के मायने में यह गांव देश के लिए मिसाल बनकर उभर रहा है। यूं तो मेरठ जिला कई चीजों केलिए मशहूर रहा है, कभी नौचंदी मेले के लिए, कभी कैंची तो कभी खेल के सामान केलिए। लेकिन पिछले कुछ समय से यह जिला अपराधों केलिए भी जाना जा रहा है। अपराधियों केलिए रात का अंधेरा वारदातों को अंजाम देने केलिए सबसे मुफीद समय होता है। गांवों में रात में बिजली न होने केकारण अपराधियों केहौसले बुलंद रहते हैं। वारदात के बाद अंधेरे का फायदा उठाकर अपराधी बेखौफ फरार हो जाते हैं। लेकिन ईकड़ी गांव में हुआ प्रयोग कामयाब रहा तो बदमाशों केलिए अब रात में वहां भागना मुश्किल होगा। इसकी वजह यह है कि गांव की स्ट्रीट लाइट बिजली गुल होने के बाद भी इन्वर्टर और बैटरी से जगमग रहेंगी। ईकड़ी शायद हिंदुस्तान का अकेला पहला ऐसा गांव है जहां स्ट्रीट लाइट केलिए इन्वर्टर और बैटरी का इंतजाम किया गया है। ग्राम प्रधान अंजना त्यागी ने फिलहाल मुख्य मार्गों पर तीन-तीन इमरजेंसी स्ट्रीट लाइटों के पांच सैट गांव में लगवाए हैं। अगर यह प्रयोग कामयाब रहा तो इनकी संख्या बढ़ा दी जाएगी। इससे गांव को एक फायदा यह भी होगा कि रात में ग्रामीणों को आवागमन में कोई परेशानी नहीं होगी। गांव के बाशिंदों में जहां सुरक्षा की भावना बढ़ेगी, वहीं उनकी जिंदगी की रफ्तार रात में भी सुस्त नहीं होगी। रोजमर्रा के कामकाज निपटाने में भी सहूलियत होगी। रात में पूरे गांव का हमेशा रोशन रहना और एक शानदार मिसाल बनकर उभरना दूसरे गांवों के लिए प्रेरणा का माध्यम बन सकता है।
( फोटो गूगल सर्च से साभार )

