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Tuesday, March 12, 2013

नए अध्यादेश से मिलेगी महिलाओं को सुरक्षा, रुकेंगे अपराध


डा. अशोक कुमार मिश्र
महिलाओं की सुरक्षा संबंधी कानून के विधेयक के मसौदे पर गहन मंथन के बाद भी कैबिनेट की बैठक में सहमति न बन पाने की स्थिति कई सवाल खड़े करती है। मसौदे के कड़े प्रावधानों को लेकर मंजूरी से पहले ही इसके दुरुपयोग की आशंका पैदा हो रही है जिसके चलते मंत्रियों तक को पसीने छूट रहे हैं। सवाल पैदा होता है कि दुरूपयोग की आशंका के चलते क्या सख्त कानून ही न बनाए जाएं। फिर कैसे अपराधों पर रोक लगेगी। बलात्कार की घटनाएं जिस तेजी से बढ़ रही हैं, उसके चलते जरूरी है कि इसकी रोकथाम के लिए कड़े कानून हों और उनका सही तरीके अनुपालन होना चाहिए। कानून का अगर दुरुपयोग होता है तो इसके लिए भी हमारी पुलिस और प्रशासनिक व्यवस्था ही दोषी होती है। पहली इस तरह के जघन्य अपराध को लेकर जो सामाजिक जागरूकता पैदा हुई है, सरकार ने जिस तरह से गंभीर मंथन किया है, उसका सम्मान करते हुए बिना किसी राजनीति के विधेयक को अंतिम रूप दे दिया जाना चाहिए। कई मायनों में दुष्कर्म विरोधी अध्यादेश महत्वपूर्ण है।
 इस अध्यादेश से महिलाओं के खिलाफ यौन अपराधों पर लगाम लगाना संभव होगा। प्रस्तावित आपराधिक कानून (संशोधन) विधेयक -2013 में बलात्कार की परिभाषा में ही बदलाव लाने का प्रस्ताव है। इसके लागू होने पर अंतरंग अंगों का किसी भी प्रकार से स्पर्श बलात्कार के दायरे में आएगा। इसका असर यह होगा कि अभी तक अंतरंग अंगों के स्पर्श के जो मामले छेड़छाड़ में दर्ज होते थे, यौन हमलों के दायरे में आते थे, वे अब बलात्कार के दायरे में आएंगे और दोषियों को इसी कानून के तहत सजा मिलेगी। गौरतलब है कि छेड़छाड़ की सर्वाधिक घटनाएं होती हैं जिनमें से संकोचवश अनेक मामले तो पुलिस में दर्ज भी नहीं कराए जाते हैं। यहां पर यह बहस का मुद्दा रहा कि यौन उत्पीड़न शब्द को ही बरकरार रखा जाए अथवा इसके लिए बलात्कार शब्द रखा जाना चाहिए। अब बलात्कार शब्द पर ही सहमति बन रही है।
दुष्कर्म रोधी विधेयक में यह भी प्रावधान है कि कोई डाक्टर यदि बलात्कार पीडित के इलाज से मना करता है तो उसके लिए पांच से सात साल तक की सजा हो सकती है। यह बहुत जरूरी है। इलाज के अभाव में महिलाओं की स्थिति बिगड़ जाती थी और डाक्टर कानूनी पचडे में पड़ने से बचने के लिए उसके इलाज से कतराते थे। पुलिस पर भी अध्यादेश के मार्फत लगाम कसी गई है। अगर कोई पुलिस अफसर बलात्कार के मामले की जांच करने में नाकाम रहता है तो उसे भी इस स्थिति में छह माह की सजा हो सकती है। गैंगरेप के मामलों में भी आरोपियों को पीड़त के इलाज और पुनर्वास का खर्च उठाना होगा। अध्यादेश के इस प्रावधान से पीड़ित महिला को आर्थिक सुरक्षा मिलेगी। यह अच्छी पहल है और न्याय संगत भी। सरकार ने सहमति से शारीरिक संबंध बनाने की उम्र भी 18 वर्ष से घटाकर 16 साल कर दी है। इसके भी दूरगामी परिणाम अच्छे ही होंगे। अदालती आदेश पर अलग हो चुकी पत्नी के साथ भी शारीरिक संबंध बनाना बलात्कार के दायरे में आएगा। इसके लिए दो से सात साल तक की सजा का प्रावधान किया गया है।
अध्यादेश लागू होता है तो इसके प्रावधान निश्चित रूप से महिलाओं को सुरक्षा प्रदान करने में समर्थ होंगे। इसलिए जरूरी है कि सरकार आम राय बनाकर इसे पारित कर दे। यह वक्त की जरूरत है। दुरुपयोग न हो, इसके लिए व्यवस्था की जानी चाहिए। सरकारी तंत्र सतर्क रहेगा तो कोई वजह नहीं कि दुरुपयोग हो पाए।

