Friday, February 26, 2010

अंग्रेजों की जमीन पर हिंदी के फूल खिले


-डॉ. अशोक प्रियरंजन
हिंदी भाषा और साहित्य से विदेशी भूमि भी आलोकित हो रही है। अंग्रेजी के लिए जाने जाना वाले इंग्लैंड तक में हिंदी के फूल खिल रहे हैं। यूरोप में हिंदी भाषियों की बड़ी संख्या है। भारतवंशी अनेक साहित्यकार विदेशों में हिंदी साहित्य सृजन कर रहे हैं। मेरठ में चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की ओर से १२-१४ फरवरी तक आयोजित अंतरराष्ट्रीय हिंदी संगोष्ठी में आए भारतवंशी हिंदी साहित्यकारों ने विदेशी भूमि पर हिंदी की गौरवशाली सृजनशीलता से साक्षात्कार कराया।
इजराइल से आए गेनाल्डी स्लम्पोर वहां के विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रोफेसर हैं। वह कई देशों में हिंदी शिक्षण का कार्य कर चुके हैं। उनकी हिंदी भाषा और साहित्य पर कई पुस्तकें हैं। उन्होंने बताया कि उनके देश में हिंदी सीखने की ओर रुझान है।
इंग्लैंड के नाटिंघम से आईं जया वर्मा की पहचान एक अच्छी कवयित्री के रूप में है। वह गीतांजलि बहुभाषी साहित्यिक समुदाय टैं्रथ की अध्यक्ष हैं। यह संस्था साहित्यिक गतिविधयों में सक्रिय है। संस्था की शुरुआत बर्मिंघम में १९९५ में हुई। नाटिंघम में २००३ में संस्था ने कामकाज प्रारंभ किया। यह संस्था हिंदी ज्ञान प्रतियोगिता आयोजित करती है जिसमें यूरोप, मास्को, यूक्रेन समेत कई देशों के विद्यार्थी भाग लेते हैं। इसके विजेता बच्चों को भारत भ्रमण के लिए भी भेजा जाता है। जया वर्मा ने १५ सालों तक नाटिंघम के कला निकेतन स्कूल में हिंदी का शिक्षण कार्य किया। त्रैमासिक हिंदी पत्रिका पुरवाई और प्रवासी टुडे भी इंग्लैंड से प्रकाशित होती हैं। सप्लीमेंटरी स्कूलों में यहां ए लेवल अर्थात् १२वीं तक हिंदी पढ़ाई जाती है। जया वर्मा के मुताबिक टीवी पर हिंदी के अनेक प्रमुख चैनल इंग्लैंड में देखे जाते हैं जिनकी हिंदी को लोकप्रिय बनाने में खास भूमिका है। इसके साथ ही गीतांजलि की ओर से इंग्लैंड के सात शहरों लंदन, बर्मिंघम, नाटिंघम, लेस्टर, यार्क और मेनचेस्टर में हिंदी कवि सम्मेलनों का आयोजन किया जाता है। कैंब्रिज, लंदन और योर्क यूनिवर्सिटी में बीए और एमए में हिंदी पढऩे वाले विद्यार्थी हैं।
कनाड़ा में बसी स्नेह ठाकुर के मुताबिक वहां हिंदी की स्थिति अच्छी है। वह छह वर्षों से त्रैमासिक पत्रिका वसुधा का संपादन व प्रकाशन कर रही हैं। संजीवनी, उपनिषद् दर्शन जैसी पुस्तकों की लेखिका स्नेह ठाकुर सद्भावना हिंदी साहित्यिक संस्था की अध्यक्ष हैं। यह संस्था हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए सक्रिय है। वहां से हिंदी अब्राड नामक समाचारपत्र का भी प्रकाशन होता है। मंदिरों में शनिवार को निजी प्रयासों से हिंदी स्कूल की कक्षाएं चलती हैं। विश्वविद्यालयों में भी हिंदी पढ़ाई जाती है।
मारीशस मेें बसे भारतीय मूल के डॉ. हेमराज सुंदर मोका स्थित महात्मा गांधी इंस्टीट्यूट से जुड़े हैं। वह वसंत और रिमझिम नामक पत्रिका का प्रकाशन भी करते हैं। इस इंस्टीट्यूट में एम फिल और पीएचडी तक की पढ़ाई होती है। हिंदी साहित्य सम्मेलन परीक्षाएं कराता है। डॉ. सुंदर के अनुसार मारीशस में माध्यमिक स्तर तक हिंदी पढ़ाई जाती है। लंदन यूनिवर्सिटी १२वीं तक की परीक्षा कराता है। आर्य सभा मारीशस भी धार्मिक परीक्षाएं कराता है। रेडियो पर २४ घंटे हिंदी के कार्यक्रम चलते रहते हैं। दूरदर्शन पर भी साहित्यिक कार्यक्रम और हिंदी फिल्में धडल्ले से चलती हैं। अलबत्ता हिंदी अखबारों की कमी खलती है। हिंदी जनता की भाषा के रूप में स्थापित है।

