Saturday, May 30, 2009

फेल होने पर खत्म नहीं हो जाती जिंदगी

डॉ. अशोक प्रियरंजन
ऐसा पहली बार नहीं हुआ। हर साल परीक्षाफल आने के दिनों में ऐसा ही होता है। फेल होने पर कई छात्र-छात्राएं जिंदगी से मुंह मोड़ लेते हैं। इस बार यह संख्या कुछ ज्यादा महसूस हुई। शनिवार ३० मई को हाईस्कूल में फेल होने पर मेरठ शहर में ही तीन छात्राओं ने अपनी जान दे दी। जिन आंखों ने अभी पूरी तरह सपने भी नहीं सजाए थे, वे हमेशा के लिए बंद हो गई। इन मासूमों की मौत उनके परिजनों के लिए कभी न मिटने वाला दर्द दे गईं। ऐसे में सहज ही यह सवाल खड़ा हो जाता है कि क्या जिंदगी से बड़ा है कैरियर का ग्राफ? क्या फेल हो जाने मात्र से ही बंद हो जाते हैं जिंदगी के सारे रास्ते? क्या फेल होना इतना अपमानजनक है कि जिंदगी ही दांव पर लगा दी जाए? इन सवालों के जवाब तलाश करने के लिए वैचारिक मंथन जरूरी है।
एक कड़वा सच यह है कि देश में हर साल करीब २४०० छात्र परीक्षा के तनाव या फिर फेल होने पर खुदकुशी कर लेते हैं। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह यह है कि आज अभिभावक बच्चों से पढ़ाई और करियर को लेकर बहुत अधिक उम्मीदें रखने लगे हैं। माता-पिता की अपेक्षाओं पर खरा उतरने के लिए वह जी-तोड़ मेहनत भी करते हैं लेकिन कई बार वह अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर पाते हैं तो निराशा में आत्महत्या कर लेते हैं। परीक्षा में फेल होने वाले बच्चों की खुदकुशी केपीछे यही मानसिकता होती है।
अलबत्ता आत्महत्या की बढ़ती घटनाएं विद्यार्थियों के जीवन में बढ़ रही निराशा, संघर्ष करने की घटती क्षमता और जीने की इच्छाशक्ति की कमी की ओर भी संकेत करती हैं। मौजूदा समय के भौतिकवादी माहौल ने लोगों की महत्वाकांक्षाओं और अपेक्षाओं को काफी बढ़ा दिया है। अभिभावक परीक्षा के अंकों को जिंदगी से जोड़ देते हैं। अधिक अंक का पाने का सपना टूटता है और अपेक्षाएं पूरी नहीं होती हैं तो विद्यार्थी जिंदगी से ही मायूस हो जाते हैं। इसीलिए छात्र-छात्राओं में आत्महत्या की घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं।
ऐसी स्थिति में अभिभावकों और शिक्षकों का दायित्व है कि वे बच्चों में आत्मविश्वास, जीवन के प्रति दायित्वबोध और आगे बढऩे का भाव जागृत करें। उन्हें बताएं कि अंक कम आने मात्र या फेल हो जाने से जिंदगी में आगे बढऩे की प्रक्रिया खत्म नहीं हो जाती। हर बच्चे में कुछ प्रतिभा होती है। शिक्षकों और अभिभावकों को बच्चे की उस प्रतिभा को पहचानकर उसके आगे बढऩे का रास्ता बताना चाहिए। इससे बच्चे में आत्मविश्वास पैदा होगा और यही आत्मविश्वास उसमें जिंदगी के प्रति मोह भी पैदा करेगा।
(फोटो गूगल सर्च से साभार)

39 comments:

ARVI'nd said...

sahi kaha aapne... kadi pratispardha ke es daur me bachho me jo tanaav paida ho raha hai uske jimmedar ham sab bhi hai...jispar hame sochne ki jarurat hai.... family aur society esko kam karne ya mitane ke liye mahatvapurn role ada kar sakti hai

Season said...

ur right.. Failure is an even not a person.. that reminds me abt mr.anupam kher.. As he told once that in his high school he got failed, his father simply took the entire family for a nice dinner, and when anupam asked him that why is he celebrating his failure.. His father replied him because i wanted u to learn the celebration of failure also. This way u will be more cautious next time n will giv ur best to get a definite success.. i think the best way is school should take an initiative and before the result they should arrange some counselling sessions for the students as well as for their families.. but being in media we only can create awareness and give suggestions.. which u did pretty well..

