Friday, December 12, 2008

आत्मïिवश्वास के सहारे जीतें जिंदगी की जंग

-डॉ. अशोक प्रियरंजन
आत्मविश्वास की कमी के चलते अब हजारों लोग जिंदगी की जंग हारकर मौत को गले लगा लेते हैं । आत्महत्या की बढती घटनाएं समाज के विविध वर्ग के लोगों के जीवन में बढ़ रही निराशा, संघर्ष करने की घटती क्षमता और जीने की इच्छाशक्ति की कमी की ओर संकेत करती हैं। २००७ में करीब २७५० लोगों ने खुदकुशी की जबकि २००६ में ३०९९ लोगों ने मौत को गले लगा लिया । बीते छह सालों में अकेले उत्तर प्रदेश में आत्महत्या का औसत ३४०० रहा है ।
मौजूदा समय के भौतिकवादी माहौल ने लोगों की महत्वाकांक्षाओं और अपेक्षाओं को काफी बढा दिया है। अब आदमी के अंदर अच्छा घर, कार और आधुनिक जीवन की सभी सुख सुविधाएं हासिल करने की लालसा बढती जा रही है । वह अपने सपनों को जल्द पूरा करना चाहता है । सपने टूटते हैं और अपेक्षाएं पूरी नहीं होती हैं तो आत्मविश्वास की कमी के चलते लोग जिंदगी से मायूस हो जाते हैं । बडी संख्या में युवाओं का जीवन के प्रति मोहभंग होना पूरे समाज के लिए चिंता का विषय है । देश में हर साल करीब २४०० छात्र परीक्षा के तनाव या फिर फेल होने पर खुदकुशी कर लेते हैं । कभी प्रेम में निराशा मिलने पर तो कभी अर्थिक तंगी या गृहकलह आत्महत्या की वजह बन जाती है ।
दरअसल, जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए आत्मविश्वास की शक्ति सर्वाधिक आवश्यक है । आत्मविश्वास के अभाव में किसी कामयाबी की कल्पना नहीं की जा सकती है । आत्मविश्वास के सहारे कठिन से कठिन लक्ष्य को प्राप्त करना भी सरल हो जाता है । राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने आत्मविश्वास के सहारे ही ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष किया । यह उनका आत्मविश्वास ही था जिसके सहारे उन्होंने अहिंसा के रास्ते पर चलकर देश को अंग्रेजों की दासता से मुक्त कराया । आत्मविश्वास शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है-आत्म और विश्वास । यहां आत्मा से आशय अंतर्मन से है । विश्वास का अर्थ भरोसा होता है । वस्तुत: अंतर्मन के भरोसे को ही आत्मविश्वास कहते है ं। आत्मविश्वास मनुष्य के अंदर ही समाहित होता है । आंतरिक शक्तियों को एकीकृत करके आत्मविश्वास को मजबूत किया जा सकता है।
आत्मविश्वास को जागृत करके और मजबूत बनाकर जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता अर्जित की जा सकती है । सत्य, सदाचार, ईमानदारी, सहृदयता आदि मानवीय गुणों को धारण करके आत्मविश्वास का संचार किया जा सकता है । आत्मविश्वास से भरे विद्यार्थी परीक्षा में सफलता प्राप्त करते हैं । रोजगार और व्यवसाय में भी उन्नति के शिखर पर पहुंचने का आधार आत्मविश्वास ही होता है । बडी से बडी समस्या भी उन्हें जिंदगी में आगे बढऩे से नहीं रोक सकती। आत्मविश्वास से दैदीप्य व्यक्तित्व ही समाज को नई दिशा देने में समर्थ होता है । वास्तव में आत्मविश्वास की शक्ति अद्भुत होती है ।
प्रत्येक मनुष्य को सदैव आत्मविश्वास को मजबूत बनाए रखना चाहिए तभी वह जीवन में उन्नति कर सकता है । जिंदगी से मायूस हुए लोगों को ढाढस बंधाने का काम परिजनों अथवा उनके निकट के लोगों को करना चाहिए । बातचीत के माध्यम से निराशाजनक स्थितियों से गुजर रहे मनुष्य के अंदर जीने की इच्छाशक्ति को मजबूत किया जाना चाहिए । विविध प्रेरणादायक प्रसंगों की जानकारी देकर उन्हें जीवन के संघर्ष से घबराने के बजाय मुकाबला करने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए । उनके मन से निराशा का अंधेरा छंट गया तो निश्चित रूप से उनमें जीवन के प्रति ललक जागृत होगी । उनमें आत्मविश्वास उत्पन्न होगा तो वह वह भविष्य में जिम्मेदार नागरिक बनकर देश के विकास में अपना योगदान दे पाएंगे ।
(फोटो गूगल सर्च से साभार)