Friday, April 22, 2011

पति-पत्नी के झगड़ों में बच्चों को क्यों दे रहे मौत?

-डॉ. अशोक कुमार मिश्र
मौजूदा दौर में देश के अलग-अलग हिस्सों में ऐसी बहुत सी घटनाएं हो रही हैं जिनमें पति-पत्नी के झगड़ों में बच्चों को मौत मिल रही है। गृहकलह के चलते पहले बच्चों को मौत की नींद सुलाकर खुद भी आत्महत्या करने की घटनाएं किसी भी संवेदनशील मनुष्य को झकझोर जाती हैं। सहज ही मन में यह सवाल उठता है कि इन निर्दोष मासूम बच्चों का क्या कुसूर था? इन्हें क्यों जिंदगी शुरू होने से पहले ही मौत दे दी गई? चिंता की सबसे बड़ी बात यह है कि ऐसी घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं? संभवतया बच्चों की परवरिश कौन करेगा, जैसे सवालके चलते ही खुदकुशी से पहले बच्चों को मार डालने की घटनाएं हो रही हैं। पिछले एक हफ्ते में अगर यूपी में ही ऐसी चार घटनाएं हुई हैं तो संख्या निश्चित रूप से पूरे देश के लिए चौंकाने वाली है जिसकी ओर सभी का ध्यान जाना चाहिए। जरा इन घटनाओं पर गौर करें।
२२ अप्रैल को ऐसी ही दो घटनाएं हुईं। गाजीपुर जिले के सैदपुर इलाके में दहेज केे लिए प्रताडि़त किए जाने से तंग आकर एक विवाहिता ने अपने दो मासूम बच्चों के साथ ट्रेन के आगे कूदकर जान दे दी। मामला खानपुर थाना क्षेत्र के रामपुर गांव का है। यहां के निवासी युवक की शादी वर्ष २००६ में वाराणसी के चोलापुर थाना क्षेत्र स्थित नियार गांव की २४ वर्षीया रजनी के साथ हुई थी। शुक्रवार की सुबह रजनी अपने पुत्री खुशी (०३) और पुत्र युवराज (०१) के साथ सिंधौना आई और वाराणसी से औडि़हार जा रही एक यात्री ट्रेन के आगे कूद गई। तीनों की घटनास्थल पर ही मौत हो गई। हालांकि ससुराल वाले घटना की वजह मामूली पारिवारिक खटपट बता रहे थे, जबकि मृतका के मायके वालों का कहना था कि दहेज में मोटरसाइकिल लाने की मांग को लेकर रजनी को प्रताडि़त किया जा रहा था। इसी कारण वह दोनों बच्चों संग खुुदकुशी करने को मजबूर हुई। मृतका के पिता रामदुलार की ओर से दी गई तहरीर केआधार पर मृतका के पति तथा सास के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया गया है।