M VERMA said...

आपने ज्वलंत समस्या उठाया है. आपके उठाये प्रश्न पर विचार आवश्यक है. करियर जिन्दगी से बडी तो नही.

Prem Farrukhabadi said...

जिन्दगी करियर से बडी होती है हमेशा यह जीवन में ध्यान रखना चाहिए.
आपका लेख सराहनीय है.

sandhyagupta said...

Sahmat hoon aapki baat se.

दिगम्बर नासवा said...

बहुत ही सामयिक लेख है आपका...........परंतु माँ बाप भी शायद आने वाले वक्त को देख कर ऐसा करने को मजबूर हो जाते हैं.......बहुत से बच्चों का पता ही नहीं चलता की वो मेहनत कर के नम्बर नहीं ला पा रहे या.......... मेहनत से जी चुराते हैं और इसी के चलते ज्यादा दबाव हो जाता है............... पर आपने समस्या वाजिब उठाई है.............शायद शिक्षा तंत्र में भी इस बात का समाधान हो...........पर इस बात की गंभीरता को समझते हुवे आपका सुझाव उत्तम है..........

राज भाटिय़ा said...

आप का सुझाव बहुत ही अच्छा है, मेने कई क्या बहुत से मां बाप को देखा है जो अपने बच्चो को साफ़ कहते है कि अगर इस बार फ़ेल हुये या फ़िर नम्बर कम आये तो हमे अपना मुंह मत दिखाना, या इस घर के दरवाजे हमेशा के लिये तुमहरे लिये बन्द है.बच्चा कुछ ओर बनाना चाहता है लेकिन मां बाप का दबाब कि तुम वोही बनो जो हम चाहते है, ओर इस दबाब के चलते भी बच्चा कभी कभी यह कदम ऊठा लेता है, अगर सभी मां बाप आप के सुझाव को समझे तो अच्छा है.कल पछताना ना पडे.
धन्यवाद

shama said...

Ashokji,
Bade dinon baad aapko apne blogpe dekh behad prasannata hue...! Shukrguzar hun, zarranawazee aur hausalaafzayee ke liy..

Apka aalekh padha...balik, isi wishayko leke ek 15 mins kee shrt film banaeke vichar me hun..lekin merei is samay parathmikta hai<" Under the Shadow Of Terror"...aatankwad aur Indian Evidence Act colunm 25/27 ko ujagar karna chahtee hun...kayi sach jo dabe pade hain, unhen lalkaarna chati hun...ke ab maine apna jeeven deshke naam likh diya hai...
In agrezon ke samayke bane qanoonon se jab tak ham mukt nahee hote, duniyame aatank jaaree rahega..is qaanoon kee aadme bharat aur padosi deshme aatankwaadee panapte hain...aur asar pooree duniyape hota hai..maine kafee gehrayeese pichhale dino abhays kiya hai..Dr Dharamveer commission ki report padhee hai..dang hun, supreme court kaa pichhale 29/30 salonse anadar ho raha hai, baharatkee jantaako khabar tak nahee..!
Mere " Lalitlekh" is blogpe saaree jaankaaree hai...samay mile to awashya padhen!

shama said...

http//lalitlekh.blogspot.com

Ye URL hai...is qaanoonko maddenazar rakh, ek kahaneebhee likhee hai, jo shoddisa is traimasikme prakashit huee hai..wo "kahanee" blogpe milegee.

Mere khayalse ab in qanoonon se muktee pana ye aazadeekee doosaree jang hai...apne aapko is jang me badahee akela pa rahee hun..!Kahanee blog kaa alagse link detee hun..
ssnehadar sahit
shama

shama said...
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shama said...

http//shama-kahanee.blogspot.com

Ye kahanee blogka URL hai.

