Monday, January 17, 2011

विश्वविद्यालयों में बहने लगी ब्लाग की बयार

डॉ. अशोक कुमार मिश्र
पिछले दो वर्षों के दौरान ब्लाग को अकादमिक क्षेत्रों में जिस गंभीरता से लिया जा रहा है, वह हिंदी ब्लागिंग के लिए नई संभावनाओं के द्वार खोलने में समर्थ है। पहले इलाहाबाद में ब्लागर सम्मेलन, वर्धा में ब्लागिंग की आचार संहिता पर राष्ट्रीय संगोष्ठी, दिल्ली ब्लागर मीट, खटीमा में ब्लागर संगोष्ठी, इंदौर की गायत्री शर्मा और धर्मशाला के केवलराम का हिंदी ब्लाग पर पीएचडी की उपाधि केलिए शोध करना इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि हिंदी ब्लाग अब इस स्थिति में पहुंच चुका है कि उस पर शोध कर निष्कर्ष निकाले जाएं ताकि भविष्य की दिशा और संभावनाएं रेखांकित की जा सकें। खुद मैने महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय विश्वविद्यालय, वर्धा, महाराष्ट्र में ०९-१० अक्टूबर को आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में ब्लागरी में नैतिकता का प्रश्न और आचार संहिता की परिकल्पना, हरियाणा के पलवल स्थित गोस्वामी गणेशदत्त सनातन धर्म स्नातकोत्तर महाविद्यालय, में २२-२३ अक्टूबर को आयोजित राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी में ब्लाग का विधायी स्वरूप और उसकी भाषा संरचना, मुरादादाबाद स्थित महाराजा हरिश्चंद्र कॉलेज में १४-१५ नवंबर को आयोजित राष्टï्रीय हिंदी संगोष्ठी में सूचना तकनीक और हिंदी पत्रकारिता विषय पर शोधपत्र प्रस्तुत किया जिसमें ब्लाग पर वैचारिक मंथन किया गया। इसके साथ ही ब्लाग पर दो अन्य शोधपत्र मैने लिखे जो यमुनानगर और दिल्ली में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय संगोष्ठी में प्रस्तुत किए जाने हैं। इसी हफ्ते मुझे सूचना मिली कि कल्याण में अगले माह ब्लाग पर राष्ट्रीय संगोष्ठी होने जा रही है। विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में बह रही ब्लाग की बयार उम्मीदों के नए झोंके लेकर आएगी, ऐसा विश्वास है। रोजाना हिंदी चिट्ठे बढ़ रहे हैं, यह भी सुखद संकेत हैं। ब्लाग पर प्रस्तुत लेखन में गुणवत्ता का समावेश करना समय की सबसे बड़ी चुनौती है।
इस बीच ब्लागवाणी और चिट्ठाजगत जैसे एग्रीगेटरों का बंद होना कुछ चिंतित करता है। एग्रीगेटर ब्लाग के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और वजह चाहे कुछ भी हो लेकिन इनका बंद होना तकलीफदेह है। ब्लाग को बेहतर और बहुआयामी बनाने की दिशा में काम किया जाना चाहिए तभी इसकी सार्थकता है।

