Sunday, October 12, 2008

सुरक्षा ही नहीं होगी तो कैसे नौकरी करेंगी मिहलाएं

-डॉ अशोक प्रियरंजन
छह अक्टूबर को इस ब्लाग में िलखे अपने- लेख िकतनी लडाइयां लडंेगी लडिकयां -पर जो कमेंट्स आए, उन्होंने मेरे सामने कई सवाल खडे कर िदए । इन सवालों पर वैचािरक मंथन करने पर लगा िक यह िवषय अभी और िवस्तार की संभावना िलए हुए है । इस पर सार्थक बहस की गुंजाइश है । एक सवाल यह भी आया की क्या कामकाजी परिवेश महिलाओं के लिए अनुकूल है ? आज महिलाओं का शैक्षिक स्तर और रोजगार के अवसर बढे हैं, लेकिन कामकाजी परिवेश सुरक्षित नहीं है घर की चारदीवारी से बाहर निकलते ही महिलाओं को सुरक्षा की चिंता सताने लगती है । एसोचैम के ताजा सर्वेक्षण में इस बात का खुलासा हुआ है कि देश की ५३ फीसदी नौकरीपेशा महिलाएं खुद को असुरक्षित मानती हैं । ८६ प्रतिशत नाइट शिफ्ट में आते-जाते समय परेशानी महसूस करती हैं । बीपीओ, आईटी, होटल इंडस्ट्री, नागरिक उड्डयन, नर्सिंग होम, गारमेंट इंडस्ट्री में लगभग ५३ प्रतिशत कामकाजी महिलाएं खुद को सुरक्षित महसूस नहीं करती हैं । देश की राजधानी दिल्ली तक में ६५ फीसदी महिलाएं खुद को महफूज नहीं मानतीं हैं । बीपीओ तथा आईटी सेक्टर की महिलाओं को इसका सबसे ज्यादा खतरा सताता है । नर्सिंग होम और अस्पतालों में रात में काम करने वाली ५३ प्रतिशत महिलाओं को भी हर वक्त यही चिंता रहती है । ऐसी हालत में महिलाओं का पुरुषों के समान काम करने का सपना कैसे पूरा होगा । सच यह है की जब तक कर्येस्थालों पर सुरक्षा नहीं होगी, महिलाएं पूरे आत्मविश्वास के साथ नौकरी नौकरी नहीं कर पायेंगी ।
वास्तव में भारतीय समाज में महिलाओं का संघर्ष बहुत व्यापक है । इसकी अभिव्यक्ति ब्लॉगर के कमेंट्स से भी होती है । निर्मल गुप्त ने लिखा की इस लेख से सार्थक बहस की शुरुआत हो सकती है । इस बारे ें राधिका बुधकर का मानना है की यह समस्या समाज की हैं । स्त्री जो भी भुगत रही हैं वह संपूर्ण समाज की दुर्बल मानसिकता का परिचायक हैं । कुछ प्रबुद्ध पुरूष वर्ग स्त्री के विकास के लिए प्रयत्न कर रहा हैं ,किंतु यह नाकाफी हैं । स्त्री का जीवन तभी बदलेगा ,जब वह खुद इस दिशा में प्रयत्न करेगी । आखिर मुसीबते उसकी ही मंजिलो में रोड़ा बनकर खड़ी हैं । कुछ स्त्रियाँ ऐसा कर भी रही हैं ,किंतु कुछ के प्रयत्न करने से बहुत कुछ स्त्री विकास की आशा नही की जा सकती । सर्वप्रथम स्त्री को ही यह समझना होगा की उसे किस दिशा में व कैसे प्रयत्न करने हैं । उसे सामाजिक व आर्थिक दोनों क्षेत्रो में मजबूत होने के साथ ही ऐसे छेडछाड़ करने वाले लडको को दो थप्पड़खींच के देने हिम्मत भी करनी पड़ेगी । अगर लडकियों ने ऐसा करना शुरू किया तो इस तरह के लडको की हिम्मत भी नही रहेगी ऐसा करने की ।
समीर लाल (उड़न तश्तरी ) की राय में निश्चित ही इस दिशा में बदलाव आया है और अनेक बदलावों की आशा है । रचना ने तो ब्लागरों को ही आलोचना की । उनका कहना है की हिन्दी ब्लोगिंग मे कुछ गिने चुने ब्लॉगर ही हैं जो महिला आधारित विषयों पर महिला के दृष्टिकोण को रखते हैं । यहाँ ज्यादातर ब्लॉगर केवल और केवल एक रुढिवादी सोच से बंधे हैं जो महिला को केवल और केवल घर मे रहने वाली वास्तु समझते हैं । फिरदौस खान कहती हैं की हैरत की बात तो यह है कि पढ़े-लिखे लोग भी यह समझते हैं कि लड़किया कुछ नहीं कर सकतीं... हमारे ही ब्लॉग को कुछ ब्लोगर किसी पुरूष का ब्लॉग मानते हैं... क्या किसी लडकी को अपने विचार व्यक्त करने का अधिकार नहीं