Behad mehnat kar rahee hun, in vishayon ko leke...police aur nyay wyawthake jurisdiction ko leke, saamne lana chahti hun, kin qanoonon ne antargat suraksha yajnake haath baadh rakhe hain!

Padhe likhe log tak ye baten nahee jante..ab blame game bohot ho gaya, hamare deshke apnee apnee taurse ham khud mehnat nahee karenge,to agla aatankee hamla door nahee...aur sochtee hun, mai akeli kitne fronts pe morcha sambhal sakti hun?

स्वप्न मंजूषा शैल said...

डाक्टर साहब,
पहले तो हार्दिक अभिनन्दन कि आपने इस ज्वलंत समस्या को उजागर किया है | आज जिन्दागी की होड़ में सभी फर्स्ट आना चाहते हैं |
कहते हैं ना:
"दुनिया में एक ही काबिल बच्चा है और वह सभी के पास है "
हमारा समाज कुछ अलग किसिम का है, जहाँ हम अपने लिए कम दूसरों के लिए ज्यादा जीते हैं | यह एक चक्रव्यूह है और समस्या यहीं से शुरू होती है | जिस दिन माँ-बाप बच्चों को खुद की जिम्मेवारी लेने के लिए छोड़ देंगे , इस समस्या में काफी कमी आजायेगी, हमें अपने बच्चों पर भरोसा करना चाहिए, आज की पीढी हमारी पीढी से बहुत ज्यादा समझदार और विकासशील है | जरूरत है उन्हें जिम्मेदारी सौंपने की
हमें अब बंद करना होगा "अपने सपने बच्चों कन्धों पर लादना"
ये होड़ बच्चों की नहीं है, उनके माँ-बाप की है और इस होड़ में हमारे बच्चे हलाक हो रहे हैं | प्रतिस्पर्धा की भावना एक हद तक होना सही होता है, लेकिन अगर ज़िन्दगी की कीमत पर होती है तो कहीं न कहीं कुछ गलत है, और इसके जिम्मेदार सिर्फ और सिर्फ माँ-बाप हैं, हर बच्चे की क्षमता होती है और उसकी यह क्षमता के अनुसार माँ-बाप को उसके जीवन की रणनीति तैयार करनी चाहिए , यही मेरे व्यक्तिगत विचार हैं
आदर सहित
स्वप्न मंजूषा

Surbhi said...

आपका लेख अत्यंत सम सामयिक लगा. आज हर माँ बाप बच्चे को सिर्फ प्रथम आते देखना चाहते हीऔरबच्चों को बचपन से ही ताकीद किया जाने लगता है. ऐसे में बच्चे जब फेल होते हैं या कम नंबर आते हैं तो माँ बाप एवं समाज से मिलने वाले तिरस्कार झिड़की के डर से उल्टे सीधे कदम उठा बैठते हैं. आज सभी को समझने की जरुरत है की बच्चे की योग्यता उसके लाये नंबर नहीं बल्कि उसका एक काबिल, जिम्मेदार इंसान बनने से है.

Surbhi said...
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Shikha Deepak said...

आपका लेख पढ़ा......सही कहा है आपने। शिक्षा का अर्थ मात्र डिग्रियां अर्जित करना ही नहीं है। मैंने एक परिवार को ऐसी ही त्रासदी झेलते बहुत करीब से देखा है।

shikha varshney said...

Ashok ji
sarvprtham badhai esi jwalant samasya ko ujagar karne ke liye.
bilkul sahi kaha hai aapne...career jindgi se bada to nahi....par iske jimmedar bachhcon ke ma baap hi nahi ..vo bhi majoor hote hain apne bachhcon ke bhavishya ko lekar na chahte hue bhi unhen is andhi doud main daudna padta hai....balki jimmedar hai hamare desh ki shiksha vyavstha.jiske chalte 80% ank lane wale kshatr ka koi bhavishya nahi to ek fail kshatr to apne aap ko hi nirasha ki gart main chala jayega....is samasya ka samadhan hamari vyavstha main nihit hai or iske liye ham abhivavkon ko milkar hi koshish karni hogi.