Monday, May 31, 2010

घटता आत्मविश्वास, बढ़ती आत्महत्याएं

डॉ. अशोक प्रियरंजन
आजकल जिस तरह से विद्यार्थियों में आत्महत्याएं करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, उससे तो यही लगता है कि कहीं न कहीं आत्मविश्वास की कमी के चलते ही यह घटनाएं होती रहती हैं। सीबीएसई की १२वीं की परीक्षा में फेल होने पर रुड़की की आवास विकास कॉलोनी के प्रदीप चौधरी के बेटे १७ वर्षीय सुमित ने गोली मारकर आत्महत्या कर ली। ऐसा पहली बार नहीं हुआ, हर बार जब भी परीक्षा परिणामों की घोषणा होती है, तभी देश के हर हिस्सों से कुछ ऐसी ही खबरें आती हैं।
दरअसल, आज अभिभावक बच्चों से पढ़ाई और करियर को लेकर बहुत अधिक उम्मीदें रखने लगे हैं। माता-पिता की अपेक्षाओं पर खरा उतरने के लिए वे जी-तोड़ मेहनत भी करते हैं, लेकिन कई बार वे अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर पाते हैं, तो निराशा में आत्महत्या कर लेते हैं। देश में हर साल करीब २४०० छात्र परीक्षा के तनाव या फिर फेल होने पर खुदकुशी करने जैसा कदम उठाते हैं। वर्तमान शिक्षा प्रणाली में विद्यार्थी की मेधा का निर्धारण करने का मानक अर्जित अंकों का प्रतिशत बन गया है। विद्यार्थी मेधावी है, लेकिन यदि उसके परीक्षाफल में अच्छे अंक नहीं आते तो कोई भी उसकी मेधा को स्वीकार नहीं करता है। यह अलग बात है कि कई बार दूसरे कारणों के चलते एक सामान्य विद्यार्थी अधिक अंक ले आता है, जबकि मेधावी विद्यार्थी इस मामले में पिछड़ जाता है। इसी सत्य को पहचान करके अंकों के बजाय ग्रेडिंग सिस्टम को अब तरजीह दी जा रही है। यह वक्त की जरूरत है और विद्यार्थियों में बढ़ती आत्महत्या की प्रवृत्ति को रोकने के लिए बेहद जरूरी भी है।
वस्तुत: मौजूदा भौतिकवादी परिवेश में विविध प्रकार के दबाव कई बार कुछ युवाओं का आत्मविश्वास घटा देते हैं। अलबत्ता देश में बड़ी संख्या में हो रही आत्महत्या की बढ़ती घटनाएं समाज केसभी तबके के लोगों के जीवन में बढ़ रही निराशा, संघर्ष करने की घटती क्षमता और जीने की इच्छाशक्ति की कमी की ओर संकेत करती हैं।
आजकल हर आदमी के अंदर अच्छा घर, कार और आधुनिक जीवन की सभी सुख-सुविधाएं हासिल करने कीलालसा बढ़ती जा रही है। इसके लिए वह जद्दोजहद भी करते हैं। वह अपने सपनों को जल्द पूरा करना चाहता है। सपने टूटते हैं और अपेक्षाएं पूरी नहीं होती हैं, तो आत्मविश्वास की कमी के चलते लोग जिंदगी से मायूस हो जाते हैं। कभी प्रेम में निराशा मिलने पर, तो कभी आर्थिक तंगी या गृहकलह आत्महत्या की वजह बन जाती है। दरअसल, जीवन में सफलता प्राप्त करने केलिए आत्मविश्वास की शक्ति सर्वाधिक आवश्यक है। आत्मविश्वास के अभाव में किसी कामयाबी की कल्पना नहीं की जा सकती है। आत्मविश्वास के सहारे कठिन से कठिन लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है। विद्यार्थी आत्मविश्वास को जागृत करके और मजबूत बनाकर जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता अर्जित कर सकते हंै। वास्तव में आत्मविश्वास की शक्ति अद्भुत होती है।
परीक्षाफल और जिंदगी से मायूस हुए लोगों को सांत्वना देने का काम आस-पास के लोगों या परिजनों को करना चाहिए। बातचीत केमाध्यम से निराशाजनक स्थितियों से गुजर रहे मनुष्य के अंदर जीने की इच्छाशक्ति को मजबूत किया जाना चाहिए। उन्हें जीवन के संघर्ष से घबराने केबजाय मुकाबला करने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए। उनकेमन से निराशा का अंधेरा छंट गया तो निश्चित रूप से उनमें जीवन के प्रति ललक जागृत होगी। उनमें आत्मविश्वास उत्पन्न होगा, तो वे वह भविष्य में जिम्मेदार नागरिक बनकर देश केविकास में अपना योगदान दे पाएंगे।
(फोटो गूगल सर्च से साभार)