है...? अनिल पुसादकर के अनुसार लडकियों को वाकई हर मोर्चे पर लडना पड रहा है । घर के बाहर भी और भीतर भी । वंश बढाने वाली बात भी अब गले नही उतरती । आश्रमों मे जाकर बुजूर्गों को देखो तो लगता है की एक नही चार पुत्र होने के बाद ये यंहा रहने पर मज़बूर हैं तो ऐसे पुत्रों का क्या फ़ायदा । उनसे तो बेटियां हज़ार गुना अच्छी हैं । जाकिर अली रजनीश कहते हैं की यह लडाई सिर्फ लडकियों की नहीं, मानसिकता की है । और ऐसी लडाइयों के लिए कभी कभी सदिया भी नाकाफी होती हैं । लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि लडाई छोड दी जाए । ध्‍यान रखें कि लडाई जितनी कठिन हो, मंजिल उतनी आनंददायक होती है ।
रक्षंदा का मत है की ये लड़ाई सदियों से चलती आरही है और अभी जाने कब तक चलती रहेगी क्योंकि मंजिल अभी काफी दूर है..लेकिन हौसले हैं की बढ़ते जारहे हैं...और जब साथ इतने मज़बूत हौसले हों तो मंजिल देर में सही, मिलती जरूर है... डॉ अनुराग मानते हैं की हौसलों के लिए कोई बंधन नही ......ऐसी कितनी लडकिया अनसंग हीरो की तरह रोजमर्रा के जीवन में अपनी लड़ाई लड़रही है । ज्ञान का कहना है की समस्यायें तो सभी जगह और सभी को है, लड़कियाँ उनसे अलग नहीं हैं । हाँ उनकी श्रेणी ज़रूर अलग है ।
प्रीती बर्थवाल के मुताबिक कि 'कदम कदम पर एक नई लङाई का सामना करना पङता है लङकीयों को । बदलाव की उम्मीद करते ही रहते है लेकिन कब तक होगा? कुछ बदलाव हुए है लेकिन वहां भी ऐसों की कमी नही होती जो राह में रोङे न अटकाते हों । सरीता का कहना है की संचार क्रांति के इस युग में मोबाइल जैसे उपकरणों ने समाज को बहुआयामी साधन मुहैया कराए हैं , लेकिन गैर ज़िम्मेदार तौर - तरीकों ने इस बेहतरीन संपर्क साधन को घातक बना दिया है । महिलाओं की तरक्की को रोकने की ये बेहूदा हरकतें कामयाब नहीं होंगी ।
रेनू शमा का मानना है िक इस तरह के लेख पढकर लगता है िक नारी की आवाज भी कोई सुन सकता है । तरूण का कहना है िक न जाने िकतनी लडिकयां हर रोज लडाइयां लडती हैं । शैली खत्री के मुतािबक लडिकयों के लडिकयों के मामले में बहुत कुछ सुधरा है पर अभी कई मोरचे जीतने बाकी हैं । इसमें समय लगेगा। क्योंिक कुछ बदलाव हर जगह समान रूप से नहीं हुआ है। ज्योित सराफ की राय में आज तो आलम यह है िक मिहला मुसीबतों की परवाह िकए िबना अपने लक्षय को पाने के िलए आगे बढ़ रही है । वहीं पुरुष अपनी झूठी शान बचाने के िलए प्रयत्नशील है । शोभा, सीमा गुप्ता, हिर जोशी, प्रदीप मनोिरया और सिचन िमश्रा ने भी लडिकयों के संघर्ष को रेखांिकत िकया ।
वास्तव में इसमे कोई दो राय नहीं िक िस्थितयां सुधरी हैं लेिकन अभी काफी कुछ सुधार की गुंजाइश है । मिहलाओं के संघर्ष को सार्थक बनाने के िलए केवल सरकार ही नहीं बिल्क समाज के िविवध वर्गों को भी प्यास करने होंगे । तभी वह पूरे सम्मान, िनभीॆकता और आत्मिवश्वास के साथ देश के िवकास में अपना योगदान दे पाएंगी
बहस के मुद्दे- इस मुद्दे पर बहस के िलए कई सवाल उभरकर सामने आए हैं िजन पर वैचािरक मंथन िकया जाना जरूरी है । इन सवालों पर बुिद्धजीिवयों की राय अपेिक्षत है-
१-छेडछाड से लडिकयां और मिहलाएं कैसे िनबटें ।
इसकी रोकथाम के िलए क्या उपाय और िकए जाने चािहए ।
२-काजकाम का पिरवेश अनुकूल बनाने के िलए क्या प्रयास िकए जाने चािहए ।
३-मिहलाओं की िस्थित सुधारने के िलए सरकार से क्या अपेक्षाएं हैं ।
४-समाज के दृिष्टकोण में िकस तरह के बदलाव की उम्मीद की जानी चािहए ।
(फोटो गूगल सर्च से साभार )

