Sunday, September 12, 2010

राष्ट्रभाषा चयन के लिए हो मतदान, हिंदी का बढ़ जाएगा मान


-डॉ. अशोक प्रियरंजन
आजादी के ६३ सालों बाद भी देश में राष्ट्रभाषा घोषित न किया जाना सरकारों की कमजोरी का परिचायक है। इस दौरान कई सरकारें आईं और गईं लेकिन देश की नेतृत्व भाषा को पहचान देने की दिशा में कोई खास कदम नहीं उठाए गए। इसमें कोई दो राय नहीं राजभाषा हिंदी बोलने वाले लोगों की संख्या देश में सर्वाधिक है। विदेशों में भी इस भाषा को जानने और सीखने की ललक व्यापक स्तर पर दिखाई देती है। हिंदी भाषा का शब्दकोश समृद्ध है और विविध विधाओं में प्रचुर मात्रा में इसका साहित्य है। हिंदी में रोजगार की भी व्यापक संभावनाएं हैं। कंप्यूटर पर भी लिखने-पढऩे की सहूलियत भी इस भाषा में है। ऐसे में जरूरी है कि हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित कर दिया जाए। प्रश्न यह उठता है कि इस संबंध में क्या बाधाएं हैं और उसका समाधान कैसे हो?
सत्तारूढ़ दल अभी तक राजनीतिक तुष्टिकरण की नीति पर चलते हुए राष्ट्रभाषा घोषित करने से इसलिए बचते रहे क्योंकि वह अन्य भाषा भाषियों को नाराज नहीं करना चाहते हैं। कहीं से विरोध के स्वर न उठें, इसीलिए वह राष्ट्रभाषा केमुद्दे पर चुप्पी साधे रहते हैं?
मेरी दृष्टि में इस समस्या का आसान सा समाधान है जिसे सरकार सहजता से अमल भी कर सकती है। हम लोकतांत्रिक व्यवस्था में जी रहे हैं। लोकतंत्र में जब कोई मुद्दा समस्या बन जाए, तो मतदान से उसका हल निकाला जा सकता है।
मेरी ओर से हिंदी दिवस के मौके पर यह सुझाव है कि राष्ट्रभाषा चुनने के लिए मतदान करा लिया जाए। इसके लिए अलग से व्यवस्था करने की जरूरत नहीं है, बल्कि आगामी संसदीय चुनावों के दौरान जब लोग अपना सांसद चुनें तभी उन्हें राष्ट्रभाषा चुनने के लिए भी एक दूसरा मतपत्र दे दिया जाए। संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल सभी भाषाओं को मतपत्र में स्थान देकर राष्ट्रभाषा चुनने के पक्ष में मतदान करा लिया जाए। इस स्थिति में जो भी भाषा चुनकर आएगी, उस पर कहीं से विरोध की स्थिति नहीं रह जाएगी। यह अलग बात है कि हिंदी भाषियों की जिस तरह से संख्या बढ़ी है, उससे हिंदी केराजभाषा से राष्ट्रभाषा बन जाने की प्रबल संभावनाएं हैं। आपकी इस बारे में क्या राय है। हिंदी दिवस २०१० को सार्थक बनाने के लिए आप इस मुद्दे पर अपनी राय टिप्पणी के रूप में अवश्य लिखें।
(फोटो गूगल सर्च से साभार)