Sunday, November 30, 2008

उर्दू की जमीन से फूटी हिंदी गजल की काव्य धारा

-डॉ. अशोक प्रियरंजन
मेरठ

प्रिय नितिन,
कल एक साप्ताहिक पत्र में तुम्हारा एक गीत और एक गजल पढऩे को मिली । गीत मुझे बेहद अच्छा लगा लेकिन गजल नाम से जो पंक्तियां तुमने लिखी हैं, वे गजल के मिजाज से कोसों दूर लगीं । मुझे तुम्हारी रचनात्मक यात्रा से खासा लगाव रहा है इसलिए चाहता हूं कि अब गजल लिखने से पहले तुम इसके संपूर्ण विधात्मक स्वरूप को अध्ययन और मनन से दिमाग में पूरी तरह जज्ब कर लो । मैने गजल के बारे में जो कुछ पढा और बुजुर्ग शायरों से जो कुछ सुना है, उसे तुम्हारी सहूलियत के लिए यहां लिख रहा हूं । दरअसल हिंदी में गजल की काव्यधारा उर्दू की जमीन से फूटी । गजल भाषाई एकता की ऐसी मिसाल है जिसने हिंदी-उर्दू दोनों भाषा भाषी लोगों के दिलों में अपनी अलग जगह बनाई । गंगा जमुनी तहजीब के काव्यमंचों पर गजल ने खासी लोकप्रियता हासिल की ।
मुगल बादशाह शाहजहां के राज्यकाल में पंडित चंद्रभानु बरहमन नामक कवि हुए हैं जिन्हें उर्दू का प्रथम कवि होने का श्रेय प्राप्त है लेकिन उनमें काव्य मर्मज्ञता से अधिक वियोगी होगा पहला कवि वाली बात ही अधिक मुखर है । औरंगजेब के काल में वली ने उर्दू कविता को नपे तुले मार्ग पर चलाने में बडा योगदान दिया । आबरू, नाजी, हातिम तथा मजहर जाने-जाना आदि कवियों ने उर्दू कविता कुनबेे को स्थायी रूप प्रदान किया । इन्होने वाक्यों में फारसी की चाशनी प्रदान की और फारसी में प्रचलित लगभग सभी काव्यरूपों का उर्दू में प्रयोग किया ।
गजल उर्दू कविता का वह विशिष्ट रूप है जिसमें प्रेमिका से वार्तालाप, उसके रूप-सौंदर्य तथा यौवन का वर्णन और मुहब्बत संबंधी दुखों की चर्चा की जाती है । मौजूदा दौर में तो गजल के कथ्य का क्षेत्र बहुत व्यापक हो गया है । आधुनिक जीवन की विसंगतियों और विडंबनाओं को गजल में बड़े यथार्थपरक ढंग से अभिव्यक्त किया जा रहा है । गजल की विशेषता इसकी भावोत्पादकता होती है । गजल का कलेवर अत्यधिक कोमल और सरस होता है । इसका प्रत्येक शेर स्वयं में पूर्ण होता है । शेर के दो बराबर टुकड़े होते हैं जिन्हें मिसरा कहा जाता है । हर शेर के अंत में जितने शब्द बार-बार आते हैं उन्हें रदीफ और रदीफ से पूर्व एक ही स्वर वाले शब्दों को काफिया कहा जाता है । गजल के पहले शेर के दोनो मिसरे एक ही काफिया और रदीफ में होते हैं । ऐसे शेर को मतला कहा जाता है । गजल के अंतिम शेर को मक्ता कहते हैं । इसमें प्राय शायर का उपनाम अर्थात तखल्लुस होता है ।