Saturday, February 13, 2010

मेरठ की माटी से महका साहित्य

-डॉ. अशोक प्रियरंजन
हिंदी के चर्चित हस्ताक्षर गिरिराज किशोर के साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित उपन्यास 'ढाई घर'की शुरुआत कुछ इस तरह होती है-'मेरा नाम भास्कर राय है। मैं उत्तर प्रदेश के पश्चिमी इलाके के एक पुराने खाते-पीते राय खानदान का अंतिम राय हूं। अब मेरे बाद कोई राय नहीं होगा। मेरे बच्चे हैं पर जिस आधार पर हम लोग राय हुआ करते थे, वह एक बड़ी जमींदारी थी। वह कभी की खत्म हो गई।' दरअसल इस उपन्यास में जिस अंचल को केंद्रबिंदु बनाकर कथा का ताना-बाना बुना गया है, वह कोई और नहीं बल्कि मुजफ्फरनगर और मेरठ ही भूमि है। खड़ी बोली के लिए जाने जाना वाला मेरठ अंचल ही इस बहुचर्चित उपन्यास में जीवंत रूप में दिखाई देता है। मेरठ अंचल की परंपराएं, मान्यताएं और रीति रिवाज इस उपन्यास में हैं। प्रमुख पात्रों के संवाद खड़ी बोली में हैं और इसमें कौरवी के भी शब्दों का प्रयोग किया गया है। इस उपन्यास में मेरठ और यहां के कुछ प्रमुख स्थलों के विषय में भी जानकारी दी गई है। इस साहित्यिक कृति में मेरठ कालेज और बुढ़ाना गेट का जिक्र है। उपन्यास के मुख्य पात्र हरिराय के शब्दों में-'मेरठ कॉलेज में भी साथ ही साथ पढ़े थे। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उस समय दो ही बड़े कॉलेज थे। एक शायद आगरा कॉलेज आगरा और दूसरा मेरठ कॉलेज मेरठ। आगरा का सेंट जान्स भी पुराने कॉलेजों में में है। पूरी कमिश्नरी के लड़केमेरठ ही पढऩे जाते थे। तब मेरठ कॉलेज इंटर तक था। लेकिन था काफी बड़ा। ' इसी क्रम में वह आगे बताते हैं कि, 'बुढाने दरवाजे पर एक मशहूर पान लगाने वाला था। वह उस जमाने में सौ-सौ रुपये का कुश्ते वाले पान बनाता था। रईस लोग अपनी ऐय्याशी को सही सलामत रखने के लिए उसका पान खाते थे।Ó गिरिराज किशोर के उपन्यास 'लोग' और 'जुगलबंदी' में भी मेरठ अंचल धड़कता दिखाई देता है।
उर्दू के मशहूर कथाकार सआदत हसन मंटो ने अपनी कलम से अनेक बेहतरीन कालजयी चरित्रों की रचना की है। ऐसा ही एक चरित्र मंटो ने रचा और उसका नाम रखा-मेरठ की कैंची। मंटो के १० कहानियों का संग्रह मेरठ की कैंची नाम से प्रकाशित हुआ है। इसकी प्रमुख कहानी मेरठ की कैंची की नायिका के बारे में वह लिखते हैं, '---अब पारो रोज स्टूडियो आने लगी। बहुत हंसमुख और मीठी आवाज वाली तवायफ थी। मेरठ उसका वतन था जहां वह शहर के करीब-करीब हर रंगीन मिजाज रईस की मंजूरे नजर थी। उसको ये लोग मेरठ की कैंची कहते थे। इसलिए कि वह काटती थी और बड़ा महीन काटती थी।' आगे वह लिखते हैं, '---पारो में आम तवायफों जैसा भड़कीला छिछोरापन नहीं था। वो महफिलों में बैठकर बड़े सलीके से बातें कर सकती थी। इसकी वजह यही हो सकती है कि मेरठ में उसके यहां आने-जाने वाले ऐरे-गैरे नत्थू -खैरे नहीं होते थे। उनका संबंध सोसाइटी के उस तबके से था जो नाशाइस्तगी की तरफ सिर्फ तफरीह की खातिर मायल होता है।'
हिंदी के प्रमुख साहित्यकार अमृतलाल नागर का उपन्यास 'सात घूंघट वाला मुखड़ा' मेरठ केसरधना की बेगम समरू को केंद्र में रखकर लिखा गया है। कालजयी उपन्यासकार आचार्य चतुरसेन शास्त्री के उपन्यास 'सोना और खूनÓ केदूसरे भाग में १८५७ की क्रांति के दौरान मेरठ अंचल में लोगों की शहादत का वर्णन किया गया है। यह भी बताया गया है कि कैसे पंजाब से आकर विस्थापितों ने मेरठ और उसके आसपास के इलाके में शरण ली। डॉ. सुधाकर आशावादी ने भी अपने उपन्यास 'काला चांद' में मेरठ का वर्णन किया है।