Wednesday, August 25, 2010

राष्ट्रभाषा, राजभाषा, राष्ट्रमंडल खेल और राष्ट्रीय गौरव

-डॉ. अशोक प्रियरंजन
किसी भी देश की अंतरराष्ट्रीय भाषाई पहचान के लिए जरूरी है कि उसकी एक राष्ट्रभाषा होनी चाहिए। यह भाषा ऐसी हो, जिसे सीखने, उसका साहित्य पढऩे की ललक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होनी चाहिए। भारत केसंदर्भ में यह विचारणीय विषय है कि अभी तक यहां हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं मिल सका है जबकि पूरी दुनिया में यह एक लोकप्रिय भाषा के रूप में उभरकर सामने आई है। इसकी लिपि सर्वाधिक वैज्ञानिक है। हिंदी का साहित्य बहुत समृद्ध है। बहुत बड़ी संख्या में हिंदी बोलने वाले लोग है। मारीशस, फिजी, सिंगापुर, कनाडा आदि में तो हिंदी के प्रति व्यापक रुझान दिखाई देता है।
भारत में हिंदी को राजभाषा घोषित किया गया है लेकिन इसके व्यापक उपयोग को लेकर सरकार की उदासीनता दिखाई देती है। इसका सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन में हिंदी केप्रति बरती जा रही उदासीनता है। संसद में भी राष्ट्रमंडल खेलों में हिंदी को बढ़ावा देने की मांग उठ चुकी है लेकिन आयोजक और सरकार नहीं चेती है। राजभाषा समर्थन समिति मेरठ इस दिशा में पहल करते हुए जनआंदोलन के तेवर अख्तियार किए हुए है लेकिन इसमें अन्य संगठनों की भागीदारी और व्यापक जनसमर्थन की जरूरत है।
राष्ट्रमंडल खेलों में राजभाषा हिंदी को बढ़ावा देना इसलिए भी जरूरी है कि उस दौरान कई देशों के लोग आयोजन में शामिल होंगे। उन्हें न केवल भारतीय संस्कृति की जानकारी दी जाए बल्कि पूरी दुनिया में लोकप्रिय हो रही राजभाषा हिंदी से भी परिचय कराया जाना चाहिए। ऐसा करके राष्ट्रीय गौरव को बढ़ाया जा सकता है। इस सत्य से कोई इनकार नहीं कर सकता है कि देश में हिंदी बोलने वालों की संख्या सर्वाधिक है और पूरी दुनिया में हिंदी को लेकर व्यापक संभावनाएं परिलक्षित हो रही हैं। फिर देश के भाषाई गौरव केशिखर पर हिंदी को प्रतिष्ठित करने में देरी क्यों? राष्ट्रमंडल खेलों के माध्यम से हिंदी को बढ़ावा देना समय की जरूरत है। इसकेलिए राजभाषा समर्थन समिति मेरठ केसुझावों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। समिति के सुझाव हैं-
1. राष्ट्रमंडल खेलों की वेबसाइट हिंदी में तुरंत बनाई जाए।
2. दिल्ली पुलिस और नई दिल्ली नगरपालिका द्वारा सभी नामपट्टों व संकेतकों में हिंदी का भी प्रयोग हो ।
3. राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान वितरित की जाने वाली सारी प्रचार सामगी हिंदी में भी तैयार की जाए।
4. राष्ट्रमंडल खेलों के आंखों देखे हाल के प्रसारण की व्यवस्था हिंदी में भी हो।
5. पर्यटकों व खिलाडियों के लिए होटलों व अन्य स्थानों हिंदी की किट भी वितरित की जाए।
6. उदघाटन व समापन समारोह भारत की संस्कृति व भाषा का प्रतिबिम्बित करते हों। सांस्कृतिक कार्यक्रम देश की गरिमा के अनुरूप हों। राष्ट्रपति , प्रधानमंत्री व अन्य प्रमुख लोग अपनी भाषा में विचार व्यक्त करें।
7. राष्ट्रमंडल के देशों में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए कार्ययोजना तैयार की जाए।
(फोटो गूगल सर्च से साभार)