फारसी और भारतीय भाषाओं में गजल कहने वाले पहले शायर ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती माने जाते है ं। १८वीं शताब्दी में गजल को नया रूप देने वालों में दर्द, मीर तथा सौदा के नाम प्रमुख हैं । नजीर अकबराबादी, इंशा, मुसहफी, नासिख, शाह नसीर तथा आतिश आदि की गजलें भी बड़ी मशहूर हुईं । इनके बाद गजल को माधुर्य, चमत्कार और वैचारिक प्रौढता प्रदान करने वाले शायरों में मोमिन, जौक और गालिब का नाम लिया जाता है । यह लोग उर्दू के उस्ताद शायर थे । बीसवीं शताब्दी में हसरत, फानी बदायूंनी, इकबाल, अकबर, जिगर मुरादाबादी, फिराक गोरखपुरी, असर लखनवी, फैज अहमद फैज, सरदार जाफरी कतील शिफाई, नूर, शकील बदायूंनी साहिर, कैफी आजमी, मजरूह, जोश मलीहाबादी और बशीर बद्र जैसे अनेक नाम उल्लेखनीय हैं ।
हिंदी में भी गजल कहने वालों की सुदीर्घ परंपरा रहा है । आजादी के बाद हिंदी काव्य मंचों पर बलवीर सिंह रंग की गजलों ने लोगों की खूब वाहवाही लूटी । इसीलिए उन्हें गजल सम्राट कहा गया । दुष्यंत ने हिंदी गजल में आम आदमी की पीडा को अभिव्यक्त करके इसे एक नई पहचान दी । उनके शेर-कहां तो तय था चिरागां हरेक घर के लिए कहां चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए-ने हिंदुस्तान के हालात को बखूबी बयान किया । यह दुष्यंत ही थे जिनकी दी जमीन पर बाद में अनेक शायरों ने गजल कही । उन्होंने गजल में समकालीन विसंगतियों को रेखांकित किया । गजल को हिंदी में गीतिका जैसे कुछ दूसरे नाम भी दिए गए । डॉ. उर्मिलेश, कुंवर बेचैन, अदम गोंडवी, चंद्रसेन विराट जैसे अनेक कवियों ने हिंदी गजल को समृद्ध किया ।
उम्मीद है गजल के विषय में यह जानकारी तुम्हारे लिए उपयोगी साबित होगी । कथ्य और शिल्प के बेहतरीन सम्मिलन से तुम और बेहतर गजल लिख पाओगे हालांकि उस्ताद शायरों का कहना है कि गजल कही जाती है लिखी नहीं जाती । इसके पीछे मंशा यह है कि गजल को इतना गुनगुनाओ कि उसका हर शेर मुकम्मल बन जाए ।
तुम्हारा
-डॉ. अशोक प्रियरंजन
(फोटो गूगल सर्च से साभार )