दूसरी घटना बहराइच जिले के तुलसीपुर इलाके की है। यहां शादी के 22 साल बाद एक व्यक्ति ने पहली पत्नी के रहते दूसरी शादी रचा ली। पहली पत्नी से छुटकारा पाने के लिए वह अक्सर उसे मारता पीटता। चार बच्चों की मां शकुंतला अपने पति की बेवफाई तो सहन कर गई लेकिन प्रताडऩा बर्दाश्त नहीं कर सकी। उसने पहले अपने बच्चों को जहर मिला कर भोजन खिलाया फिर बाद में वही भोजन खुद भी खा लिया। इलाज के दौरान शकुंतला व उसकी पुत्री उमा देवी (१२) की मौत हो गई। जबकि जबकि तीन बच्चों की हालत नाजुक बनी हुई है। रुपईडीहा पुलिस ने आरोपी पति रामचंदर मिश्रा और उसकी पत्नी ऊषा देवी को गिरफ्तार कर लिया है।
१६ अप्रैल को भी ऐसी ही दो घटनाएं हुईं। मेरठ जिले के परीक्षितगढ़ कसबे में एक महिला ने अपने दो मासूमों को फांसी पर लटका कर खुद भी फांसी लगा ली। गंधार गेट पर रहने वाले प्रवीण की बीवी कविता ने तीन साल के बेटे आदित्य और एक साल की बेटी भावना को छत के कुंडे पर लटका दिया। बाद में खुद भी पंखे से लटककर जान दे दी। पड़ोसियों ने कमरे का दरवाजा तोडक़र शवों को निकाला।
इसी दिन सीतापुर के तालगांव थाना क्षेत्र में पत्नी से विवाद के बाद एक युवक ने अपनी दो बेटियों के साथ शारदा सहायक नहर में छलांग लगा दी। तीनों नहर में बह गए। बहादुरापुर मजरा कल्याणपुर निवासी शमशाद (२५) पुत्र अख्तर अपनी पत्नी रोजनी, दो साल की बेटी सोनी व छह माह की बेटी मोनी के साथ बस से बिसवां जा रहा था। वह तालगांव क्षेत्र के जीतामऊ चौराहे पर बस से उतर गया। इस बीच शमशाद व उसकी पत्नी में किसी बात को लेकर विवाद हो गया। विवाद के बाद शमशाद की पत्नी वापस घर चली गई। इससे नाराज शमशाद ने अपनी दोनों बेटियों के साथ मोहम्मदीपुर गांव के पास नहर में छलांग लगा दी। बिसवां क्षेत्र में बड़ी बेटी सोनी की लाश बरामद हो गई है।
ये घटनाएं इस बात की ओर संकेत कर रही हैं कि पति-पत्नी की कलह के चलते न केवल परिवार बिखर रहे हैं बल्कि बहुत बड़ी संख्या में बच्चों को जिंदगी से मुंह मोडऩे को मजबूर कर दिया जाता है? यह और कोई नहीं करता बल्कि उनके माता-पिता ही कर रहे हैं। सवाल पैदा होता है कि क्या जन्म देने वाले को यह हक है कि वह मौत भी दे दे? यह भी एक बड़ा सवाल है कि कैसे ऐसी दर्दनाक घटनाओं को रोका जाए। इस गंभीर मुद्दे पर समाजशास्त्रियों को भी विचार करने की जरूरत है। किसी भी तरह से बढ़ती हुई ऐसी घटनाओं पर तुरंत रोक लगाना जरूरी है।
( फोटो गूगल सर्च से साभार )