Wednesday, August 11, 2010

गधों का अंतरराष्ट्रीय बाजार

डॉ. अशोक प्रियरंजन
चीन का सामान यूज करते करते लपूझन्ना चीन का मुरीद हो गया था। उसका मन चीन जाने को हिलोरें मार रहा था और चीन से डिमांड आई है भारत के गधों की। वह अब कभी गधों को देखता है और कभी खुद को। उसका मन अभी तक खुद को गधों से कमतर मानने को राजी नहीं हो रहा। गधों का निर्यात करने वाली कंपनी देश में गधे की कीमत १० हजार मान रही है। विदेशी मुद्रा में एक गधा लाखों का बैठेगा। लपूझन्ना यहां केबाजार में ही अपनी कीमत तलाशने में विफल रहा तो फिर विदेशी बाजार में अपनी कीमत आंकने की हिमाकत कैसे कर सकता है। जब से उसे गधों की अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग बढऩे की खबर मिली है, तब से उसे गधों से रश्क होने लगा है।
उसे इस बात का भी मलाल हो रहा है उसे किसी महिला ने कभी प्यार से नहीं देखा जबकि चीन में गधों की मांग महिलाओं की वजह से ही पैदा हुई है। चीन की महिलाओं को गधे के चमड़े से बने पर्स और जैकेट लुभा रहे हैं। लपूझन्ना का दिल दहाड़े मार-मारकर रोने को हो आता है जब वह सोचता है कि वह किसी महिला को गले नहीं लगा सका जबकि मरने के बाद भी गधे की खास का साजो सामान महिलाओं की गले की रौनक बनेगा। चीन की महिलाओं में गधे के चमड़े से बने पर्स और जैकेट अत्यधिक लोकप्रिय हैं।
लपूझन्ना को अपने बालों पर बड़ा गुरुर था लेकिन आज तक किसी ने उसके बालों की तारीफ नहीं की। चीन की निगाह इंडियन गधों के बालों पर लगी है। वहां के लोगों को गधों के बालों से बना खास किस्म का ब्रश खूब पसंद आ रहा है। लपूझन्ना का दिल कर रहा कि अपने बालों को मुंडाकर गंजा हो जाए, अपने इन नासपीटे बालों का तो कोई फायदा ही अब तक नजर नहीं आया। कभी उसने अपनी फोटो तक इसलिए नहीं खिंचाई कि भला फिजूलखर्ची से क्या फायदा लेकिन गधों ने उससे इसमें भी बाजी मार ली। चीन से जो आर्डर आया है उसमें इंडियन गधों की तस्वीरें भी भेजी गई हैं। लपूझन्ना सोच रहा है काश वह तस्वीर खिंचवा लेता तो उसकी भी कुछ मार्केट वैल्यू बन जाती लेकिन अब पछताए होत का जब चिडिय़ा चुग गई खेत।
कॉलेज के दिनोंं उसके दोस्त गधों की बड़ी तारीफ करते थे। कहते थे कि गधा सबसे बड़ा चिंतक होता है इसीलिए वह चुपचाप घंटों एक ही स्थान पर खड़े रहकर सोचता रहता है। वह अक्सर गधों की सहनशीलता से प्रेरणा लेने की बात कहते थे क्योंकि मारपीट, लानत मलामत और तमाम टीका टिप्पणियों को बड़े धैर्य से सहते थे और कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करते थे। अब तो वह गधों की महानता का पूरी तरह कायल हो गया है। फिलहाल गुणवान गधों को देख-देखकर मलाल करने के अलावा लपूझन्ना पर कोई चारा नहीं बचा था।
(फोटो गूगल सर्च से साभार)