Sunday, November 16, 2008

महिलाओं के सपनों की सच्चाई बयान करती तस्वीर

-डॉ अशोक प्रियरंजन
मेरा शहर मेरठ - मेयर मधु गुजॆर । मेरा प्रदेश उत्तर प्रदेश - मुख्यमंत्री मायावती । मेरा देश भारत-सत्तारूढ यूपीए की चेयरमैन सोिनया गांधी । ये सब प्रतीक हैं उस सत्ता के जिसके शीषॆ पर िवराजमान हैं महिलाएं । एक शहर से लेकर देश की उच्च सत्ता पर महिलाओं का विराजमान होना सुखद संकेत हो सकता है । अपेक्षा की जानी चाहि िक इस िस्थित में महिलाओं की जिंदगी बेहद खुशहाल, उम्मीदें जगाने वाली और सतरंगी सपनों से लबरेज हो । पहले जमाने में उनके लि जो मुिश्कलें रहीं वह अब खत्म हो जानी चाहि । पुरूषों के स्थान पर शीषॆ पदों पर महिलाओं के प्रतिष्ठित होने से संपूणॆ महिला समाज के तरक्की की उम्मीद जगना स्वभावि है । एेसा लगता है िक इस स्तिथि में महिलाओं को भी पुरुषों के समान ही रोजगार, कामकाज, अधिकार और आथिॆक आत्मनिभॆरतािलनी चािहए लेकि हकीकत कुछ और है ।
भारत की महिलाओं की सि्थति की असलियत को सामने लाती है यूएनओ की लैंगि समानता संबंधी रिपोटॆ । इस रिपोटॆ के मुताबि लैंगि समानता के मामले में भारत विश्व में ११३वे स्थान पर है । तस्वीर और साफ हो जाएगी अगर सीधे लफ्जों में कहा जाए िक लैंगि समानता के मामले में ११२ देशों में में महिलाओं की सि्थति भारत से बेहतर है । यह एेसा सच है जो महिलाओं की तरक्की के तमाम दावों की पोल खोलता है । अपने आसपास रोजाना घट रही घटनाओं पर नजर डालें तो लगता है िक महिला पुरुष समानता का नारा अभी खोखला ही है ।
नेशनल क्राइम रेका‍र्ड ब्यूरो के आंकडों के मुतािबक वषॆ २००६ में देश में बलात्कार के १९३४८, दहेज के लि हत्या के ७६१८, महिलाओं लडकियों के अपहरण के १७४१४, छेडछाड के ३६६१७, यौन उत्पीडन के ९९६० और पति-परिजनों की कूरूर्ता के ६३१२८ मामले दजॆ िकए गए । महिला संबंधी अपराधों की इस सि्थति के बीच कैसे तरक्की के सपने देखे जा सकते हैं । अपराधों की यह डरावनी तस्वीर आधी आबादी को हर समय आशंकि और भयभीत कि रहती है । घर की दहलीज हो या िफर खुली सडक कहीं भी महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं । जब तक मिहलाओं को सुरक्षा का भरोसा नहीं होगा तब तक वह कैसे पुरुष के कंधे से कंधा मिलाकर काम कर सकती हैं । इसके लि जरूरी है िक महिलाओं के प्रति सामाजि द्रिषटिकोण में भी बदलाव हो । यह बदलाव न होने के कारण ही कन्या भूर्ण हत्या एक बडी बुराई के रूप में उभर रही है । एक कडवा सच यह भी है िक बुराई को आगे बढाने में पढा िलखा तबका सबसे ज्यादा है । लैंगि समानता का आधार तो जन्म से ही शुरू होना चाहि । जब कन्या को जन्म देने पर दुख के बजाय सुख की अनुभूति होने लगेगी तो यह लैंगि समानता की शुरूआत होगी ।
िना भेदभाव के कन्या शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराए जाएंगे, उन्हें अपनी मजीॆ से कैरियर चुनने की आजादी मिलेगी तो इस दिशा में अगले कदम होंगे । जब विवाह में उन्हें लडके के समान निणॆय लेने की स्वतंत्रता मिलेगी तब यह समानता का विस्तार होगा । जब वह ससुराल, रोजगार, सत्ता और आथिॆक स्वाबलंबन में उनके साथ कोई भेदभाव नहीं होगा तब यह वास्तिवक लैंगि समानता होगी । एेसी सि्थति में वह निभीॆक होकर जीवन यापन कर पाएंगी, देश के विकास में भरपूर योगदान दे पाएंगी और उन सपनों में इंद्रधनुषी रंग भर पाएंगी जो उनकी आंखों में आकार लेते रहते हैं । इन सपनों को पूरा करने के िलए परिवार, समाज और सरकार का योगदान जरूरी है । सभी का सहयोग होगा तो सपने जरूर पूरे होंगे ।
(फोटो गूगल सर्च से साभार)