Wednesday, October 8, 2008

रावण तेरे िकतने रूप

-डॉ अशोक प्रियरंजन
हर साल िवजयदशमी पर रावण का पुतला जलाया जाता है । पूरे देश में कागज के पुतले तो जला िदए जाते हैं लेिकन समाज में मौजूद अनेक रावण अभी भी िजंदा हैं । कागज के पुतलों से अिधक जरूरी उन रावणों को जलाना है जो पूरे देश की जनता को परेशान िकए हैं और उनके िलए िचंता का सबब बने हुए हैं । तमाम कोिशशों के बाद भी इन रावणों को अभी तक नहीं जलाया जा सका है । देश और समाज में ये रावण िविवध रूपों में मौजूद हैं और अक्सर सामने आते रहते हैं । रामराज में भोली-भाली जनता और साधु संत राक्षसरूपी रावण से भयभीत थे । आज भी आतंकवाद रूपी रावण िसर उठाये पूरे देश के सामने खडा है । यह रावण कभी मुंबई, कभी हैदराबाद, कभी िदल्ली, कभी अहमदाबाद में तबाही मचाता है । न जाने िकतने लोगों की जानें इस रावण ने ले ली हैं । िकतने घरों को आतंकवाद ने तबाह कर िदया है । इसे खत्म करना जरूरी है ।
रावण ने सीता का अपहरण िकया और बाद में यही बात उसके संहार का कारण बनी । आज िस्थित गंभीर है । न जाने देश में िकतनी मिहलाओं और लड़कियों के अपहरण होते हैं लेिकन अपहरण करने वाले बेखौफ घूमते हैं अलबत्ता कई बार अपहरण की त्रासदी के कारण नारकीज िजंदगी की आशंका से पीिडत़मिहला जरूर अपनी िजंदगी से मुंह मोड़लेती है । आज के अपहरणकतार्ता रूपी रावण को िकसी राम का भय नहीं है ।
रावण अनाचार का प्रतीक था लेिकन आज तो पूरे देश में ही भ्रष्टाचार व्याप्त है । भ्रष्टाचार में भारत ने िवश्व पटल पर अपनी पहचान बनाई है । मनुष्य का आचरण हो या सरकारी गैरसरकारी कामकाज सभी पर भ्रष्टाचार की छाया है । हर आदमी भ्रष्टाचार से त्रस्त है, इसके बावजूद पूरा देश भ्रष्टाचार से ग्रसत है । इस भ्राष्चार रूपी रावण का जब तक अंत नहीं होगा तब तक लोगों को सुकून नहीं िमल पाएगा ।
अत्याचारके िलए भी रावण का नाम िलया जाता है । आज भी देश में पग पग पर अत्याचार व्याप्त है । कहीं गरीब सताए जा रहे हैं तो कहीं मजदूरों पर अत्याचार हो रहे हैं । अत्याचार रूपी रावण अपराधी की शक्ल में आकर हत्या, चोरी, डकैती जैसी घटनाओं का कारण बनता है । यहां तक की अब मरीजों के गुर्दे् और आंखें और अन्य अंग िनकालने का भी व्यवसाय िकया जा रहा है जो शायद रावण राज में भी नही होता था । सीधे शबद्ों में कहें तो अत्याचार के मामले में तो आधुिनक युग ने रावण राज को भी पीछे छोड़ िदया है ।
रावण अनैितकता का भी प्तीक था लेिकन आज के युग में तो अनैितकता पहले से अिधक है । आज सामािजक, राजनीितक समेत अनेक क्षेत्रों में नैितक मूल्यों का पतन हुआ है । यही वजह है िक आज भी अनैितकता का बोलबाला है । इसी कारण अनेक पिवत्र संबंध भी कलुिषत होने लगे हैं । कहीं अवैध संबंध पनपे हुए हैं तो कहीं िनजी स्वाथर् के िलए आत्मीय िरश्तों को ही ितलांजिल दे दी गई है । धन के सामने सारी नैितकता गौण होने लगी है ।
तमाम तरह की कुप्रथाएं भी रावण का ही एक रूप हैं । ं दहेज प्रथा रूपी रावण तो नारी जाित का सबसे बडा दुश्मन बना हुआ है । इसी के साथ महंगाई रूपी रावण जनता का सुख चैन छीने हुए है । कहीं संपरदायवाद तो कहीं जाितवाद के रूप में जो िदखाई देता है वह भी तो रावण ही है । इन तमाम रावणों का वध जब तक नहीं होगा तब तक जनता कैसे चैन से सोएगी । सच तो यह है िक इन रावणों का वध करने के िलए जनता को ही िमलजुलकर प्रयास करने होेगे । इसके िलए हर आदमी को संकल्प लेना होगा िक वह ििवध रूपों में जो रावण मौजूद हैं, उनके िखलाफ लडाई लडेगा । तभी िस्थितयां सुधरेंगी ।
( फोटो गूगल सर्च से साभार )