Wednesday, January 12, 2011

तीन घंटे की रिपोर्टिंग में कैसे हो सच का संधान

-डॉ. अशोक प्रियरंजन
अखबारों में बदली कार्यप्रणाली के चलते सच की खोजबीन का काम बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। अखबार का बुनियादी काम सच को सामने लाने का है और इस काम को अंजाम देते हैं अखबार के रिपोर्टर। अब से करीब २० साल पहले रिपोर्टरों के पास मोबाइल नहीं थे। लैंडलाइन फोन भी चुनींदा रिपोर्टर के पास होते थे। इस कारण मौके पर जाक र रिपोर्टिंग करना उनकी मजबूरी होती थी। उस समय सुबह को अखबारों केदफ्तरों में मीटिंग की भी परंपरा नहीं थी। नतीजा यह कि संवाददाता मीटिंग के दबाव से मुक्त होकर समाचार तलाशने के दबाव में रहता था। इस कारण उसे अधिक समय फील्ड में बिताना पड़ता था और फिर इसका नतीजा यह होता था कि कुछ बेहतर खबरें उसके हाथ लग जाती थीं। यहीं वह खबरें होती थीं जो प्रिंट मीडिया को पहचान देती थीं। यह मिशनरी से व्यावसायिक पत्रकारिता की शुरुआत का दौर था।
अब मिशनरी भाव से मुक्त होकर पत्रकारिता पूरी तरह व्यावसायिक चोला अख्तियार कर चुकी है। इस दौरान कर कई बार पिं्रट मीडिया से जुड़े लोग शिकायत करते हैं कि अब अखबारनवीसी में सिर्फ रुटीन की खबरें हो कवर हो पाती हैं। अब संवाददाता धमाकेदार खबरें कम जुटा पाते हैं। पुराने पत्रकार अपनी समकालीन खबरों के उदाहरण अक्सर नए पत्रकारों को देते हैं। दरअसल, इसके लिए कुछ बदलाव भी जिम्मेदार है। पत्रकारिता के व्यवसाय बनने से पत्रकारों की कार्यप्रणाली भी प्रभावित हुई है। अब सुबह को रिपोर्टरों का सबसे पहला काम रिपोर्टिंग टीम की मीटिंग में शामिल होना होता है। यह मीटिंग आम तौर पर १०-११ बजे शुरू होती हैं और कम से कम एक घंटा चलती हैं। दोपहर तक मीटिंग में शामिल होने के कारण संवाददाता इस अवधि में होने वाले कार्यक्रमों में शामिल नहीं हो पाते। सबसे ज्यादा इस दौरान स्कूलों और धार्मिक स्थलों पर कार्यक्रम होते हैं। यह तमाम कार्यक्रम विज्ञप्ति के आधार पर ही प्रकाशित हो पाते हैं। दोपहर बाद करीब एक घंटे का समय संवाददाता को मिल पाता है। इसके बाद वह भोजन करने जाते हैं। फिर पांच बजे तक आफिस पहुंचने से पहले के दो घंटे उन्हें रिपोर्टिंग के लिए मिल पाते हैं। पूरे दिन में कुल जमा तीन घंटे की रिपोर्टिंग में कैसे सत्य के संधान किया जाए, यह यक्ष प्रश्न है।
एक संकट और है, कई बार संवाददाता बैठक में शामिल होने को ही अपने काम की इतिश्री मान लेते हैं। उन पर बैठक में शामिल होने का अधिक दबाव होता है, खबरों को लेकर कम। फील्ड में जाने की रही-सही कसर मोबाइल ने पूरी कर दी है। यही कारण है कि अखबारों में धारदार खबरें घटती जा रही हैं। उनमें तथ्यों से उपजे वह तेवर नहीं होते जो पाठकों को अधिक देर तक अखबार से बांधे रह सके। यही वजह है कि अखबार पढऩे का औसत समय घटकर सात मिनट पर आ गया है। इससे सबक लेना प्रिंट मीडिया की जरूरत है।