Friday, November 13, 2009

घरेलू हिंसा से लहूलुहान महिलाओं का तन और मन


-डॉ. अशोक प्रियरंजन
बेहतर जिंदगी और श्रेष्ठ समाज के लिए सबसे जरूरी चीज है संवेदना । संवेदना यानी दूसरे की वेदना को खुद भी महसूस कर पाना । संवेदना ही मनुष्यता को विस्तार देती है । पारिवारिक सदस्यों में परस्पर संवेदनशीलता जितनी ज्यादा होगी, रिश्ते उतने ही गहरे और मजबूत होंगे । मनुष्य संवेदनशील हो, परिवार संवेदनशील हो और समाज संवेदनशील हो, तो काफी कुछ परेशानियां और दुख खुदबखुद खत्म हो जाएंगे । लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं है । घरेलू हिंसा को लेकर जो ताजा सर्वेक्षण हुआ है, उसने परिवारों खास तौर से पति-पत्नी के रिश्तों में पैदा हो रही संवेदनशीलता की बड़ी खौफनाक तस्वीर पेश की है ।
वर्ष २००५ में बने घरेलू हिंसा निवारण अधिनियम को लेकर राष्ट्रीय महिला आयोग और लॉयर्स कलेक्टिव नामक संस्था ने एक सर्वे कराया । इस सर्वे के मुताबिक कोई भी राज्य ऐसा नहीं है, जहां घरेलू हिंसा से संबंधित मामले सामने नहीं आए हों । घरेलू हिंसा के उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक ३,८९२ मामले दर्ज किए गए, जबकि दिल्ली में ३,४६३ और केरल में ३,१९० मामले सामने आए। आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल में भी घरेलू हिंसा से संबंधित काफी मामले दर्ज हुए हैं ।
घरेलू हिंसा कोई नई नहीं है । सदियों से यह भारतीय समाज में प्रचलित है । घर की चाहरदीवारी में कैद महिलाएं तमाम जुल्म और ज्यादतियों को चुपचाप सह जाती हैं । वह इसे अपने जीवन की नियति मान लेती हैं । मारपीट करने वाला पति उनके लिए देवता बना रहता है । इन स्थितियों के बीच क्यों घरेलू हिंसा निवारण अधिनियम की जरूरत पड़ी ? दरअसल वक्त बदल रहा है । पहले महिलाएं इसलिए जुल्म सहती थीं क्योंकि उनका आर्थिक आधार होता ही नहीं था । पति की उनकी आर्थिक जरूरतों को पूरा करने का माध्यम था । अब महिलाएं स्वाबलंबी हो रही हैं । खुद अपने पैरों पर खड़ी हो रही हैं तो फिर क्यों पति का जुल्म बरदाश्त करें ? पहले शिक्षित लड़कियों और महिलाओं की संख्या कम थी ? लड़कियों को बाहर जाकर पढऩे लिखने की आजादी बहुत कम थी । अशिक्षा उनके आत्मविश्वास को इतना कमजोर कर देती थी कि वह कोई आवाज ही नहीं उठा पाती थीं । पति का जुल्म भी इसीलिए चुपचाप बरदाश्त करती थीं ।
अब लड़कियों और महिलाओं की जिंदगी में व्यापक बदलाव आ रहा है । वह पढ़ाई के लिए मनपसंद स्कूल-कालेजों में जा रही हैं । घर की दहलीज लांघकर नौकरी करने के लिए बाहर निकल रही हैं । आर्थिक रूप से भी मजबूत हो रही हैं। ऐसे में वह घरेलू हिंसा को क्यों सहन करें ?
गहराई से विचार करें तो पता चलेगा कि घरेलू हिंसा के मामलों का दर्ज होना अच्छा भी है और खराब भी । अच्छा इसलिए क्योंकि यह महिलाओं के साहस का भी प्रतीक है कि वह पति की ज्यादतियों का प्रतिकार कर रही हैं । अपने हक की लड़ाई के लिए आवाज बुलंद कर रही हैं । खराब इसलिए कि तमाम सामाजिक जागरूकता और शिक्षा के बाद भी घरों के अंदर ही अच्छा माहौल नहीं बन पा रहा। महिलाओं को यथोचित सम्मान नहीं मिल पा रहा । इतनी बड़ी संख्या में महिलाएं घरेलू हिंसा का शिकार हो रही हैं। वह हिंसा जो महिला के तन को ही नहीं मन को भी घायल कर देती है । सभ्य समाज के लिए घरेलू हिंसा कलंक की ही तरह है। इसे रोकने के लिए गंभीरता से प्रयास होने चाहिए ।
(फोटो गूगल सर्च से साभार)