Friday, November 13, 2009

घरेलू हिंसा से लहूलुहान महिलाओं का तन और मन


-डॉ. अशोक प्रियरंजन
बेहतर जिंदगी और श्रेष्ठ समाज के लिए सबसे जरूरी चीज है संवेदना । संवेदना यानी दूसरे की वेदना को खुद भी महसूस कर पाना । संवेदना ही मनुष्यता को विस्तार देती है । पारिवारिक सदस्यों में परस्पर संवेदनशीलता जितनी ज्यादा होगी, रिश्ते उतने ही गहरे और मजबूत होंगे । मनुष्य संवेदनशील हो, परिवार संवेदनशील हो और समाज संवेदनशील हो, तो काफी कुछ परेशानियां और दुख खुदबखुद खत्म हो जाएंगे । लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं है । घरेलू हिंसा को लेकर जो ताजा सर्वेक्षण हुआ है, उसने परिवारों खास तौर से पति-पत्नी के रिश्तों में पैदा हो रही संवेदनशीलता की बड़ी खौफनाक तस्वीर पेश की है ।
वर्ष २००५ में बने घरेलू हिंसा निवारण अधिनियम को लेकर राष्ट्रीय महिला आयोग और लॉयर्स कलेक्टिव नामक संस्था ने एक सर्वे कराया । इस सर्वे के मुताबिक कोई भी राज्य ऐसा नहीं है, जहां घरेलू हिंसा से संबंधित मामले सामने नहीं आए हों । घरेलू हिंसा के उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक ३,८९२ मामले दर्ज किए गए, जबकि दिल्ली में ३,४६३ और केरल में ३,१९० मामले सामने आए। आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल में भी घरेलू हिंसा से संबंधित काफी मामले दर्ज हुए हैं ।
घरेलू हिंसा कोई नई नहीं है । सदियों से यह भारतीय समाज में प्रचलित है । घर की चाहरदीवारी में कैद महिलाएं तमाम जुल्म और ज्यादतियों को चुपचाप सह जाती हैं । वह इसे अपने जीवन की नियति मान लेती हैं । मारपीट करने वाला पति उनके लिए देवता बना रहता है । इन स्थितियों के बीच क्यों घरेलू हिंसा निवारण अधिनियम की जरूरत पड़ी ? दरअसल वक्त बदल रहा है । पहले महिलाएं इसलिए जुल्म सहती थीं क्योंकि उनका आर्थिक आधार होता ही नहीं था । पति की उनकी आर्थिक जरूरतों को पूरा करने का माध्यम था । अब महिलाएं स्वाबलंबी हो रही हैं । खुद अपने पैरों पर खड़ी हो रही हैं तो फिर क्यों पति का जुल्म बरदाश्त करें ? पहले शिक्षित लड़कियों और महिलाओं की संख्या कम थी ? लड़कियों को बाहर जाकर पढऩे लिखने की आजादी बहुत कम थी । अशिक्षा उनके आत्मविश्वास को इतना कमजोर कर देती थी कि वह कोई आवाज ही नहीं उठा पाती थीं । पति का जुल्म भी इसीलिए चुपचाप बरदाश्त करती थीं ।
अब लड़कियों और महिलाओं की जिंदगी में व्यापक बदलाव आ रहा है । वह पढ़ाई के लिए मनपसंद स्कूल-कालेजों में जा रही हैं । घर की दहलीज लांघकर नौकरी करने के लिए बाहर निकल रही हैं । आर्थिक रूप से भी मजबूत हो रही हैं। ऐसे में वह घरेलू हिंसा को क्यों सहन करें ?
गहराई से विचार करें तो पता चलेगा कि घरेलू हिंसा के मामलों का दर्ज होना अच्छा भी है और खराब भी । अच्छा इसलिए क्योंकि यह महिलाओं के साहस का भी प्रतीक है कि वह पति की ज्यादतियों का प्रतिकार कर रही हैं । अपने हक की लड़ाई के लिए आवाज बुलंद कर रही हैं । खराब इसलिए कि तमाम सामाजिक जागरूकता और शिक्षा के बाद भी घरों के अंदर ही अच्छा माहौल नहीं बन पा रहा। महिलाओं को यथोचित सम्मान नहीं मिल पा रहा । इतनी बड़ी संख्या में महिलाएं घरेलू हिंसा का शिकार हो रही हैं। वह हिंसा जो महिला के तन को ही नहीं मन को भी घायल कर देती है । सभ्य समाज के लिए घरेलू हिंसा कलंक की ही तरह है। इसे रोकने के लिए गंभीरता से प्रयास होने चाहिए ।
(फोटो गूगल सर्च से साभार)