Saturday, July 31, 2010

उफ ! फीस न दे पाने और स्कूल में पोंछा लगवाने पर छात्रा ने जान दी

-डॉ. अशोक प्रियरंजन
सहारनपुर के नागल क्षेत्र के भलस्वा गांव में हुई १३ साल की लक्ष्मी की खुदकुशी की घटना न केवल हर आदमी को झकझोरने वाली है, बल्कि हमारी शिक्षा व्यवस्था और सरकारी सुविधाओं की पोल भी खोलती है। अभी तक मासूम लक्ष्मी की मौत के पीछे जो कारण बताए रहे हैं, वह हमारी व्यवस्था पर कई सवाल खड़े करते हैं। बताया जा रहा है कि तीसरी कक्षा की छात्रा लक्ष्मी को फीस न लाने के लिए स्कूल में प्रताडि़त किया गया था। दूसरा कारण ये बताया जा रहा है कि उससे स्कूल में जबरन झाड़ू पोंछा लगवाया जाता था। दरअसल लक्ष्मी का परिवार मुफलिसी का शिकार था। उसका पिता पांच साल से लापता है। आर्थिक संकट के चलते लक्ष्मी की मां रेनू स्कूल की फीस नहीं दे पा रही थी। यह भी गरीबी और सामाजिक रूप से कमजोर होने का ही नतीजा था कि घटना के बाद मौके पर जिलाधिकारी तो पहुंचे लेकिन मामले की रिपोर्ट दर्ज नहीं हुई।
यह घटना इस बात की पोल खोलती है कि गरीबों को पढ़ाई का सपना पूरा करना आसान नहीं है। गरीबी के चलते ही न केवल उन्हें अपमानजनक और तिरस्कारपूर्ण स्थितियों का सामना करना पड़ता है बल्कि कई किस्म की लड़ाइयां रोजमर्रा की जिंदगी में लडऩी पड़ती हैं। यही कारण हैं कि मासूम आंखों के सपने आकार लेने से पहले ही दम तोड़ देते हैं। जरूरी है कि सरकार ऐसा माहौल बनाए कि हर आंख में सपने सजें और वह पूरे भी हों।
( फोटो गूगल सर्च से साभार )

Wednesday, July 28, 2010

राष्ट्रमंडल खेलों में हिंदी प्रयोग के लिए होगा संघर्ष, प्रस्ताव पारित

-डॉ. अशोक प्रियरंजन
नई दिल्ली स्थित इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में 27 जुलाई की शाम जुटे हिंदीप्रेमियों ने एक स्वर में राष्ट्रमंडल खेलों में राजभाषा हिंदी का प्रयोग किए जाने के लिए संघर्ष करने का फैसला किया। इसे राष्ट्रीय अस्मिता का प्रश्न मानकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीयता की पहचान को प्रखर बनाने के लिए सर्वसम्मति से कुछ प्रस्ताव पारित किए गए। राजभाषा समर्थन समिति मेरठ, अक्षरम एवं वाणी प्रकाशन की ओर से आयोजित गोष्ठी पारित प्रस्ताव निम्नांकित हैं-