Tuesday, January 4, 2011

सबके रहे 'भाई साहबÓ , खूब दिया दुलार

-डॉ. अशोक प्रियरंजन
'भाई साहबÓ ! पूरा अमर उजाला परिवार इसी आत्मीय संबोधन से पुकारता था अतुलजी के लिए। आगरा से शुरू हुए अमर उजाला के सफर का दूसरा पड़ाव था बरेली। यहीं से अतुल माहेश्वरी ने अखबार जगत में पहचान बनानी शुरू की। इसके बाद प्रकाशित हुए मेरठ संस्करण की तो नींव ही उन्होंने रखी और हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में अमर उजाला को शानदार मुकाम दिया। अतुलजी अत्यंत व्यवहारकुशल, मृदुभाषी, सहृदय और अद्भुत प्रतिभासंपन्न व्यक्ति थे। उनका कर्मचारियों के साथ व्यवहार इतना आत्मीय था कि सभी को लगता था मानो वह उनके बड़े भाई हैं। यही वजह थी कि सहज ही हर व्यक्ति उन्हें 'भाई साहबÓ कहकर संबोधित करता था। यह संबोधन खुद उनके लिए भी बड़ा पसंद था। जब प्रबंध निदेशक के रूप में उनकी कामकाजी व्यस्तताएं बढ़ीं तो लंबे समय बाद संपादकीय सहयोगियों के साथ हुई एक मीटिंग में उन्होंने इस बात को दुहराया भी कि मैं तो आप लोगों के लिए 'भाईसाहबÓ ही हूं। चाहे व्यक्ति उम्र में बड़ा हो या छोटा उसके मुंह से सहज ही अतुलजी के लिए 'भाई साहबÓ ही निकलता। उन्होंने भी इस संबोधन का खूब मान रखा। १४ अप्रैल १९८७ को जब मेरठ में दंगे हुए तो देर रात तक संपादकीयकर्मी अखबार के दफ्तर में काम करते और आसपास के होटल बंद होने के कारण रात भोजन भी नहीं पाते थे। कई बार ऐसा हुआ कि अतुलजी खुद अपनी कार से संपादकीय कर्मियों को लेकर दूर स्थित होटल में रात को भोजन कराने लेकर गए। अमर उजाला परिवार के लोगों के बच्चों के जन्मदिन, विवाह समारोह व अन्य कार्यक्रमों में शामिल होकर वह अपनी आत्मीयता का अहसास भी कराते थे। कोई परेशानी हो, निसंकोच होकर लोग अतुल जी के सामने रखते और वह हर संभव उसका समाधान करते। शादी विवाह के लिए आर्थिक संकट हो या फिर बीमारी का इलाज कराने के लिए धन की जरूरत हो, वह कर्मचारियों के दिल की बात महसूस करते और कोई न कोई रास्ता निकाल ही देते थे। अपने कर्मचारियों के साथ संवाद का रास्ता उन्होंने सदैव खोले रखा। आम जनता की पीड़ा को भी वह गहराई से महसूस करते थे। यही वजह थी कि उत्तराखंड में जब भूकंप आया तो उनकी पहल पर पूरा अमर उजाला परिवार भूकंप पीडि़तों की मदद को आगे आया। निजी जीवन के साथ ही वह समाचारों में भी मानवीय मूल्यों के पक्षधर रहे और अमर उजाला के माध्यम से इसे सदैव अभिव्यक्त भी किया।

Sunday, December 12, 2010

अमर उजाला ने किया डॉ. अशोक को सम्मानित

आज १२ दिसंबर को अमर उजाला के मेरठ संस्करण की रजत जयंती मनाई। इस मौके पर कार्यालय में आयोजित कार्यक्रम में डॉ. अशोक प्रियरंजन को उनकी सेवाओं के लिए सम्मानित किया गया। संपादक सूर्यकांत द्विेदी, महाप्रबंधक भवानी शर्मा और वरिष्ठ समाचार संपादक सुनील शाह ने संयुक्त रूप से यह सम्मान उन्हें प्रदान किया। सम्मान में अभिनंदनपत्र, प्रतीक चिह्न, नारियल, और उपहार प्रदान किया गया। अमर उजाला के मेरठ संस्करण का शुभारंभ १२ दिसंबर १९८६ को हुआ और डॉ. अशोक प्रियरंजन तभी से अमर उजाला से जुड़े हुए हैं। वर्तमान में मुख्य उपसंपादक पद पर कार्यरत डॉ. अशोक प्रियरंजन अपने वास्तविक नाम डॉ. अशोक कुमार मिश्र नाम से भी साहित्य सृजन, पत्रकारिता संबंधी लेखन, शोध कार्य और ब्लाग लेखन के माध्यम से अपनी रचनाधर्मिता को शब्दबद्ध कर रहे हैं। साहित्य, ब्लाग और पत्रकारिता संबंधी विषयों पर वह कई राष्ट्रीय संगोष्ठी में शोधपत्र प्रस्तुत कर चुके हैं।