Monday, October 6, 2008

कितनी लडाइयां लडेंगी लडकियां

-डॉ. अशोक़प्रियरंजन
मेरठ के सरधना क्षेत्र के वपारसी केे ग्रामीणों ने पंचायत के बाद जो फैसला लिया वह यह सवाल खडे करता है कि लडकियों को अपनी जिंदगी की राह में तरक्की के फूल खिलाने के लिए कितनी लडाइयां लडऩी होंगी । कॉलेज पढऩे जाते समय वपारसी की एक लडकी के कुछ छात्रों ने मोबाइल से फोटो खींच लिए थे । इसी बात से आहत होकर वपारसी के लोगों ने गांव में पंचायत की और साफ कहा कि माहौल सुधरने पर ही छात्राओं को कॉलेज भेजेंगे । छेडछाड की समस्या वास्तव में इतनी गंभीर हो गई है कि उसे बहुंत गंभीरता से लेना जरूरी है । अभी थोडे दिन पहले ही मेरठ में विदेशी युवती से बस में छेडछाड़की घटना ने जिले को शर्मसार किया । मेरठ में कई बार लडकियों के लिए कॉलेज आना जाना बहुत तकलीफदेह साबित होता है क्योंकि उन्हें कई बार मनचलों की छेडछाड़और अभद्र टिप्पणियों का सामना करना पडता है । इसी मेरठ शहर में छेडछाड़का विरोध करने पर युवती के ऊपर तेजाब डालने तक की घटना हुई है । मेरठ में वर्ष २००७ में छेडछाड़की १३६ घटनाएं दर्ज हुईं । छेडछाड़की घटनाओं की एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि लोकलाज के कारण बहुत बडी संख्या में ऐसे मामलों की रिपोर्ट ही दर्ज नहीं कराई जाती है । इस कारण मनचलों के हौसले बुलंद रहते हैं । लडकियों की घटती जनसंख्या ही बड़ी चिंता का विषय बनता जा रहा है । ऊपर से ऐसी घटनाएं उनकी तरक्की में बाधा बन जाती है । उन्हें हर कदम पर आगे बढऩे के लिए संघर्ष करना होता है ।
वंश को आगे बढाने के े लिए लडके के प्रति मोह की मानसिकता, दहेजप्रथा जैसी बुराइयां समाज में प्रचलित होने के कारण कन्या भ्रूण हत्या के मामले बढ़ रहे हैं । कन्या भ्रूण हत्या रोकने के लिए भी पुख्ता व्यवस्थाएं नहीं हैं । इसी का नतीजा है कि मेरठ में एक हजार लडकों के मुकाबले लडकियों की संख्या ८५७ रह गई है । लडकियों के जन्म के बाद ही उनकी लडाई शुरू हो जाती है । भारतीय परंपरागत समाज में अभी भी लडका-लडकी का भेद बहुत गहराई से अपनी जडें जमाए हुए है । शिक्षा और विकास की तमाम स्थितियों के बाद भी लडकियों के साथ भेदभाव अभी खत्म नहीं हो पा रहा है । खासतौर से ग्रामीण अंचलों में यह समस्या गंभीर है । इसी कारण गांवों में अनेक लडकियां शिक्षा से वंचित रह जाती हैं । कई बार मां-बाप पढाना भी चाहें तो गांव में विद्यालय नहीं होते और दूसरे गांवों में वे उन्हें पढऩे नहीं भेजते । किशोरावस्था में भी उन्हें कदम कदम पर लडकी होने का अहसास कराया जाता है और इस कारण उन पर अनेक बंधन भी लगाए जाते हैं ।
उच्च शिक्षा ग्रहण करने में भी कई बार उन्हें अपनी इच्छाओं को तिलांजलि देकर परिजनों की इच्छा के अनुरूप राह चुननी होती है । कन्या महाविद्यालयों की कमी के चलते लडकियों को कई बार पढाई के सही अवसर नहीं मिल पाते हैं । कैरियर को लेकर भी उन्हें पूरी स्वतंत्रता नहीं मिल पाती है । रोजगार के कई क्षेत्र ऐसे हैं जिनमें उनके े लिए कम अवसर होते हैं । जहां वह रोजगार पा लेती हैं, वहां भी उन्हें लडकी होने के नाते असुरक्षा का बोध होता रहता है । दफ्तरों में भी स्त्री पुरुष भेद की मानसिकता के कारण महिलाओं को असुविधा होती है । यही स्थिति विवाहके ामले में रहती है । विवाह के सम्बन्ध में स्वतंत्र निर्णय लेने की स्थिति लडकी की नहीं रहती है । उसकी जिंदगी का फैसला परिवार के लोग करते हैं । जीवन साथी के चयन में आजादी न मिलने के कारन कई बार उन्हें त्रासदी का सामना करना पडता है।
यह बहुत सुखद है कि इन तमाम लडाइयों को लडकर भी लडकियां तेजी से आगे बढ़रही हैं । हाल ही में घोषित उत्तराखंड न्यायि। सेवा सिविल जज (जूडि) के परिणाम के मुताबिक मुजफ्फरनगर के कांस्टेबल की बेटी ज्योति जज बन गई है । इसी मेरठ शहर की अलका तोमर ने कुश्ती, गरिमा चौधरी ने जूडो, आभा ढिल्लन ने निशानेबाजी, दौड़में पूनम तोमर ने विश्वस्तर पर महानगर का नाम रोशन किया है । लेकिन अगर लडकियों को समस्याओं से मुक्ति दिला दी जाए तो वह पूरे आत्मविश्वास के साथ कामयाबी की नई इबारत लिख सकती हैं ।