1. राजभाषा समर्थन समिति मेरठ एवं अक्षरम के संयोजन में एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिंमंडल जिसमें सांसद, पत्रकार, साहित्यकार शामिल होंगे गृहमंत्री, गृहराज्यमंत्री, दिल्ली की मुख्यमंत्री, राष्ट्रमंडल खेलों की आयोजन समिति के अध्यक्ष, खेल मंत्री से मुलाकात कर राजभाषा हिंदी के प्रयोग का प्रश्न उनके संज्ञान में लाएगा।
2. संसद व मीडिया में इस प्रश्न को उठाने के लिए सांसदों तथा मीडियाकर्मियों से संपर्क किया जाए।
3. राष्ट्रमंडल खेलों की वेबसाइट हिंदी में तुरंत बनाई जाए।
4. दिल्ली पुलिस और नई दिल्ली नगरपालिका द्वारा सभी नामपट्टों व संकेतकों में हिंदी का भी प्रयोग हो ।
5. राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान वितरित की जाने वाली सारी प्रचार सामगी हिंदी में भी तैयार की जाए।
6. राष्ट्रमंडल खेलों के आंखों देखे हाल के प्रसारण की व्यवस्था हिंदी में भी हो।
7. पर्यटकों व खिलाडियों के लिए होटलों व अन्य स्थानों हिंदी की किट भी वितरित की जाए।
8. उदघाटन व समापन समारोह भारत की संस्कृति व भाषा का प्रतिबिम्बित करते हों। सांस्कृतिक कार्यक्रम देश की गरिमा के अनुरूप हों। राष्ट्रपति , प्रधानमंत्री व अन्य प्रमुख लोग अपनी भाषा में विचार व्यक्त करें।
9. राष्ट्रमंडल खेलों में हिंदी के प्रयोग के लिए एक जनअभियान चलाया जाए और सरकार द्वारा सुनवाई न किये जाने पर जंतरमंतर व अन्य स्थानों पर धरने व प्रदर्शन की योजना बनाए जाए।
10. इस अवसर का उपयोग करते हुए राष्ट्रमंडल के देशों में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए कार्ययोजना तैयार की जाए।
कार्यक्रम में डॉ. रत्नाकर पांडेय , कलराज मिश्र, हुक्मदेव नारायण यादव, प्रदीप टमटा , राजेन्द्र अग्रवाल ( सांसद) पत्रकार डॉ. वेदप्रताप वैदिक, रामशरण जोशी, साहित्यकार डॉ. गंगा प्रसाद विमल, कमेट्रेटर जसदेव सिंह, रवि चतुर्वेदी, हिंदी सेवी महेश शर्मा, नारायण कुमार, प्रो. नवीन चंद्र लोहनी आदि ने अपने विचार व्यक्त किए। गोष्टी का संयोजन अक्षरम के अध्यक्ष अनिल जोशी ने किया।
(फोटो गूगल सर्च से साभार)