Sunday, February 7, 2010

मेरठ में तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय हिंदी संगोष्ठी 12 से


-डॉ. अशोक कुमार मिश्र
भारत का हृदयस्थल पश्चिमी उत्तर प्रदेश। इसी का सबसे महत्वपूर्ण शहर है मेरठ। पूरी दुनिया में यह शहर कई कारणों से मशहूर रहा है। अंगेजों के जमाने में इसी शहर से आजादी की लड़ाई की शुरुआत हुई। सन् 1857 की क्रांति का उद्गम स्थल माना जाना वाला यह शहर एक गौरवशाली अतीत को समेटे है। इसी शहर में लगता है नौचंदी मेला जो सांस्कृतिक विरासत और सांप्रदायिक एकता का प्रतीक है। राजधानी दिल्ली के निकट स्थित यह शहर कभी कैंची के लिए मशहूर रहा तो कभी खेल के सामान के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता रहा है। कभी इस शहर का नाम दंगे के कारण लोगों के जेहन में आया तो कभी विक्टोरिया पार्क जैसे हादसे के चलते चर्चा में आया। वजह कोई भी रही शहर हमेशा विश्व मानचित्र पर अपनी पहचान बनाए रहा।
अब हिंदी साहित्य जगत में भी यह शहर खास पहचान बना रहा है। इसका श्रेय जाता है विश्वविद्यालय में चल रहे हिंदी विभाग और इसकेअध्यक्ष डॉ. नवीन चंद्र लोहनी को। डॉ. लोहनी ने अपनी आधुनिक सोच से न केवल विद्यार्थियों में हिंदी के प्रति आत्मगौरव जागृत किया बल्कि उन्हें जमाने के साथ कदमताल करने केलिए तैयार भी किया। विभाग में आधुनिक कंप्यूटर लैब, मल्टीमीडिया लैब, पुस्तकालय और सुसज्जित संगोष्ठी कक्ष है जिसकी विद्यार्थियों के लिए व्यापक उपयोगिता है। इसके साथ ही विद्यार्थियों के ज्ञानवर्धन के लिए समय-समय पर विशेषज्ञ विद्वानों केव्याख्यान भी डॉ. लोहनी कराते रहे हैं। हिंदी के प्रचार प्रचार केलिए कई बड़े कार्यक्रम विभाग की ओर से आयोजित किए गए हैं।
इसी क्रम में इस बार डॉ. लोहनी अब तक का सबसे बड़ा आयोजन करने जा रहे हैं। विभाग की ओर से १२ से १४ फरवरी 2010 के मध्य 'भूमंडलीकरण के दौर में हिंदी, विषय पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की जा रही है जिसमें देश-विदेश के अनेक विद्वान, शोधार्थी, हिंदी साहित्य के मर्मज्ञ और मीडिया से जुड़े लोग भाग ले रहे हैं। इस संगोष्ठी में 'अङ्क्षहदी भाषी राज्यों में हिंदी, 'प्रवासी क्षेत्रों में हिंदी, 'विदेशी लेखकों द्वारा हिंदी लेखन और प्रसार, 'हिंदी का लेखन और हिंदी साहित्य जैसे सत्र आयोजित किए जाएंगे। जिन लोगों में हिंदी के प्रति अनुराग है, उनके लिए इसमें भाग लेना सुखद अनुभव होगा, ऐसा विश्वास है। हालांकि पूर्व में स्वीकृति के उपरांत ही संगोष्ठी में भाग लेना संभव होगा। भाग लेने केलिए १० जनवरी तक सूचना भेजी जा सकती है।
प्रतिभागिता हेतु संपर्क करें-
प्रो० नवीन चन्द्र लोहनी , विभागाध्यक्ष हिन्दी
चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ ।
nclohani@gmail.com, nclohani@yahoo.com
Phone & fax-01212772455, +919412207200
अन्य फोन नंबर एवं वेब पते-
विवेक सिंह ( शिक्षण सहायक)
गजेन्द्र सिंह ( शिक्षण सहायक)
+9258040773 ,9359770328