Tuesday, November 4, 2008

आतंकवाद, मंदी और क्षेत्रवाद से उपजा संकट

-डॉ. अशोक प्रियरंजन
आतंकवाद, मंदी और क्षेत्रवाद की समस्या ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया है । पूरी दुनिया सिर्फ मंदी को झेल रही है जबकि भारत के समक्ष इसके साथ ही दो और संकट आतंकवाद और क्षेत्रवाद लोगों की परेशानी का सबब बने हुए हैं । आर्थिक संकट के साथ ही जान-माल की हिफाजत का भरोसा भी शिथिल पड रहा है । कब नौकरी पर छंटनी की तलवार लटक जाए, कब कहीं बम विस्फोट हो जाए, कब क्षेत्रवाद का दानव मौत के घाट उतार दे, किसी को पता नहीं । यह हालात अस्थिरता और तनाव की स्थितियां पैदा कर रहे हैं । हर आदमी इन समस्याओं से व्यथित है । पूरे देश में एक अजीब किस्म का खौफ का माहौल बन रहा है जो लोगों को बेचैन किए है । मौजूदा दौर में उपजी समस्याओं पर गंभीर वैचारिक मंथन की जरूरत है ताकि इनका हल निकाला जा सके ।
आतंकवाद की समस्या देश में गंभीर होती जा रही है । दहशतगर्दों ने न जाने कितने घरों के चिराग बुझा दिए हैं और अनेक लोगों को ऐसे जख्म दिए जिनकी टीस वह जिंदगीभर सहने के लिए मजबूर हैं । बीते छह महीने में देश में ६४ सीरियल ब्लास्ट हुए हैं जिनमें २१५ लोग मारे गए और ९०० घायल हो गए । जयपुर, अहमदाबाद, बंगलूरू और दिल्ली के बाद आतंकवादियों ने ३० अक्तूबर को असम को निशाना बनाया । दहशतगर्दों ने गुवाहाटी, कोकराझार, बोंगाइगांव और बरपेटा में भीडभाड़वाले बाजारों में १३ सिलसिलेवार धमाके कर ६१ लोगों को मौत की नींद सुला दिया । विस्फोट में ४७० लोग घायल हुए हैं । वर्चस्व जाहिर करने के लिए अंजाम दी गई इस सनसनीखेज वारदात में शक की सुई हूजी आतंकियों की ओर है।
इस समय पूरी दुनिया एक गंभीर संकट से गुजर रही है । मंदी की मार ने लोगों का जीना मुहाल कर दिया है । मजबूत अर्थव्यवस्था वाले देशों के उद्यमी भी अपने यहां नौकरियों में कटौती करने के मजबूर हैं । अमेरिका में मंदी की सुनामी ने जो तबाही मचाई है उससे भारत भी अछूता नहीं है । एसोचेम की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक सात प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों में आगामी १० दिन में २५ फीसदी कर्मचारियों की छंटनी की आशंका है हालांकि बाद में यह रिपोर्ट वापस ले ली गई । बेरोजगारी की समस्या झेल रहे इस देश में मंदी से उपजी बेरोजगारी नई पीढी में हताशा और मायूसी ही लाएगी । कैरियर को लेकर जो सपने उन्होंने देखे हैं, उन पर ग्रहण लगता प्रतीत हो रहा है । ऐसे में उनके समक्ष चुनौतियां और बढ़जाएंगी । जटिल परिस्थितियों में कैरियर को आकार देना और अपने सुखद भविष्य की जमीन तैयार करना निसंदेह आसान काम नहीं है । नई पीढ़ी को एक नए उत्साह और दृढ संकल्पशक्ति के साथ शिक्षा और कैरियर से जुडे लक्ष्यों को पूरा करने के लिए मेहनत करनी होगी । अभिभावकों और शिक्षकों को उनका मार्गदर्शन करना होगा ।
मंदी के संकट के संग ही देश में क्षेत्रवाद ने गंभीर स्थिति पैदा कर दी है । पिछले कुछ अरसे से मराठी क्षेत्रवाद के नाम पर मुंबई में जिस तरह उत्तर भारतीयों की हत्या की जा रही है, वह बहुत खतरनाक संकेत हैं । सपनों की नगरी मुंबई में जाने का ख्वाब पूरे देश के लोग देखते हैं । अभिनय, नाटक और विविध क्षेत्रों में अपनी प्रतिभाओं से लोगों को आकर्षित कर रहे लोग मुंबई जाकर नाम और पैसा कमाना चाहते हैं । देश की आर्थिक राजधानी होने के नाते मुंबई में रोजगार के व्यापक अवसर उपलब्ध हैं । रोजगार की तलाश में बडी संख्या में लोग मुंबई जाते हैं । मुंबई के भी लोग नौकरी अथवा अन्य व्यवसायों को करने के लिए देश के विविध भागों में जाकर अपनी किस्मत चमकाते है ं। देश में रोजगार के लिए अगर क्षेत्रवाद की दीवारें खींच दी जाएंगीं तो लोगों को आजीविका जुटाने में बडी कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा । इसलिए क्षेत्रवाद पर अंकुश लगाना जरूरी है।
(इस लेख को अमर उजाला कॉम्पैक्ट मेरठ के ३१ अक्तूबर २००८ के अंक में संपादकीय पृष्ठ पर भी पढा जा सकता है)
(फोटो गूगल सर्च से साभार)

Sunday, October 26, 2008

हुआ तिमिर का देश निकाला दीपक जलने से


-डॉ. अशोक प्रियरंजन
सोने जैसा हुआ उजाला दीपक जलने से,
भाग गयाअँधियारा काला दीपक जलने से ।