Saturday, May 30, 2009

फेल होने पर खत्म नहीं हो जाती जिंदगी

डॉ. अशोक प्रियरंजन
ऐसा पहली बार नहीं हुआ। हर साल परीक्षाफल आने के दिनों में ऐसा ही होता है। फेल होने पर कई छात्र-छात्राएं जिंदगी से मुंह मोड़ लेते हैं। इस बार यह संख्या कुछ ज्यादा महसूस हुई। शनिवार ३० मई को हाईस्कूल में फेल होने पर मेरठ शहर में ही तीन छात्राओं ने अपनी जान दे दी। जिन आंखों ने अभी पूरी तरह सपने भी नहीं सजाए थे, वे हमेशा के लिए बंद हो गई। इन मासूमों की मौत उनके परिजनों के लिए कभी न मिटने वाला दर्द दे गईं। ऐसे में सहज ही यह सवाल खड़ा हो जाता है कि क्या जिंदगी से बड़ा है कैरियर का ग्राफ? क्या फेल हो जाने मात्र से ही बंद हो जाते हैं जिंदगी के सारे रास्ते? क्या फेल होना इतना अपमानजनक है कि जिंदगी ही दांव पर लगा दी जाए? इन सवालों के जवाब तलाश करने के लिए वैचारिक मंथन जरूरी है।
एक कड़वा सच यह है कि देश में हर साल करीब २४०० छात्र परीक्षा के तनाव या फिर फेल होने पर खुदकुशी कर लेते हैं। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह यह है कि आज अभिभावक बच्चों से पढ़ाई और करियर को लेकर बहुत अधिक उम्मीदें रखने लगे हैं। माता-पिता की अपेक्षाओं पर खरा उतरने के लिए वह जी-तोड़ मेहनत भी करते हैं लेकिन कई बार वह अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर पाते हैं तो निराशा में आत्महत्या कर लेते हैं। परीक्षा में फेल होने वाले बच्चों की खुदकुशी केपीछे यही मानसिकता होती है।
अलबत्ता आत्महत्या की बढ़ती घटनाएं विद्यार्थियों के जीवन में बढ़ रही निराशा, संघर्ष करने की घटती क्षमता और जीने की इच्छाशक्ति की कमी की ओर भी संकेत करती हैं। मौजूदा समय के भौतिकवादी माहौल ने लोगों की महत्वाकांक्षाओं और अपेक्षाओं को काफी बढ़ा दिया है। अभिभावक परीक्षा के अंकों को जिंदगी से जोड़ देते हैं। अधिक अंक का पाने का सपना टूटता है और अपेक्षाएं पूरी नहीं होती हैं तो विद्यार्थी जिंदगी से ही मायूस हो जाते हैं। इसीलिए छात्र-छात्राओं में आत्महत्या की घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं।
ऐसी स्थिति में अभिभावकों और शिक्षकों का दायित्व है कि वे बच्चों में आत्मविश्वास, जीवन के प्रति दायित्वबोध और आगे बढऩे का भाव जागृत करें। उन्हें बताएं कि अंक कम आने मात्र या फेल हो जाने से जिंदगी में आगे बढऩे की प्रक्रिया खत्म नहीं हो जाती। हर बच्चे में कुछ प्रतिभा होती है। शिक्षकों और अभिभावकों को बच्चे की उस प्रतिभा को पहचानकर उसके आगे बढऩे का रास्ता बताना चाहिए। इससे बच्चे में आत्मविश्वास पैदा होगा और यही आत्मविश्वास उसमें जिंदगी के प्रति मोह भी पैदा करेगा।
(फोटो गूगल सर्च से साभार)