Friday, November 13, 2009

घरेलू हिंसा से लहूलुहान महिलाओं का तन और मन


-डॉ. अशोक प्रियरंजन
बेहतर जिंदगी और श्रेष्ठ समाज के लिए सबसे जरूरी चीज है संवेदना । संवेदना यानी दूसरे की वेदना को खुद भी महसूस कर पाना । संवेदना ही मनुष्यता को विस्तार देती है । पारिवारिक सदस्यों में परस्पर संवेदनशीलता जितनी ज्यादा होगी, रिश्ते उतने ही गहरे और मजबूत होंगे । मनुष्य संवेदनशील हो, परिवार संवेदनशील हो और समाज संवेदनशील हो, तो काफी कुछ परेशानियां और दुख खुदबखुद खत्म हो जाएंगे । लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं है । घरेलू हिंसा को लेकर जो ताजा सर्वेक्षण हुआ है, उसने परिवारों खास तौर से पति-पत्नी के रिश्तों में पैदा हो रही संवेदनशीलता की बड़ी खौफनाक तस्वीर पेश की है ।
वर्ष २००५ में बने घरेलू हिंसा निवारण अधिनियम को लेकर राष्ट्रीय महिला आयोग और लॉयर्स कलेक्टिव नामक संस्था ने एक सर्वे कराया । इस सर्वे के मुताबिक कोई भी राज्य ऐसा नहीं है, जहां घरेलू हिंसा से संबंधित मामले सामने नहीं आए हों । घरेलू हिंसा के उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक ३,८९२ मामले दर्ज किए गए, जबकि दिल्ली में ३,४६३ और केरल में ३,१९० मामले सामने आए। आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल में भी घरेलू हिंसा से संबंधित काफी मामले दर्ज हुए हैं ।
घरेलू हिंसा कोई नई नहीं है । सदियों से यह भारतीय समाज में प्रचलित है । घर की चाहरदीवारी में कैद महिलाएं तमाम जुल्म और ज्यादतियों को चुपचाप सह जाती हैं । वह इसे अपने जीवन की नियति मान लेती हैं । मारपीट करने वाला पति उनके लिए देवता बना रहता है । इन स्थितियों के बीच क्यों घरेलू हिंसा निवारण अधिनियम की जरूरत पड़ी ? दरअसल वक्त बदल रहा है । पहले महिलाएं इसलिए जुल्म सहती थीं क्योंकि उनका आर्थिक आधार होता ही नहीं था । पति की उनकी आर्थिक जरूरतों को पूरा करने का माध्यम था । अब महिलाएं स्वाबलंबी हो रही हैं । खुद अपने पैरों पर खड़ी हो रही हैं तो फिर क्यों पति का जुल्म बरदाश्त करें ? पहले शिक्षित लड़कियों और महिलाओं की संख्या कम थी ? लड़कियों को बाहर जाकर पढऩे लिखने की आजादी बहुत कम थी । अशिक्षा उनके आत्मविश्वास को इतना कमजोर कर देती थी कि वह कोई आवाज ही नहीं उठा पाती थीं । पति का जुल्म भी इसीलिए चुपचाप बरदाश्त करती थीं ।
अब लड़कियों और महिलाओं की जिंदगी में व्यापक बदलाव आ रहा है । वह पढ़ाई के लिए मनपसंद स्कूल-कालेजों में जा रही हैं । घर की दहलीज लांघकर नौकरी करने के लिए बाहर निकल रही हैं । आर्थिक रूप से भी मजबूत हो रही हैं। ऐसे में वह घरेलू हिंसा को क्यों सहन करें ?
गहराई से विचार करें तो पता चलेगा कि घरेलू हिंसा के मामलों का दर्ज होना अच्छा भी है और खराब भी । अच्छा इसलिए क्योंकि यह महिलाओं के साहस का भी प्रतीक है कि वह पति की ज्यादतियों का प्रतिकार कर रही हैं । अपने हक की लड़ाई के लिए आवाज बुलंद कर रही हैं । खराब इसलिए कि तमाम सामाजिक जागरूकता और शिक्षा के बाद भी घरों के अंदर ही अच्छा माहौल नहीं बन पा रहा। महिलाओं को यथोचित सम्मान नहीं मिल पा रहा । इतनी बड़ी संख्या में महिलाएं घरेलू हिंसा का शिकार हो रही हैं। वह हिंसा जो महिला के तन को ही नहीं मन को भी घायल कर देती है । सभ्य समाज के लिए घरेलू हिंसा कलंक की ही तरह है। इसे रोकने के लिए गंभीरता से प्रयास होने चाहिए ।
(फोटो गूगल सर्च से साभार)