योगेन्द्र मौदगिल said...

हाय री विडम्बना...!!!

Shamikh Faraz said...

bahut sahi prerna dayak lekh hai aapka. aapse guzarish hai k agar aap k pas koi prerna se bhari kavita ho to mere blog par bheje.

www.salaamzindadili.blogspot.com

alka sarwat said...

प्रिय बन्धु
जय हिंद
साहित्य हिन्दुस्तानी पर पधारने के लिए धन्यवाद
आपने सही लिखा ,फेल होने पर आत्महत्याएं बढ़ती जा रहीं हैं इसका एक कारण वे ऊंचे-ऊंचे अनावश्यक सपने भी हैं जो परीक्षा देने के बाद छात्रों को दिखा दिए जाते हैं जैसे शादी, नौकरी, आदि
अगर आप अपने अन्नदाता किसानों और धरती माँ का कर्ज उतारना चाहते हैं तो कृपया मेरासमस्त पर पधारिये और जानकारियों का खुद भी लाभ उठाएं तथा किसानों एवं रोगियों को भी लाभान्वित करें

रंजना said...

यह बहुत बड़ी त्रासदी है की हमारे यहाँ आज भी जो शिक्षण शैली है,वह एक तरह से भेड़ों को हांकने वाले एक ही डंडे के सामान है....
आज यहाँ ऐसा कोई सुविधा या गुंजाईश नहीं की बच्चों के स्वाभाविक प्रतिभा की पहचान हो और उन्हें उनकी रूचि के क्षेत्र में ही आगे बढ़ने का प्रोत्साहन या अवसर मिले....
सब बच्चे एक सामान नहीं होते...सब अपने आप में अनूठे होते हैं,परन्तु उनके गुण को पहचानने वाला कोई नहीं.....
शिक्षा अर्थतंत्र के इर्द गिर्द घूमती है.....
बच्चों पर इतना अधिक दवाब होता है की असफलता उन्हें जान दे देने को उकसाती है....

अमीर खान ने " तारे जमीन पर " नाम की जो फिल्म बनायीं थी, इस मामले में मील का पत्थर है.....
इस समस्या पर यदि गंभीरता से नहीं सोचा गया तो यह त्रासदी कभी समाप्त नहीं होगी.

jamos jhalla said...

ashok ji ek arse ke baad blog par avtrit hone ke liye dhanyaavaad|hameshaa ki tarah is baar bhee aapne samsaamaayik jwallant samasyaa ko uthaayaa hai saadhuvaad|jhallevichaaraanusaar mandi ke is moujudaa dour mai jab hamse adhik pade likhe logon ki noukariyon par ghaatak talwaar latak rahee hai aise main board ki pareekshaa pass karke koun saa rang lag jaanaa hai|jab pareekshaa pass karke bhee bairozgaaron ki line mai lagnaa hai to phir beshkeematee jaan kyoon denee|vaise chaatron ko cheentee [ant]kaa udharan yaad rakhnaa chaahhiye jo kai dafe gir kar bhee kaamyaab ho jaatee hai|

रचना त्रिपाठी said...

आपने बहुत ही बढ़िया लिखा है। इस लेख से हर माँ-बाप को एक सीख मिलती है।
बच्चों के उपर कभी भी अपनी इच्छाएं थोपनी नही चाहिए। जीवन का मतलब एक अदद परीक्षा में फेल-पास होना नही होता है। मेरी समझ से जिन्दगी का मतलब संघर्ष होता है। हर माँ-बाप का यह कर्तव्य है कि वह अपने बच्चों के मन में आत्मविश्वास और संघर्ष करने की भावना का विकास करें।


. ,,,,,,,,,,,,,

Shefali Pande said...

ashok jee ...result har saal na jaane kitnon kee jaan le kar jate hain....dar lagta hai iske naam se...kyun nahin paas ya fail karna band kar detee hai sarkaar??

chashmebaddoor said...