Friday, December 12, 2008

आत्मïिवश्वास के सहारे जीतें जिंदगी की जंग

-डॉ. अशोक प्रियरंजन
आत्मविश्वास की कमी के चलते अब हजारों लोग जिंदगी की जंग हारकर मौत को गले लगा लेते हैं । आत्महत्या की बढती घटनाएं समाज के विविध वर्ग के लोगों के जीवन में बढ़ रही निराशा, संघर्ष करने की घटती क्षमता और जीने की इच्छाशक्ति की कमी की ओर संकेत करती हैं। २००७ में करीब २७५० लोगों ने खुदकुशी की जबकि २००६ में ३०९९ लोगों ने मौत को गले लगा लिया । बीते छह सालों में अकेले उत्तर प्रदेश में आत्महत्या का औसत ३४०० रहा है ।
मौजूदा समय के भौतिकवादी माहौल ने लोगों की महत्वाकांक्षाओं और अपेक्षाओं को काफी बढा दिया है। अब आदमी के अंदर अच्छा घर, कार और आधुनिक जीवन की सभी सुख सुविधाएं हासिल करने की लालसा बढती जा रही है । वह अपने सपनों को जल्द पूरा करना चाहता है । सपने टूटते हैं और अपेक्षाएं पूरी नहीं होती हैं तो आत्मविश्वास की कमी के चलते लोग जिंदगी से मायूस हो जाते हैं । बडी संख्या में युवाओं का जीवन के प्रति मोहभंग होना पूरे समाज के लिए चिंता का विषय है । देश में हर साल करीब २४०० छात्र परीक्षा के तनाव या फिर फेल होने पर खुदकुशी कर लेते हैं । कभी प्रेम में निराशा मिलने पर तो कभी अर्थिक तंगी या गृहकलह आत्महत्या की वजह बन जाती है ।
दरअसल, जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए आत्मविश्वास की शक्ति सर्वाधिक आवश्यक है । आत्मविश्वास के अभाव में किसी कामयाबी की कल्पना नहीं की जा सकती है । आत्मविश्वास के सहारे कठिन से कठिन लक्ष्य को प्राप्त करना भी सरल हो जाता है । राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने आत्मविश्वास के सहारे ही ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष किया । यह उनका आत्मविश्वास ही था जिसके सहारे उन्होंने अहिंसा के रास्ते पर चलकर देश को अंग्रेजों की दासता से मुक्त कराया । आत्मविश्वास शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है-आत्म और विश्वास । यहां आत्मा से आशय अंतर्मन से है । विश्वास का अर्थ भरोसा होता है । वस्तुत: अंतर्मन के भरोसे को ही आत्मविश्वास कहते है ं। आत्मविश्वास मनुष्य के अंदर ही समाहित होता है । आंतरिक शक्तियों को एकीकृत करके आत्मविश्वास को मजबूत किया जा सकता है।
आत्मविश्वास को जागृत करके और मजबूत बनाकर जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता अर्जित की जा सकती है । सत्य, सदाचार, ईमानदारी, सहृदयता आदि मानवीय गुणों को धारण करके आत्मविश्वास का संचार किया जा सकता है । आत्मविश्वास से भरे विद्यार्थी परीक्षा में सफलता प्राप्त करते हैं । रोजगार और व्यवसाय में भी उन्नति के शिखर पर पहुंचने का आधार आत्मविश्वास ही होता है । बडी से बडी समस्या भी उन्हें जिंदगी में आगे बढऩे से नहीं रोक सकती। आत्मविश्वास से दैदीप्य व्यक्तित्व ही समाज को नई दिशा देने में समर्थ होता है । वास्तव में आत्मविश्वास की शक्ति अद्भुत होती है ।
प्रत्येक मनुष्य को सदैव आत्मविश्वास को मजबूत बनाए रखना चाहिए तभी वह जीवन में उन्नति कर सकता है । जिंदगी से मायूस हुए लोगों को ढाढस बंधाने का काम परिजनों अथवा उनके निकट के लोगों को करना चाहिए । बातचीत के माध्यम से निराशाजनक स्थितियों से गुजर रहे मनुष्य के अंदर जीने की इच्छाशक्ति को मजबूत किया जाना चाहिए । विविध प्रेरणादायक प्रसंगों की जानकारी देकर उन्हें जीवन के संघर्ष से घबराने के बजाय मुकाबला करने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए । उनके मन से निराशा का अंधेरा छंट गया तो निश्चित रूप से उनमें जीवन के प्रति ललक जागृत होगी । उनमें आत्मविश्वास उत्पन्न होगा तो वह वह भविष्य में जिम्मेदार नागरिक बनकर देश के विकास में अपना योगदान दे पाएंगे ।
(फोटो गूगल सर्च से साभार)