Sunday, October 4, 2009

संस्कृत को रोजगार से जोड़ें

-डॉ. अशोक प्रियरंजन
सोमवार पांच अक्टूबर को संस्कृत दिवस है । वही संस्कृत जिसे देवभाषा माना गया । समस्त भाषाओं की जननी भी संस्कृत को ही कहा जाता है । इसी भाषा समस्त वेदों का ज्ञान समाहित है । संस्कृत भाषाओं के अनेक श्लोक जीवन का मार्गदर्शन करने में महती भूमिका निभाते हैं । 'यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवताÓ श्लोक भारतीय समाज में नारी की उच्चता को स्थापित करता है । 'परित्राणाय साधुनाम् विनाशाय च दुष्कृतांÓ श्लोक में संपूर्ण जीवन जीने का तरीका समाहित है । वेदों की ऋचाएं युगों-युगों से संपूर्ण मानव जाति के जीवन को दिशाबोध कराती हैं । संस्कृत का मूषक: शब्द हिंदी में मूस और अंग्रेजी में माऊस हो गया । यह तो महज एक उदाहरण है । ऐसे अनेक शब्द हैं जो संस्कृत से दूसरी भाषाओं ने अंगीकार किए ।
इतनी अर्थवत्ता वाली भाषा कैसे पिछड़ती चली गई ? इस पर चिंतन करके इसके विकास के बारे में विचार करना ही संस्कृत दिवस की सार्थकता होगी । दरअसल, जो भाषा रोजगार न दे सके, वह समाज के लिए अधिक उपयोगी नहीं रह पाती । संस्कृत के साथ यही हुआ । संस्कृत सिर्फ विद्यालीय अथवा विश्वविद्यालीय पठन-पाठन का हिस्सा बनकर रह गई । उसकी पुस्तकें शोध का विषय तो बनी पर आम जनता में अपनी जगह नहीं बना पाई । इसकी वजह यह रही कि संस्कृत की उच्च स्तर तक की पढ़ाई करने पर रोजगार के व्यापक अवसर सुलभ नहीं है । सिर्फ शिक्षक के रूप में ही सर्वाधिक रोजगार संस्कृत पढऩे वालों को मिलता है । कंप्यूटर पर भी संस्कृत भाषा का काम नहीं हो पाता है । यही वजह रही कि संस्कृत दुर्दशा का शिकार होती गई । अधिकतर संस्कृत विद्यालय भी बदहाल हैं ।
ऐसी स्थिति में जरूरी है कि इस वैज्ञानिक युग में संस्कृत भाषा में विज्ञान, तकनीक, कंप्यूटर, वाणिज्य संबंधी पुस्तकें होनी चाहिए ताकि संस्कृत के विद्यार्थी उनका अध्ययन कर श्रेष्ठ वैज्ञानिक और व्यवसायी बन सकें । संस्कृत में रोजगार केअवसर बढ़ाने की दिशा में प्रयास किए जाने चाहिए । इस तरह के प्रयास होंगे तो संस्कृत अपनी खोयी प्रतिष्ठा दोबारा हासिल कर लेगी ।
(फोटो गूगल सर्च से साभार)