Friday, July 23, 2010

राष्ट्रमंडल खेलों में हिंदी का परचम फहराने को उठे हाथ

-डॉ. अशोक प्रियरंजन
राष्ट्रमंडल खेलों को लेकर सभी भारतवासी उत्साहित हैं। इन खेलों से देश का गौरव बढ़ेगा। बड़ी संख्या में आने वाले विदेशी मेहमानों को भारतीय संस्कृति से रू-ब-रू होने का मौका मिलेगा। ऐसे में जरूरी है कि वह यहां की सर्वाधिक लोकप्रिय भाषा हिंदी से भी साक्षात्कार करें। इसकेलिए जरूरी है कि राष्ट्रमंडल खेलों से जुड़ी समस्त भाषिक सामग्री हिंदी में भी उपलब्ध हो। इसकेलिए एकजुट होकर प्रयास होने चाहिए। मेरठ से बीती सात जुलाई को राजभाषा समर्थन समिति ने इसकेलिए मुहिम शुरू की। विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रोफेसर नवीन चंद्र लोहनी के प्रयासों से बृहस्पति भवन में आयोजित कार्यक्रम में सांसद राजेंद्र अग्रवाल समेत अनेक हिंदी प्रेमी वक्ताओं ने राष्ट्रमंडल खेलों में हिंदी को बढ़ावा देने की मांग जोरदार तरीके से उठाई।
अब २७ को इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में सम्मेलन
दिल्ली स्थित इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में २७ जुलाई को सायं साढ़े पांच बजे आयोजित हिंदीसेवियों के सम्मेलन में इस मुहिम को आगे बढ़ाने की रणनीति बनेगी। समिति ने ज्यादा से ज्यादा लोगों से आयोजन में शामिल होने की अपील की है।
मुख्य मांग
खेलों में हिन्दी भाषा का प्रयोग विज्ञापनों/होर्डिंग्स/सरकारी प्रपत्रों तथा आयोजक संस्थाओं द्वारा अनिवार्यत: किया जाए, जिससे देश की गरिमा का आभास दुनियाँ को हो। न्यूयार्क में संपन्न आठवें अन्तरराष्ट्रीय विश्व हिन्दी सम्मेलन में हिन्दी को अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर सुदृढ़ करने तथा संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा बनाने का अभियान प्रमुखता से लिया गया था । यह अवसर है कि हम उस विशिष्ट अवसर पर लिए गए संकल्प को लागू कराएँ।
राष्ट्रमण्डल खेल और हिन्दी की संभावनाएं
1. जब चीन में ओलंपिक खेलों के दौरान चीनी भाषा का प्रयोग हो सकता है तो भारत में आयोजित खेलों की नियमावली और होर्डिंग्स, सूचनाओं का आदान-प्रदान, प्रसारण तथा सरकारी एवं आयोजक संस्थाओं के प्रपत्रों का लेखन हिन्दी में क्यों नहीं हो सकता।
2. आयोजन में आने वाले गैर हिन्दी भाषी खिलाडिय़ों और प्रतिनिधियों को अनुवादक उपलब्ध कराए जा सकते हैं। जैसा कि प्राय: हर अन्तरराष्ट्रीय आयोजन में अन्य भाषा-भाषी लोग करते हैं।
3. राष्ट्रमण्डल खेलों में हिन्दी के प्रयोग द्वारा हम भारत की छवि को पूरी दुनियाँ के सामने मजबूती के साथ स्थापित कर सकते हैं।
4. यदि हम राष्ट्रमण्डल खेलों में हिंदी प्रयोग करते हैं तो अनुवादकों की आवश्यकता पड़ेगी। इससे अनुवादकों को रोजगार प्राप्त होगा।
5. राष्ट्रमण्डल खेल हिन्दी भाषा के लिए बड़ी संभावनाओं को खोल सकते हैं, अगर हम हिंदी का इन खेलों के दौरान अधिक से अधिक प्रयोग करेंगे। इससे विदेशी लोगों का भी हिन्दी के प्रति आकर्षण बढ़ेगा तथा इससे हिंदी के शिक्षण, पठन-पाठन की विदेशों में भी संभावनाएं बढ़ेंगी।
6. अनुच्छेद 344 के अनुसार राष्ट्रपति हिंदी भाषा की बेहतरी के लिए भाषा आयोग का गठन करेंगे। राष्ट्रमण्डल खेल भारत में हो रहे हैं, परन्तु हिन्दी भाषा को संवर्धित करने के लिए संविधान में दी गई भाषा संबंधी व्यवस्था का पालन नहीं हो रहा है, ऐसे में जरूरी है कि जन जागृति द्वारा प्रबुद्ध नागरिक राष्ट्रमण्डल खेलों में हिन्दी के प्रयोग को लेकर सरकार का ध्यान आकर्षित करें।
7. राष्ट्रमण्डल खेलों में हिन्दी के प्रयोग द्वारा हम उस रूढ़ मानसिकता पर भी चोट कर सकते हैं जो अंग्रेजी के प्रयोग द्वारा निज विशिष्टता सिद्ध करती रही है, यह हिंदी के भूगोल और मानसिकता को परिवर्तित करने का अवसर भी है।
समिति संपर्क सूत्र
राजभाषा प्रयोग के इस क्रान्तिकारी अभियान को परिणाम तक पहुँचाने के लिए राजभाषा समर्थन समिति व्यापक जनसहयोग चाहती है। आयोजन से जुड़े हुए सरकारी विभागों एवं संस्थाओं से भी आग्रह किया जाना चाहिए। समिति समपर्क सूत्र हैं -
नवीन चन्द्र लोहनी एवं समस्त साथी, राजभाषा समर्थन समिति,
हिन्दी विभाग, चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ (उ0 प्र0) मो.नं. 09412207200/09412885983/9758917725/9258040773/9897256278