आंगन आंगन, बस्ती बस्ती और सभी चौबारों पर,
सजती मोती जैसी माला दीपक जलने से ।

चमक उठे घर देहरी आंगन और गांव की चौपालें,
जगमग मन्दिर और शिवाला दीपक जलने से ।

ज्ञानोदय करने को निकली रूपहली िकरणें अंबर से,
हुआ तिमिर का देश िनकाला दीपक जलने से ।

मस्ती खुशबू, रुप सलोना और नए मीठे कुछ सपने,
जीवन बन जाता मधुशाला दीपक जलने से ।

सोने जैसी रातें लगती चांदी जैसे िदन सारे,
खुला खजाने का ताला दीपक जलने से ।

शब्दों से संगीत निकलता मन की वीणा पर रंजन,
समां गजल का बंधानिराला दीपक जलने से

(फोटो गूगल सर्च से साभार )

Friday, October 24, 2008

लडिकयों को खुद ही लडनी होगी अपनी लडाई

-डॉ अशोक प्रियरंजन
इस ब्लाग पर नारी िवमशॆ से जुडे िविभन्न मुद्दों को लेकर हुई िवचारोत्तेजक बहस में शािमल िटप्पिणयों के आधार पर यह िनष्कषॆ िनकलता है िक लडिकयों को अपनी लडाई खुद ही लडनी होगी । िजन्दगी को खुशनुमा बनाने के िलए तमाम कोिशशों की पहल उन्हीं को करनी होगी । उनकी इस लडाई में समाज और सरकार सहयोग दे तो उन्हें जल्दी मंिजल िमल जाएगी । मंिजल तक पहुंचने के िलए उन्हें समाज और सरकार की ओर देखने की अपेक्षा खुद को अिधक मजबूत करना होगा । इसके िलए सबसे जरूरी है िशक्षा । लडिकयों को इतनी िशक्षा हािसल करनी होगी जो उन्हें आत्मिनभॆर बना सके । दूसरे के सहारे िजंदगी बसर करने की िस्थित नारी को काफी कमजोर कर देती है । िशक्षा और किरयर के प्रित उन्हें बहुत सजग होने की जरूरत है । यह सजगता उन्हें आत्मिनभॆर बनाने में बहुत कारगर िसद्ध होगी । आत्मिनभॆर होने पर वह पूरे सम्मान, स्वािभमान और मनोवांिछत तरीके से िजंदगी को जी पाएंगी । िशक्षा की रोशनी उनकी पूरी िजंदगी में उजाला भर सकती है । इसमें कोई दोराय नहीं िक लडिकयों को िशक्षा हािसल करने के िलए भी एक पूरी लडाई लडनी होगी । घरवालों को अच्छी िशक्षा हािसल करने के िलए तैयार करना, स्कूल आते जाते समय मनचलों से िनपटना और िफर घर की िजम्मेदािरयों को िनभाते हुए पढाई में अच्छे नतीजे हािसल करना कोई आसान काम नहीं है । इससे भी मुिश्कल है नौकरी हािसल करना । नौकरी पा लेने के बाद पुरुषों के बीच कामयाबी हािसल करना भी जिटल चुनौती होती है । इन चुनौितयों को स्वीकार करके ही अपने अिस्तत्व को व्यापक फलक पर चमकाया जा सकता है ।
जीवनसाथी के चयन में भी जागरूकता जरूरी है । मां-बाप सही फैसला करते हैं लेिकन अगर कभी जीवनसाथी के चयन को लेकर फैसले में दोष िदखाई दे तो उस पर आपित्त करना, अपनी इच्छाओं को अिभव्यक्त करना और सही चयन के िलए तकॆ िवतकॆ करने में कोई बुराई नहीं है । एक बार की न अगर िजंदगीभर की खुिशयों के िलए हां बन सकती है तो एेसा कर लेना चािहए । जीवनसाथी से तालमेल बना रहेगा तो िजंदगी खुशगवार हो जाएगी ।
छेडछाड, दहेज उत्पीडन और पित-ससुराल वालों की ज्यादितयों से िनपटने के िलए अपने मनोबल को मजबूत करना होगा । मानवािधकारों और अपने अिधकारों के प्रित सचेत होना होगा । खुद को जूडो-कराटे जैसे प्रिशक्षण लेकर स्वयं छेडछाड से िनपटने का साहस जुटाना होगा । अन्य ज्यादितयों से कानूनी तरीके से लडाई लडी जा सकती है । इन सब लडाइयों को लडने के िलए साहस, आत्मिवश्वास और स्वाबलंबन की सबसे ज्यादा जरूरत होगी । इन सबके सहारे ही िजंदगी का मकसद हािसल िकया जा सकता है । नारी शिक्त की अथॆवत्ता और महत्ता को रेखांिकत करते हुए देश और समाज में योगदान िदया जा सकता है । िजंदगी को एेसा बनाया जा सकता है िजसमें उम्मीद की रोशनी हो, आत्मिवश्वास की मजबूती और स्वािभमान से सजे इंद्रधनुषी सपने हों और उन्हे पूरे करने की ललक आकार लेती िदखाई दे ।
(फोटो गूगल सचॆ से साभार)ं