Tuesday, November 16, 2010

ब्लाग ने आम आदमी को भी बना दिया ताकतवर पत्रकार

-डॉ. अशोक कुमार मिश्र
महाराजा हश्चिंद्र स्नातकोत्तर महाविद्यालय मुरादाबाद में १४-१५ नवंबर को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से संपोषित राष्ट्रीय हिंदी संगोष्ठी में डॉ. अशोक कुमार मिश्र ने सूचना तकनीक और हिंदी पत्रकारिता विषय पर शोधपत्र प्रस्तुत किया। शोधपत्र में उन्होंने इस तथ्य को भी स्थापित किया कि सूचना तकनीक की देन ब्लाग ने आम आदमी को पत्रकारिता की ताकत दे दी है। उन्होंने कहा कि आधुनिक युग में सूचना तकनीक ने हिंदी पत्रकारिता को बहुत गहराई से प्रभावित करते हुए जनसंचार माध्यमों के विकास में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। डॉ. मिश्र ने संगोष्ठी में कहा विज्ञान, कला और शिल्प से संवारा गया मीडिया का आधुनिक वैश्विक चेहरा न केवल जनता को लुभा रहा है बल्कि उसके लिए बहुउपयोगी बनकर जीवन व्यवहार में कई प्रकार के परिवर्तनों का कारक बन गया है। उन्होंने कहा कि सूचना तकनीक के उन्नत उपकरणों के कारण जनसंचार माध्यमों से समाचार तीव्र गति से बड़े आकर्षक कलेवर में जनता तक पहुंच जाते हैं। सूचना तकनीक ने न केवल समाचार संकलन, प्रेषण बल्कि उनके प्रस्तुतीकरण में भी सकारात्मक क्रांतिकारी परिवर्तन कर दिया है। केवल कलम केसहारे पत्रकारिता करने वाले पत्रकारों के स्थान पर अब सूचना तकनीक से लैस ऐसे संवाददाताओं का वर्चस्व है जो लैपटॉप, मोबाइल और इंटरनेट का भरपूर प्रयोग करते हुए दूरस्थ स्थलों से भी बहुत शीघ्रता से समाचार जनता को उपलब्ध करा देते हैं। पहले जहां पत्रकारिता के रूप में मुद्रित माध्यम की देन समाचार पत्र और पत्रिकाएं ही थीं वहीं आज सूचना तकनीक के चलते टेलीविजन, रेडियो, इंटरनेट, मोबाइल औ वीडियो मैगजीन भी उलब्ध हैं जिन्होंने हिंदी पत्रकारिता को अत्यंत विश्वसनीय, तीव्रगामी, उपयोगी और वैश्विक बना दिया है। आधुनिक युग में व्यक्ति चाहे शिक्षित हो अथवा अनपढ़, शहर में हो अथवा सुदूर ग्रामीण अंचल में, वह सूचनाओं से वंचित नहीं है। सूचना के विस्फोट से अब कोई आदमी अछूता नहीं है। यह अलग बात है कि इसके कुछ नकारात्मक पक्ष भी हैं। इस राष्ट्रीय गोष्ठी के संयोजक डॉ. मुकेश चंद्र गुप्ता रहे।
(फोटो गूगल सर्च से साभार)

Sunday, October 31, 2010

पलवल में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में ब्लाग पर शोधपत्र

-डॉ. अशोक कुमार मिश्र
हिंदी नवलेखन की विधाओं को विस्तार देने में ब्लाग एक महत्वपूर्ण मंच की भूमिका निभा रहा है। इसीलिए अकादमिक क्षेत्र में ब्लाग को गंभीरता से लिया जा रहा है। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा में ०९-१० अक्टूबर को ब्लागिंग की आचार संहिता विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इसमें ब्लाग के विविध पक्षों पर गंभीरता से मंथन किया गया। इसके बाद २२-२३ अक्टूबर को हरियाणा के पलवल स्थित गोस्वामी गणेश दत्त सनातन धर्म महाविद्यालय में बाजारवाद और आधुनिक हिंदी साहित्य विषय पर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से संपोषित राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गई। गोष्ठी में हिंदी में नवलेखन के संदर्भ में ब्लाग पर भी वैचारिक विश्लेषण किया गया। इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में मेरठ के डॉ. अशोक कुमार मिश्र ने ब्लाग का विधायी स्वरूप और उसकी भाषा संरचना विषय पर शोधपत्र प्रस्तुत किया। शोधपत्र में ब्लाग की प्रविधि केसंदर्भ में ब्लाग बनाने की सुविधा देने वाली वेबसाइट, एग्रीगेटर, यूनीकोड आदि के विषय में जानकारी देते हुए तथ्यपरक ढंग से स्थापित किया कि विगत कुछ वर्षों के मध्य ही विकसित हुई अंतर्जाल की इस आभासी दुनिया में आज नित नई साहित्यिक कृतियों का सृजन हो रहा है। ब्लाग पर रोजना समसामयिक विषयों पर आधारित विचारपूर्ण आलेख, कविताएं, कहानियां, लघुकथाएं, सूचनापरक रिपोर्ट, यात्रावृतांत, संस्मरण आदि लिखे जा रहे हैं। साहित्य की कोई विधा ऐसी नहीं है, जो ब्लाग के माध्यम से समृद्ध नहीं हो रही है। ब्लाग की भाषा संरचना के विषय में शोधपत्र में बताया गया कि परंपरागत साहित्यिक भाषा के स्थान पर जनभाषा की प्रकृति को धारण किए हुए चिट्ठों में दूसरी भाषाओं केशब्दों को आत्मसात करने की अद्भुत क्षमता दिखाई देती है। यही कारण है कि ब्लाग की भाषा में प्रयुक्त हो रही नित नवीन शब्दावली हिंदी भाषा और साहित्य को समृद्ध कर रही है। संयोजक डॉ. केशवदेव शर्मा ने संगोष्ठी का संचालन किया।
(फोटो गूगल सर्च से साभार)