Tuesday, September 22, 2009

उच्च शिक्षा में उपजे सवाल

-डॉ. अशोक प्रियरंजन
इलाहाबाद विश्वविद्यालय परिसर में नौ सितंबर को छात्रों ने जो तांडव मचाया वह शिक्षा और राजनीति के समीकरणों से जुड़े कई सवालों पर मंथन करने के लिए विवश करता है। छात्रसंघ बहाली की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे उग्र छात्रों ने वीसी दफ्तर पर पथराव किया, कई स्थानों पर तोडफ़ोड़ की। पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा। विश्वविद्यालय के आसपास के इलाकों में करीब डेढ़ घंटे तक छात्रों का यह तांडव चलता रहा। कई लोग घायल हुए। रैगिंग से परेशान होकर १५ सितंबर को लखनऊ के आजाद इंस्टीट्ïयूट ऑफ इंजीनियरिंग टेक्नोलॉजी में बीटेक प्रथम वर्ष की छात्रा पूनम ने कैंपस में छत से कूदकर जान दे दी। वास्तव में यह अराजक स्थिति है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग लगातार परिसरों में शैक्षिक वातावरण सृजन पर जोर दे रहा है लेकिन देश के अलग-अलग हिस्सों से विश्वविद्यालय परिसरों में हो रही ऐसी अराजक घटनाएं उसके मंसूबों पर पानी फेरती लगती हैं। बेहतर पढ़ाई के लिए पहली शर्त अनुशासन की होती है लेकिन परिसरों में इसकी कमी दिखाई देती है।
कभी छात्र राजनीति के चलते तो कभी शिक्षकों अथवा कर्मचारियों के आंदोलन के कारण विद्यार्थियों की पढ़ाई में बाधा पैदा हो जाती है। कुछ स्थानों पर शिक्षकों की कमी विद्यार्थियों केलिए परेशानी का सबब बन जाती है। कई विश्वविद्यालयों के छात्रावास भी असामाजिक गतिविधियों संचालित होने के कारण चर्चा में आए हैं। इन हॉस्टलों में पढ़ाई पूरी करने के बाद भी दबंग छात्र कई कई सालों तक जमे रहतेे हैं। नए छात्रों पर रौब गांठना, रैगिंग करना और उल्टे-सीधे काम करके अपना स्वार्थ सिद्ध करना ऐसे छात्रों का उद्देश्य होता है। मेधावी छात्र ऐसी स्थिति में हॉस्टल में अपनी पढ़ाई ढंग से नहीं कर पाते हैं।
वजह कुछ भी रही हो, लेकिन इन घटनाओं के संदर्भ और सूबे में विश्वविद्यालयों की स्थितियों को देखते हुए आज यह विचार करना नितांत जरूरी है कि कैसे परिसरों का माहौल ऐसा बनाया जाए जिससे विद्यार्थी पूरे मनोयोग से वहां पढ़ाई कर पाएं। आज ऐसी घटनाएं भी बढ़ी हैं जो ज्ञान केमंदिरों का माहौल दूषित कर रही हैं, उन्हें कैसे रोका जाए। मौजूदा दौर में उच्च शिक्षा में उपज रही चुनौतियों से जुड़े सवालों के जवाब तलाशने होंगे। यह विचार करना होगा कि क्या उच्च शिक्षण संस्थानों में पढ़ाई का बेहतर माहौल है? क्या छात्रों की मानसिकता पढऩे की है या उसमें कुछ भटकाव भी शामिल हो गया है? क्या शिक्षक वर्ग अपने दायित्वों का सही प्रकार निर्वाह कर रहे हैं? क्या मोटा वेतन लेने के बदले वह विद्यार्थियों को अच्छी तरह पढ़ा रहे हैं? क्या छात्र राजनीति विश्वविद्यालयों का माहौल बना रही है या बिगाड़ रही है? अभिभावक अपनी मेहनत की कमाई से जो मोटी फीस अपने बच्चों की पढ़ाई केलिए विश्वविद्यालय को देते हैं क्या उसके बदले में विश्वविद्यालय उन्हें वह ज्ञान दे पाता है जिसकी आकांक्षा लेकर वह आते हैं? क्यों नई पीढ़ी में कई बार डिग्री लेने के बाद भी निराशा की अधिकता और आत्मïिवश्वास की कमी होती है?
(फोटो गूगल सर्च से साभार)