Saturday, October 18, 2008

पुरुषवादी सोच में तबदीली से बदलेगी महिलाओं की जिंदगी

डॉ. अशोक प्रियरंजन
१२ अक्टूबर को इस ब्लाग पर िलखे अपने लेख-सुरक्षा ही नहीं होगी तो कैसे नौकरी करेंगी मिहलाएं- पर जो प्रितिक्रयाएं आईं उन्होने बहस को आगे बढाते हुए कई सवाल खडे कर िदए । इसके साथ ही वैचािरक मंथन से कुछ एेसे िनष्कषॆ भी िनकले िजन पर िवचार करना समय की जरूरत है । इसमें कोई दो राय नहीं िक पहले के मुकाबले लडिकयों और मिहलाओं की िस्थितयों में व्यापक सुधार हुआ है । समाज और सरकार दोनों स्तरों पर जो प्रयास हुए, उसी का नतीजा है िक आज लडिकयों का बहुत बडा वगॆ अपनी िजंदगी के सपनों में रंग भर सकता हैं और उन्हें दृढ संकल्पशिक्त के सहारे हकीकत में भी बदल सकता हैं । पहले की अपेक्षा लडिकयां अिधक िशिक्षत हुई हैं, उन्हें रोजगार के अवसर बढे हैं, स्वतंंत्र िनणॆय लेने के अवसर भी िमल रहे हैं । यह बदलाव बहुत सुखद संकेत है ।
इस सबके बावजूद अभी भी बहुत कुछ एेसा है जो उन्हें उनके कमजोर होने का अहसास करा देता है । यह अहसास ही एेसी पीडा है िजसको िमटाने के िलए अमृतमयी औषिध खोजनी होगी । यह औषिध समाज से ही हािसल होगी । समाज को पुरूषवादी सोच में बदलाव लाना होगा िजसके चलते संपूणॆ नारी जाित को कई तकलीफों का सामना करना पडता है ।
अब सवाल पैदा होता है िक पुृरुषवादी सोच क्या है ? इसका प्रभाव क्या है ? यह िवकास में िकस तरह से बाधक है और इसे कैसे दूर िकया जा सकता है ? दरअसल पुरुषवादी सोच ही है जो समाज और पिरवार के तमाम महत्वपूणॆ फैसलों में पुरुष की भूिमका को ही िनणाॆयक मानती है । मिहलाओं और लडिकयों के जीवन से जुडे फैसले भी पुरुष ही करते हैं । यह अलग बात है िक कई बार ये फैसले गलत हो जाते हैं पूरी उम्र वह लडकी इसका खािमयाजा भुगतती रहती है । पुरुषवादी सोच के चलते ही कोई नारी अपने जीवन के संबंध में स्वतंत्र िनणॆय नहीं ले पाती । उसकी प्रितभा का व्यापक फलक पर प्रदशॆन नहीं हो पाता । उसका आत्मिवश्वास घटता है । कदम कदम पर उसे समझौते करने के िलए िववश होना पडता है । पुरुषवादी सोच ही िकसी लडकी की पूरी िजंदगी की तस्वीर बदल देती है । अगर इस सोच में बदलाव आ पाए तो मिहलाओं की भूिमका, प्रितभा और आत्मिवश्वास व्यापक फलक पर चमककर देश और समाज के िलए और महत्वपूणॆ योगदान देने में समथॆ हो जाएगी ।
इस संबंध में रंजना की राय है िक शिक्षा अपने आप बहुत कुछ बदल देगी ।और इसके लिए जितना पुरुषों को आगे आना है उस से अधिक महिलाओं को आगे आना होगा। क्योंकि अभी जो शिक्षित स्त्रियाँ हैं और धनार्जन कर रही हैं वे अपने स्त्री समुदाय के लिए कुछ करने के बजाय अपने भौतिक सुख सुविधाओं के लिए ही धन व्यय करती हैं,अपने समाज के उत्थान की तरफ़ उनका ध्यान शायद ही जाता है स्त्रियों की दशा सुधरने में जितना कुछ पुरुषों को करना है उससे बहुत अधिक स्त्रियों को करना है । शोभा का मानना है िक नारी को स्वयं को बलवान बनाना होगा। अपनी लड़ाई वेह किसी की मदद के बिना भी जीत सकती है। उसमें अपार शक्ति है। कमी केवल उसके भीतर छिपे आतम विश्वास की है ।