Sunday, October 24, 2010

ब्लाग में आचार संहिता नहीं, स्वअनुशासन होना चाहिए



-डॉ. अशोक कुमार मिश्र
महाराष्ट्र के वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में ०९-१० अक्टूबर को ब्लागिंग की आचार संहिता विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी कई मायनों में बड़ी महत्वपूर्ण रही। आज जब पूरी दुनिया में साहित्यिक और पत्रकारिता संबंधी विधाओं के उन्नयन में ब्लाग एक महत्वपूर्ण मंच की भूमिका निभा रहा है, तो यह जरूरी हो जाता है कि उस पर प्रकाशित सामग्री का विविधि दृष्टिकोण से विश्लेषण किया जाए। संगोष्ठी के संयोजक विश्वविद्यालय केआंतरिक सम्परीक्षा अधिकारी सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी ने इस महत्वपूर्ण पक्ष को समझकर वर्धा में ब्लागरों को एकजुट किया। इस सम्मेलन के माध्यम से कई सवाल उठे और उनके जवाब तलाशे गए। संगोष्ठी का प्रारंभ करते हुए श्री त्रिपाठी ने ब्लाग की महत्ता को रेखांकित करते हुए इसकी संभावनाओं पर प्रकाश डाला और आचार संहिता के प्रश्न को उठाया। प्रति कुलपति प्रो. अरविंदाक्षन ने भी संगोष्ठी की उपादेयता प्रतिपादित की। उद्घाटन करते हुए कुलपति व प्रसिद्ध साहित्यकार विभूति नारायण राय ने सामयिक संदर्भों का उल्लेख करते हुए कहा कि ब्लाग को बहुत गंभीरता से लिए जाने की जरूरत है। ब्लाग के माध्यम से उपलब्ध अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कहीं स्वच्छंदता में न परिवर्तित हो जाए, इसकेप्रति सचेत रहना होगा। उन्होंने कहा कि ब्लागर अपनी लक्ष्मण रेखा का स्वयं निर्धारण करें।
वस्तुत: अधिकतर ब्लागर इसी बात केपक्ष में दिखाई दिए। उनकी मान्यता थी कि ब्लाग पर यदि आचार संहिता का शिकंजा कस दिया जाएगा तो उसकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पक्ष समाप्त हो जाएगा जो कि उसकी सबसे बड़ी विशेषता है। कुछ चिट्ठाकारों की मान्यता थी कि ब्लाग पर प्रकाशित रचनाओं का यदि नियमन किया जाएगा तो इससे इसके सामाजिक सरोकारों और सार्थकता में वृद्धि हो जाएगी। बाद में, साइबर कानून विशेषज्ञ पवन दुग्गल ने ब्लागर केनिरंकुश होने से उत्पन्न खतरों से सचेत किया और संगोष्ठी के विषय की सार्थकता को स्थापित करते हुए स्पष्ट किया कि ब्लागरों के लिए भी निश्चित रूप से कुछ नियम कायदे होने चाहिए।
प्रतिष्ठित कवि आलोक धन्वा ने कहा कि ब्लाग विस्मयकारी करने वाला है। उनके लिए शब्दों का यह अद्भुत संसार है। उन्होंने कहा कि मौजूदा दौर बहुत कठिनाइयों भरा है जहां लोकतांत्रिक मूल्यों का निरंतर लोप होता जा रहा है। ऐसे में ब्लाग पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सदुपयोग करते हुए विचार तत्वों को विस्तार दिया जा सकता है। उन्होंने कहा ब्लाग जगत में पाखंड नहीं है, जो बहुत अच्छी बात है।
संगोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे हैदराबाद से आए प्रोफेसर ऋषभदेव शर्मा ने कहा कि ब्लाग पर प्रस्तुत शब्द संसार को आभासी नहीं वास्तविकता से जोड़कर ही देखा जाना चाहिए। इसलिए इसमें नैतिकता के प्रश्न पर विचार किया जाना चाहिए। उन्होंने ब्लाग पर पनप रही दुष्प्रवृत्तियों को आड़े हाथ लेते हुए आचार संहिता की वकालत की।
लंदन से आई कविता वाचक्नवी ने ब्लागिंग की आचार संहिता का समर्थन करते हुए लेखन में संयम बरतने की बात कही। उन्होंने कहा लेखन के माध्यम से सस्ती लोकप्रियता प्राप्त करने के लिए निरंकुश आचरण नहीं किया जाना चाहिए। कथाकार डॉ. अजित गुप्ता ने इस बात पर जोर दिया कि ब्लागर एक पंचायत बनाकर लेखकीय नियमन का निर्धारण करें।
कानपुर से आए अनूप शुक्ल, दिल्ली के यशवंत सिंह और हर्षवर्धन ने ब्लाग में आचार संहिता की बात को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि इससे ब्लाग की मौलिक प्रवृत्ति ही नष्ट हो जाएगी। इसकेबाद अहमदाबाद के संजय बेगाणी और दिल्ली के शैलेश भारतवासी ने विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों को ब्लाग बनाने का प्रशिक्षण दिया। जनसंचार विभागाध्यक्ष डॉ. अनिल कुमार राय अंकित ने धन्यवाद ज्ञापन दिया।