Sunday, September 21, 2008

टूटते रिश्ते, दरकते संबंध

भारत ऐसा देश रहा है जहां सामाजिक और पारिवारिक संबंधों को विशेष महत्व दिया जाता रहा है । रिश्तों की आत्मीयता भारतीय संस्कृति में रची बसी है । भारतीय संस्ृति में जीवित होने पर ही नहीं बल्कि मृत्यु होने के बाद भी रिश्ते का निर्वाह किया जाता है । यह संबंधों के प्रति लगाव ही है कि भारत में पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पितृपक्ष पर तर्पण की परंपरा है । भारतवासियों को सदैव रिश्ते निभाने की गौरवशाली परंपरा पर गर्व रहा है । विदेशियों के लिए भी भारतीय संसकिरिति का यह पक्ष बडा आकर्षित करता रहा है । लेकिन पिछले कुछ समय से स्थितियां बदली है ।
भौतिकतावाद, उपभोक्तावाद, आधुनिकीकरण, वैश्वीकरण, बाजारवाद, बदलते जीवन मूल्यों, नैतिक मूल्यों के पतन, संयुक्त परिवार के विघटन और नित नए आकार लेती महत्वाकांक्षाओं ने व्यक्ति की मानसिकता को गहराई से प्रभावित किया है । यही वजह है रिश्तों की आत्मीयता में जो गरमाहट थी, वह कुछ कम होने लगी है । सामाजिक संबंधों में जो निकटता थी, वह घटने लगी है । कई बार ऐसा लगता है कि मौजूदा समय में रिश्ते टूटने लगे हैं और संबंध दरकने लगे हैं।
२० सितंबर को बिजनौर जिले में एक व्यक्ति ने दो सगे भाइयों के साथ अपनी मां और १० वर्षीय पुत्री की धारदार हथियारों से हत्या कर दी । वजह थी सिर्फ १४ बीघा जमीन जो मां के नाम थी । यह जमीन बेेटे हथियाना चाहते थे । इस घटना के संदर्भ बडे व्यापक हैं और पूरे समाज के सामने कई सवाल खडे करते है ं। क्या आज संपत्ति मां और पुत्री से ज्यादा महत्वपूर्ण होने लगी है? क्या समाज में हिंसक प्रवृत्तियां अधिक प्रभावशाली होने लगी हैं? क्या हम भारतीय संस्कृति के मूलभूत सिद्धांतों को भूलने लगे हैं? इन सवालों पर विचार करना जरूरी है । अगर भारतीय समाज में संबंधों की जडें़कमजोर हुईं तो इसका असर सीधा संस्कृति पर पडेगा ।
दरअसल बदले भौतिकवादी परिवेश ने संयुक्त परिवार की अवधारणा को बहुत गहराई से प्रभावित किया है । रोजगार के सिलसिले और स्वतंत्र रूप से जीवनयापन की इच्छाओं ने एकल परिवार की परंपरा को बढावा दिया । इसका परिणाम यह हो गया कि अब सिर्फ पति, पत्नी और बच्चों को ही परिवार का हिस्सा माना जाने लगा है । अन्य रिश्तों के प्रति लगाव घटता जा रहा है । उनमें परस्पर आत्मीयता भी घटती जा रही है । तीज त्योहारों और विवाह आदि अवसरों पर ही संयुक्त परिवार की झलक दिखाई देती है । पारिवारिक सदस्यों में दूरियां बढऩे से परस्पर संबंधों में दरार पडऩे लगी । ऐसे में कई बार रिश्ता गौण और स्वार्थ प्रमुख हो जाता है ।
पहले आर्थिक समृद्धि जिन रिश्तों को जोडती थी आज उनमें ईष्र्या पैदा कर रही है । एक भाई अगर अमीर है और दूसरा गरीब तो फिर उनमें रिश्तों की आत्मीयता की जगह एक खास किस्म की दूरी महसूस की जा सकती है । भारतीय समाज और संस्कृति के लिए यह अच्छे संकेत नहीं है ं। इस बदलाव की अभिव्यक्ति भी अब विविध माध्यमों से होने लगी है । बागवान फिल्म में रिश्तों में आ रहे इस बदलाव को बडी कलात्मकता के साथ परदे पर उतारा गया है । सचमुच बदलते परिवेश में अब बच्चे दादा-दादी के प्यार, ताऊ-ताई के दुलार से वंचित होने लगे हैं । अपनी जिद पूरी कराने के लिए अब उन्हें चाचा-चाची नहीं मिल पाते हैं । बुआ-फूफा, मामा-मामी, मौसा-मौसी से भी खास मौके पर ही मुलाकात हो पाती है । अब कहानियां सुनाने के लिए उनके पास बुजुर्ग होते ही नहीं है ं। इन स्थितियों पर वैचारिक मंथन की जरूरत है । हमें इस ओर ध्यान देना होगा । नई पीढ़ी को रिश्तों का अहसास कराना होगा । ऐसे प्रयास करने होंगे जिससे सामाजिक और पारिवारिक रिश्ते मजबूत हों । रिश्तों की आत्मीयता, संवेदनशीलता और प्रेम गहरा होगा, तभी समाज मजबूत होगा ।