( अमर उजाला काम्पैक्ट , मेरठ के अक्टूबर २००८ के अंक में प्रकाशित )
( फोटो गूगल सर्च से साभार )

Thursday, October 2, 2008

इस देश के हालात से बापू उदास हैं


दंगे औ फसादात से बापू उदास हैं,
इस देश के हालात से बापू उदास हैं ।

सपनों की जगह आंख में है मौत का मंजर,
हिंसक हुए जजबात से बापू उदास हैं ।

बढते ही जा रहे हैं अंधेरों के हौसले,
जुल्मों की लंबी रात से बापू उदास हैं ।

बंदूक बोलती है कहीं तोप बोलती,
हिंसा की शह और मात से बापू उदास हैं ।

तन पे चले खंजर तो कोई मन पे करे वार
हर पल मिले सदमात से बापू उदास हैं ।

आंसू कहीं बंटते तो कहीं दर्द मिल रहा,
ऐसी अजब सौगात से बापू उदास हैं

रंजन तुम्हारी आंख में क्यों आ गए आंसू,
इतनी जरा सी बात से बापू उदास हैं

-
डॉ. अशोक प्रियरंजन

( फोटो गूगल सर्च से साभार )

Friday, September 26, 2008

कहीं आतंकी तो कहीं अपराध, कैसे बढे पर्यटन

आज २७ सितंबर ो विश्व पर्यटन दिवस मनाया जाता है । पूरी दुनिया में पर्यटन ो बढावा देने मकसद से आज के दिन अनेक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं । इस बात पर विचार किया जाता है कि कैसे पर्यटन को बढावा दिया जाए । भारत पर्यटकों के लिए बडा मनोरम स्थल रहा है । यह ऐसा देश है जहां पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए सभी प्रकार के स्थल मौजूद हैं । यहां गोवा, मुंबई, चेन्नई, पांडिचेरी जैसे समुद्रतट, ताजमहल जैसी प्रेम प्रदर्शन की बेमिसाल खूबसूरत इमारत, ऊटी, कोडाईकनाल, शिमला, नैनीताल, मसूरी आदि मनमोहक पर्वतीय स्थल, कुतुबमीनार, लालकिला, हवामहल, आमेर का किला समेत अनेक ऐतिहासिक इमारतें, मीनाक्षी मंदिर, तिरुपति बालाजी, वैष्णो देवी, रामेश्वरम, जगन्नाथपुरी, द्वारिकापुरी, बद्रीनाथ जैसे व्यापक आस्था का केंद्र बने तीर्थस्थल, द्वादश ज्योर्तिलिंग का गौरव सहेजे पावनस्थल, हरिद्वार, इलाहाबाद, नासिक जैसे पावन नदियों के तट मौजूद हैं । भारत विविध संस्कृतियों का संगम है । इन सभी कारणों से विदेशियों के मन में भारत को देखने की गहरी इच्छा रहती है । इसीलिए भारत में पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं
इन सब स्थितियों के बावजूद िवश्व में भारत की पर्यटन की दृष्टि से स्थिति संतोषजनक नहींहै । वर्ष २००७ में विश्व में पर्यटकों को लुभाने वाले स्थलों में ताजमहल ५०वें स्थान पर है । वर्ष २००६ में पर्यटकों की नजर में सबसे ज्यादा लोकप्रिय १५ नगरों में भारत का कोई शहर नहीं है । ये तथ्य इस बात पर मंथन करने केलिए विवश करते हैं कि कैसे भारत में पर्यटन का विकास किया जाए ? क्या वजह है कि भारत में पर्यटकों की संख्या उतनी नहीं होती जितनी अपेक्षित है ? क्या प्रयास किए जाएं कि भारत में पर्यटन की तस्वीर बदल जाए ?ं पर्यटकों की आमद को कैसे बढाया जाए ?
दरअसल, पर्यटन को विकसित करने के लिए देश में शांति, सुरक्षा और अपराध मुक्त वातावरण जरूरी है । पर्यटक पहले सुरक्षा चाहता है, बाद में दर्शनीय स्थल । उसे धन और जान-माल की सुरक्षा का मजबूत भरोसा चाहिए । भारत में निरंतर बढ़ रही आतंकवादी गतिविधियां, विविध प्रकार के खौफनाक अपराध, जनसुविधाओं का अभाव, बिजली आपूर्ति, सडकों और यातायात साधनों की खस्ताहालत विदेशी पर्यटकों का मोहभंग कर देती है । महिला पर्यटकों के साथ छेडछाड़, बलात्कार और लूटपाट की घटनाओं ने भी पर्यटन को प्रभावित किया है । कई ऐसे स्थल भी हैं जहां पर्यटकों की गैरजानकारी का लाभ उठाकर उनसे अधिक पैसा वसूला जाता है । कई बार पर्यटकों के साथ अभद्र व्यवहार भी किया जाता है । यह सब ऐसे कारण हैं, जो पर्यटकों को भारत आने से रोकते हैं ।
इसलिए जरूरी है कि ऐसा माहौल बनाया जाए जिससे पर्यटक भारत आने के लिए लालायित हों । जिन स्थानों पर पर्यटन का विकास होता है, वहां आर्थिक समृद्धि आती है । अनेक बेरोजगारों को रोजगार मिलता है । होटल, रेस्टोरेंट और टे्रवल कंपनियों की आमदनी बढती है । उन्नति का परिणाम यह होता है कि वे अपराध अपने आप घटने लगते हैं जिनके पीछे कुछ आर्थिक कारण होते हैं । पर्यटन के नए स्थल विकसित करने से उनकी आर्थिक तसवीर बदलने की पूरी संभावना रहती है । भारत की संस्कति का विस्तार होता है । इस सब बातों को ध्यान में रखते हुए जरूरी है कि पर्यटन के े विकास पर ध्यान दिया जाए । सरकार और जनता मिलकर आतंकवाद और अपराधों पर अंकुश लगाएं। देश में पर्यटकों के लिए सुविधाएं बढाई जाएं ताकि उन्हें कोई असुविधा न हो । वह निर्भीक पूरे देश के मनमोहक स्थलों पर विचरण कर सकें । ऐसा होने पर विदेशी मुद्रा की आवक बढेगी और देश की आर्थिक उन्नति होगी ।
(फोटो गूगल सर्च से साभार )

Wednesday, September 24, 2008

महापुरुषों का यह कैसा सम्मान ?