Sunday, September 13, 2009

रोजगार और बाजार से जुड़ी हिंदी, जगा रही अपार संभावनाएं

-डॉ. अशोक प्रियरंजन
हिंदी के प्रति अब नजरिया बदल रहा है । अब तक अंग्रेजी इसलिए ज्यादा पढ़ी जाती थी क्योंकि उसे रोजगार दिलाने में सहायक माना जाता था । अब हिंदी भी रोजगार और बाजार से जुड़ रही है। ऐसे में हिंदी के विस्तार की अपार संभावनाएं पैदा हो रही हैं । इसलिए समय आ गया है कि अब हम हिंदी दिवस पर इस गौरवशाली भाषा की दुर्दशा को रेखांकित करने की बजाय इसके प्रयोग में शुद्धिकरण और मानकीकरण पर विचार करें । मौजूदा दौर में सर्वाधिक अखबार हिंदी के बिक रहे हैं । हिंदी चैनल देखने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है । रेडियो सुदूर अंचलों में हिंदी माध्यम से ही अपनी बात जनमानस तक पहुंचाता है । इन तीनों माध्यमों में बड़ी संख्या में हिंदी वाले रोजगार हासिल कर रहे हैं । पहले की तरह वे अल्पवेतनभोगी नहीं हैं बल्कि अच्छा वेतन प्राप्त कर रहे हैं । सरकारी विभागों में हिंदी अधिकारी और अनुवादक जैसे पद सृजित हुए हैं । प्रतियोगी परीक्षाओं में हिंदी के माध्यम से कामयाबी की कहानी लिखी जा रही है । भारतीय प्रशासनिक सेवा में हिंदी विषय ने अनेक प्रतियोगियों का बेड़ा पार किया। विदेशों में हिंदी के प्रति रुझान बढ़ रहा है। अनेक विदेशी विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ाई जा रही है ।
हिंदी भाषी बाजार भी संभावनाएं जगा रहा है । विदेशी कंपनियों को अपने उत्पाद भारत में बेचने केलिए हिंदी में विज्ञापन बनाना मजबूरी है । हिंदीभाषियों तक उत्पाद की गुणवत्ता बताने के लिए उन्हें वही अधिकारी तैनात करने पड़ रहे हैं जो हिंदी जानते हैं । कई टेलीविजन चैनलों ने इसी बाजार के दबाव में अंग्रेजी का चोला बदलकर हिंदी को अपनाया। सरकारी कामकाज में भी हिंदी का बोलबाला बढ़ रहा है ।
ऐसे में हिंदी को और विस्तार देने के लिए प्रयास करने होंगे । उसे सिर्फ साहित्य की भाषा के दायरे से बाहर निकालकर विज्ञान, तकनीक, वाणिज्य आदि विषयों से जोडऩा होगा । ऐसे तमाम विषयों का पठन-पाठन हिंदी में होने लगे तो हिंदी का परचम पूरे देश में लहराने लगेगा। हिंदी की पुस्तकें पढऩे और खरीदने की प्रवृत्ति भी विकसित करनी होगी । हिंदी पुस्तकें पढऩे का संस्कार विकसित हो गया तो भाषा का पक्ष काफी मजबूत होने लगेगा ।
अव वक्त है कि हिंदी भाषा को शुद्ध लिखने, पढऩे और बोलने की ओर ध्यान केंद्रित किया जाए । ईमेल, एसएमएस और इंटरनेट पर हिंदी लेखन में बढ़ रही अशुद्धियों को रोकने पर विचार किया जाए । हिंदी को रोमन लिपि में लिखने की बढ़ती प्रवृत्ति नहीं रोकी गई तो देवनागरी लिपि को खतरा पैदा हो जाएगा । हिंदी को राष्ट्रीय भाषा मानकर इसके प्रति समर्पण भाव जागृत करने की दिशा में काम किया जाए । ऐसा होने पर हिंदी पढऩा लिखना प्रत्येक व्यक्ति के लिए सम्मान का विषय होगा । हिंदी जनमानस के जीवन और कर्म से जुड़ेगी,तभी हिंदी अपना वास्तविक गौरव हासिल कर पाएगी ।
(चित्र गूगल सर्च से साभार)