संगोष्ठी
का दूसरा दिन कई चिंतनपरक आयामों से गुजरा। सभी ब्लागरों के चार समूह बनाकर विविध विषयों पर विचार मंथन किया गया और उसके निष्कर्षों को समूह प्रतिनिधि ने मंच से प्रस्तुत किया। ब्लागिंग में नैतिकता व सभ्याचरण, हिंदी ब्लाग और उद्यमिता, आचार संहिता क्यों और किसके लिए, हिंदी ब्लाग और सामाजिक सरोकार विषयों पर गहन मंथन किया गया। चार ब्लागरों के अध्ययन पत्रों का भी प्रस्तुतीकरण किया गया। डॉ. अशोक कुमार मिश्र ने ब्लागरी में नैतिकता का प्रश्न और आचार संहिता की परिकल्पना विषय पर प्रस्तुत अपने अध्ययन पत्र में उल्लेख किया कि ब्लाग में स्वअनुशासन का होना बहुत जरूरी है। अनुशासन के दायरे में रहकर ही श्रेष्ठ लेखन संभव है। ब्लाग में नैतिकता के प्रश्न का वैचारिक विश्लेषण करते हुए कहा जा सकता है कि ब्लाग में आचार संहिता की परिकल्पना के पीछे चिट्ठाकारों में स्वअनुशासन की भावना को ही विकसित करना है। लखनऊ के रवींद्र प्रभात, ब्लाग पर पीएचडी कर रही इंदौर से आई गायत्री शर्मा, दिल्ली के अविनाश वाचस्पति ने भी अध्ययनपत्र प्रस्तुत किए। उज्जैन से आए सुरेश चिपलूनकर, लखनऊ के जाकिर अली रजनीश और बंगलौर से आए प्रवीण पांडे ने ब्लाग लेखन में शाब्दिक शालीनता बरतने, सार्थक टिप्पणियां करने, ब्लाग के माध्यम से समसामयिक प्रश्नों पर विचार करने और सामाजिक सरोकारों से जोडऩे पर जोर दिया। साहित्यकार राजकिशोर, प्रियंकर पालीवाल, महेश सिन्हा, जयराम झा, विवेक सिंह, संजीत त्रिपाठी, श्रीमती अनीता कुमार, रचना त्रिपाठी, विनोद शुक्ला की उपस्थिति ने कार्यक्रम को गरिमा प्रदान की।