Tuesday, June 8, 2010

अपमान झेलती प्रतिमाएं

-डॉ. अशोक प्रियरंजन
ज्ञानपुर के गांधी उद्यान में स्थापित राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की प्रतिमा पर ३० मई की रात कुछ शरारती तत्वों ने शराब की बोतल फोड़कर एक फटा-पुराना कंबल लपेट दिया। राष्ट्रपिता के अपमान से जब स्थानीय कांग्रेसी भड़क उठे और धरना-प्रदर्शन करने लगे, तब प्रशासन ने जांच का आश्वासन देकर मामला रफा-दफा किया। इस घटना के एक दिन पहले ही मेरठ में चौधरी चरण सिंह की प्रतिमा के पास गंदगी का अंबार देखकर भाजपाई भड़क गए थे। इसकी वजह यह थी कि जब पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की २३वीं पुण्यतिथि पर सांसद राजेंद्र अग्रवाल की अगुवाई में लोग श्रद्धांजलि देने कमिश्नरी पार्क पहुंचे, तो वहां प्रतिमा के आसपास काफी गंदगी पसरी हुई थी।
इसी तरह, २३ सितंबर, २००८ को जम्मू के मुबारक मंडी कांप्लेक्स में राष्ट्रपिता की मूर्ति के गले में रस्सी बांधकर रोशनी के लिए लाइट लटका दी गई थी। एक समारोह की तैयारियों में जुटे टेंट हाउस के कर्मचारी बापू की प्रतिमा पर चढ़ गए। पूरे देश में महापुरुषों की प्रतिमाओं की यही दशा है। समझ में नहीं आता कि जब हम प्रतिमाओं का सम्मान ही नहीं कर सकते, तो उन्हें स्थापित क्यों करते हैं? क्या महज राजनीतिक स्वार्थ पूर्ति के लिए?
पूरी दुनिया में महापुरुषों की प्रतिमाएं लगाई जाती हैं। भारत में भी बड़ी संख्या में महापुरुषों की प्रतिमाएं स्थापित हैं। कोई शहर ऐसा नहीं, जहां प्रतिमाएं न हों। प्रतिमा स्थापित करने के पीछे दरअसल मंशा यही होती है कि लोग संबंधित महापुरुष के आदर्शों से प्रेरणा लें और उनके बताए मार्ग पर चलकर समाज और देश के विकास में योगदान दें। इसके लिए जरूरी है कि प्रतिमा स्थापना के बाद उसके रखरखाव, सफाई और सुरक्षा पर भी पूरा ध्यान दिया जाए। प्रतिमाएं खुद बदहाल स्थिति में रहेंगी, तो कोई उनसे प्रेरित कैसे होगा? ज्यादातर प्रतिमाएं खुले में लगी हैं, जाहिर है, मौसम भी उनके रंग-रूप को बदरंग करता है। ऐसे मे, हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि कैसे महापुरुषों की प्रतिमाओं के सम्मान की रक्षा की जाए। यह प्रतिमा लगाते समय ही सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
महापुरुषों के जन्मदिवस और पुण्यतिथि पर पूरे देश में समारोह आयोजित होते हैं। कुछ महापुरुषों के जन्मदिवस या निर्वाण दिवस को सरकारी अवकाश भी दिया जाता है, ताकि हम उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर विचार कर सकें। लेकिन इन अवकाशों के मायने अब पूरी तरह बदल गए हैं। उस दिन लोग महापुरुष को याद करने के बजाय अपने दूसरे कामों में व्यस्त रहते हैं।
महापुरुषों के जीवन के विविध पक्ष नई पीढ़ी के लिए हमेशा से प्रेरणादायक रहे हैं। इसीलिए पहले बुजुर्ग बच्चों को महापुरुषों के संस्मरण सुनाया करते थे। एकल परिवारों के युग में इसकी गुंजाइश ही नहीं बची। महापुरुषों की जीवनियां सिर्फ पाठ्यक्रमों में ही बच्चों को पढऩे को मिल पाती हैं, क्योंकि पुस्तक खरीदने की प्रवृत्ति भी परिवारों में घट रही है। अत: हमें विचार करना होगा कि बच्चे कैसे महापुरुषों के जीवन से जुड़े विविध प्रसंगों से अवगत हो पाएंगे?
समाज में जिस तरह से नैतिकता का पतन हो रहा है, जीवन मूल्यों का अवमूल्यन हो रहा है, नई पीढ़ी में दिशाहीनता और भटकाव की स्थितियां दिखाई दे रही हैं, सांस्कृतिक मान्यताओं व परंपराओं के साथ खिलवाड़ हो रहा है, उसे ध्यान में रखते हुए महापुरुषों के विचारों एवं आदर्शों का प्रचार-प्रसार करना होगा, तभी समाज सही दिशा में आगे बढ़ पाएगा।
(इस लेख को अमर उजाला के ८ जून २०१० के अंक में संपादकीय पृष्ठ पर भी पढा जा सकता है । फोटो गूगल सर्च से साभार)