स्वाित भी सोच में बदलाव की पक्षधर हैं । वह िलखती हैं िक यहाँ सिर्फ़ नारी की हिम्मत बढ़ाने की बात मत कीजिये । पुरूष-मानसिकता बदलाव की भी चर्चा कीजिये, जो इसका मूल कारन है । िववेक गुप्ता, हिर जोशी (इदॆ-िगदॆ), रचना िसंह, प्रीित वथॆवाल मानते हैं िक नारी को अभी और संघषॆ करना होगा । पलिअकारा का विचार है की लडाई तो लंबी चलेगी और महिलाओं को मजबूत होना ही होगा । मानसिकता में परिवर्तन भी धीरे धीरे ही आएगा ।
लडिकयों की सुरक्षा के संदभॆ में श्रुति की राय बडी महत्वपूणॆ है । उनका कहना है िक क्या लडकी की इज्जत और गौरवभान सिर्फ उसके शरीर से जुडा है । आत्मा की सच्चाई और दिमाग की शक्ति कोई मायने नहीं रखती । इसलिए अपनी सुरक्षा खुद कीजिए । बहार निकलिए आसमां को एक बार निहारिए अपने पंख फैलाइए और उड़जाइए । इस आसमां को फतह करने के लिए । कविताप्रयास कहती हैं आज की कामकाजी महिला को भी स्वयम रक्षा के लिए शारीरिक एवं मानसिक रूप से तैयार होना होगा | सचिन मिश्रा और रंजन राजन के मुताबिक रात में काम करने वाले सभी को सुरक्षा मिलनी चाहिए। ।
शमा की राय में लडिकयों को यह समझ लेना चािहए िक शरीर के मुकाबले उनकी रूह ज्यादा कीमती है । मिहलाओं को अपनी सुरक्षा खुद करनी होगी, समाज से उन्हें सुरक्षा की अपेक्षा छोडनी होगी । घरों में मिहलाओं की आत्मा को पल-पल घायल िकया जाता है, वहां कैसे सुरक्षा होगी ? सरीता लिखती हैं महिलाओं के लिए स्वतंत्रता की नहीं बल्कि स्वाव्लंबन की ज़रुरत है । बेहतर होगा कि आत्म निर्भर बनने के लिए महिलाएं स्वयं प्रयास करें । मुझे लगता है कि महिलाओं ्को सरकारी टेके की कोई दरकार नहीं । अपने अस्तित्व को समझते ही स्त्री संभावनाओं के आकाश में उडान भर सकेंगी ।
निर्मल गुप्त की राइ में बदलाव के लिए महिलाओं को ही पहल करनी होगी । डा कुमारेंद्र िसंह सेंगर और शैली खत्री का कहना है िक छेडछाड का मुंहतोड जवाब देकर ही असामािजक तत्वों के हौसले पस्त िकए जा सकते हैं । उनमें अगर यह भय पैदा हो गया िक लडकी थप्पड मार देगी तो वह छेडछाड का साहस नहीं कर पाएंगे । जमोस झल्ला का कहना है िक सभी लड़कियों को सुरक्षा देना सम्भव नही है, इसलिए उन्हे ख़ुद आत्मविश्वास से यह लडाई लड़नी होगी ।
राधिका बुधकर, अनिल पुसदकर, फिरदौस खान, डॉ अनुराग, प्रदीप मनोरिया, श्याम कोरी उदा, ममता, रेनू शर्मा, पारुल, लवली और डॉ वि ने भी महिलाओं के संघर्ष को रेखांकित किया
(फोटो गूगल सर्च से साभार )