मंगलवार ो जम्मू े मुबार मंडी ांप्लेक्स में राष्टï्रपिता महात्मा गांधी ी प्रतिमा े गले में रस्सी बांधर रोशनी े लिए लाइट लटा दी गई । ए समारोह ी तैयारियों में जुटे टेंट हाउस के र्मचारी बापू ी प्रतिमा पर चढ़ गए । उनंधे और सिर पर पैर भी रखे गए । उफ ! महापुरुषों ी प्रतिमाओं ी यह दशा । समझ में नहीं आता ि जब हम प्रतिमाओं ा पूरा सम्मान ही नहीं र पा रहे हैं तो फिर उन्हें स्थापित रने से क्या लाभ? पूरे देश में जगह-जगह महापुरुषों ी प्रतिमाएं लगी हुई हैं । ई स्थानों पर देखरेख े अभाव में प्रतिमाएं गंदगी से घिरी रहती हैं । उनी सफाई ी भी ोई व्यवस्था नहीं होती । विचार रना होगा ि इस हालत में प्रतिमाएं पूरे देश े लिए क्या संदेश देंगी ?
पूरी दुनिया में महापुरुषों ी प्रतिमाएं लगाई जाती हैं । भारत में भी बडी संख्या में महापुरुषों ी प्रतिमाएं स्थापित हैं । ोई शहर ऐसा नहीं जिसमें प्रतिमाएं न हों । प्रतिमा स्थापित रने े पीछे मंशा यह होती है ि समाज इनके आदर्शों से प्रेरणा ले । इन महापुरुषों े बताए मार्ग पर चलर समाज और देश े विास में योगदान दे । इसके लिए जरूरी है ि प्रतिमा स्थापना े बाद इनकी सफाई और सुरक्षा पर भी पूरा ध्यान दिया जाए । प्रतिमाएं खुद बदहाल स्थिति में रहेंगी तो ैसे दूसरों े लिए प्रेरणा जागृत र पाएंगी । अने प्रतिमाएं खुले में लगी हैं और मौसम ा मिजाज उने रंग-रूप ो बदरंग र देता है । ई बार उनी सुरक्षा न होने से भी अपमानजन स्थिति बन जाती है । ऐसे में यह सुनिश्चित रना होगा ि ैसे महापुरुषों ी प्रतिमाओं े सम्मान ी रक्षा ी जाए? उनी देखरेख ी भी पर्याप्त व्यवस्था होनी चाहिए । सुरक्षा और देखरेख ी जिम्मेदारी िसी होगी, यह प्रतिमा लगाते समय ही सुनिश्चित िया जाना चाहिए ।
महापुरुषों े जन्मदिवस ो भी पूरे देश में मनाया जाता है और इस दिन अवाश भी दिया जाता है ताि हम उने व्यक्तित्व और ृतित्व पर विचार रें । उने राष्ट्रहित में िए गए ार्यों ो याद रें । लेिन इस अवाश े मायने भी अब बदलने लगे हैं । ुछ संस्थाओं में ही महापुरुषों के े जन्मदिवस पर महज औपचारि ार्य्रम होते हैं । अवाश पर लोगों ो महापुरुष याद आने के े बजाय दूसरे ाम या ार्य्रम याद आते हैं और वह उनमें व्यस्त रहते हैं ।
महापुरुषों े जीवन े विविध पक्ष नई पीढ़ी े लिए सदैव प्रेरणा ा माध्यम रहे हैं । इसीलिए पहले बुजुर्ग बच्चों ो महापुरुषों े संस्मरण सुनाया रते थे । अब एल परिवार में बच्चों ो यह संस्समरण वाचि परंपरा से सुनने ो नहीं मिल पाते । महापुरुषों ी जीवनियां सिर्फ पाठ्य्रमों में ही उन्हें पढऩे ो मिल पाती हैं क्योंि पुस्त खरीदने ी प्रवृत्ति भी परिवारों में घट रही है ? इस स्थिति में महापुरुषों के विषय में बहुत म जानारी बच्चों ो मिल पाती है । हमें विचार रना होगा ि बच्चे ैसे महापुरुषों े जीवन से जुडे विविध प्रसंगों से अवगत हों पाएंगे ?
समाज में जिस तरह से नैति पतन ी स्थितियां दिखाई दे रही हैं, जीवन मूल्यों ा अवमूल्यन हो रहा है, नई पीढ़ी में दिशाहीनता और भटाव ी स्थितियां दिखाई दे रही हैं, सांस्ृति मान्यताओं और परंपराओं से खिलवाड़ हो रहा है, उसे ध्यान में रखते हुए महापुरुषों े विचारों और आदर्शों ा प्रचार प्रसार रना होगा तभी समाज सही दिशा में चल पाएगा ।

Monday, September 22, 2008

संस्कृत को समृद्ध नहीं करेंगे तो संस्कृति कैसेे बचेगी?

संस्कृत सभी भारतीय भाषाओं की जननी है । देववाणी है, व्याप क्षेत्र में निवास र रहे जनमानस ी आस्था ा प्रती है । तमाम भारतीय पौराणि ग्रंथों ी रचना संस्कृत में हुई है, इसलिए इस भाषा े प्रति ए धार्मि श्रद्धा ा भी भाव है । भारतीय संस्कृति में हिंदू धर्म केे अनुयायियों े जन्म, विवाह से लेर मृत्यु त े तमाम र्मांड संस्कृत में ही संपन्न होते हैं । इस कारण इस भाषा े प्रति व्याप आदरभाव और भक्ति ी सीमा त ी अटूट आस्था है । भारतीय जनमानस ो सदियों से संजीवनी प्रदान र रहे वेदों ी ऋचाएं, भारतीय जीवन-दर्शन ा दर्पण श्रीमद्भगवद्गीता े श्लो और सभी पौराणि ग्रंथ संस्कृत में ही हैं । योग, ध्यान, भारतीय दर्शन और आयुर्वेद विदेशियों ो आर्षित रते हैं और इन विषयों से जुडी अने जानारियां संस्कृत में ही हैं । संस्कृत ी वैश्वि महत्ता भारतवासियों े लिए गौरव ा विषय भी है ।
विदेशों में भारतीय पुरोहितों, संस्कृत े विद्वानों और र्मांडी पंडितों ी मांग बढ़ी है । देश ी सीमाओं ो पार े जिन भारतवासियों ने विदेशों में अपना बसेरा बनाया है, उने लिए वहां संस्ार-र्म राने े लिए पंडितों ी जरूरत होती है । ऐसे में विदेश में संस्कृत ी पताा गर्व के साथ फहराने लगी है । लेिन यही अंतिम सत्य नहीं है ।
सच यह है ि आधुनि भारत में संस्कृत े विास े लिए उस तरह ाम नहीं हुआ, जैसा होना चाहिए था । संस्कृत पढऩे वालों े लिए न रोजगार े श्रेष्ठ अवसर उपलब्ध राए गए और न ही उसे प्रचार-प्रसार े लिए ठोस तरीे से ाम िए गए । जो संस्कृत विद्यालय देश में चल रहे हैं, उनी भी अपनी तमाम समस्याएं हैं । हीं अध्यापों ो वेतन नहीं है तो हीं भवन जर्जर पडे हैं । संस्कृत विद्यालयों ा आधुनिरण नहीं हुआ है । संस्कृत े विास े लिए गठित संस्थाएं आर्थि संट से गुजर रही हैं । संस्कृत पठन पाठन में भïिवष्य ी संभावनाएं घटने ारण उससे विद्यार्थियों ा मोहभंग हो रहा है ।
ऐसी हालात में जरूरी है ि संस्ृत ो प्रतिष्ठित रने और इस भाषा में डिग्री पाने वालों ो तरक्की े नए रास्ते खोलने े लिए ठोस दम उठाए जाएं । मौजूदा दौर में विषय ोई भी पढें लेिन ामाज में ंप्यूटर ए अनिवार्य जरूरत बन गया है । अधितर ंप्यूटरों पर अंग्रेजी में ाम िया जाता है । इसलिए संस्ृत े साथ ही अंग्रेजी ी जानारी अगर होगी तो और ैरियर संवारने में मदद ही मिलेगी । संस्कृत ी पढाई े साथ ंप्यूटर ी भी शिक्षा दी जाए ताि संस्कृत े विद्यार्थी आधुनि युग ी जरूरतों े अनुसार रोजगारोन्मुखी परिणाम दे सें । साथ ही ए अन्य भाषा ो सीखना भी उने लिए अनिवार्य र दिया जाए ताि वह उस भाषा क्षेत्र में संस्कृत ी महत्ता ो रेखांित र सें ।
संस्कृतसाहित्य ा अन्य भाषाओं में अनुवाद भी बडी संख्या में सुलभ राया जाना चाहिए । इससे उपभोक्तावादी इस युग में दूसरी भाषा े लोग संसृत ी महत्ता से परिचित होंगे । इसा लाभ संस्कृत से जुडे लोगों ो मिलेगा । संस्कृत ो पुराना गौरव वापस मिल गया तो भारतीय संस्कृति ी जडें और मजबूत होंगी । साथ ही भारतीय संस्कृति ो दुनिया में और विस्तार मिलेगा ।