परीक्षा फल आने पर टापर्स की चर्चा तो सब करते हैं, लेकिन फेल हो जाने वाले विद्यार्थियों की तरफ शायद ही किसी का ध्यान जाता हो। यह संभवत: सही है कि उनके फेल होने के पीछे उनका कम परिश्रम होगा, किन्तु इसमें पूरी शिक्षा व्यवस्था एवं शिक्षक दोनों बराबर के भागीदार हैं। जिस शिक्षा व्यवस्था में ट्यूशन सेंटर का धंधा ज़ोरों पर चल रहा है उसकी लचरता को आसानी से समझा जा सकता है। ये लेख विचारणीय है । साधुवाद।

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

आपने सही कहा है. घरों और विद्यालयों में मानसिक परिपक्वता का पाठ भी पढाया जाना चाहिए.

gargi gupta said...

bilkul theek haha aapne
main ap se sahmat hu

Renu Sharma said...

ashok ji , namaskar .
aapane bahut hi uchit mudda uthaya hai .
ummeed hai ki bachche avashy prbhavit honge .
renu ..

sheetal tewari said...

main aapki baat se poora ittefaq rakhti a hun ashok ji...mata pita bachon ko padne ke liye utsahit karein yeh achi baat hai par vo apne bache ka mansik star samajhkar unse apeksha rakhein tabhi bache bhi bina kisi dabav ke pariksha de payenge.....aur kum number aane ya fail hone par bhi niras nahin honge.dhanyavaad.

Babli said...

मुझे आपका ब्लॉग बहुत अच्छा लगा! बिल्कुल सही फ़रमाया आपने और बहुत ही सुंदर रूप से आपने विस्तार किया है! मुझे ये नहीं समझ में आता है कि लोग फ़ैल होने पर इतने कमज़ोर क्यूँ हो जाते हैं और खुदखुशी करने के आलावा और कोई बात ही नहीं सूझती! हर किसीने जन्म लिया कुछ करने के लिए न की हिम्मत हारने के लिए! अब तो मैं आपकी ग्यारहवी फोल्लोवेर बन गई हूँ इसलिए आती जाती रहूंगी!
मेरे ब्लोगों पर आपका स्वागत है!

नारदमुनि said...

parents apne adhure sapane bachcho se pura karwana chahte hai,jabki bachcho ke sapane kuchh alag hote hai. aise me kya hoga, bachcha na parents ke sapane pure kar pata hai na apne.fir yahi hoga.narayan narayan

Priya said...

sabhi log kafi kuch kah chuke hain.... isiliye bolne ke liye jayada kuch bacha nahi...... sakaratmakta ki aor le jata sunde lekh

Science Bloggers Association said...

सही कहा आपने, पर आजकल के बच्चों को ये बात समझ में आए तब तो।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

cartoonist anurag said...

bilkul sahi kaha aapne....

Neha said...

baat to sahi hai.....bacchon par abhibhavak kai baar acche numbar lane ke liye itna jor dete hainki unki raat-din bas ye sochte huye hi bit jaate hain ki yadi accha number nahi aaya to kya hoga?....unhe har wakt apne mata pita ke saath aur sahaare ki jaroorat hoti hai....jab we fel hote hai tab to unhe bhavnatmak sahaare ki bahut jaroorat hoti hai....lekin bahut kam abhibhavak hi aisa sahara apne bacchon ko dete hain.aaj to har ek apne bacchon ko safalta ke sabse unche paydaan me khada huya dekhna chahta hai aur iske liye bacchon par dala gaya dabaav unhe apni jaan dene jaisa kaam karne par bhi majboor kar deta hai....aaj koi bhi apne bacche ko ye sikhane ko taiyaar nahi hai ki safalta ka sacha ahsaas lene ke liye asafalta ek bahut accha madhyam hai.....aaj ke kai safal vyaktion ne bhi purv me kai asafaltaon ka samna kiya hai aur usse aage badhne ki prerna li hai.....maaf kijiyega vichaar kuch jyaada hi ho gaye,wise aapne is vishay ko apne lekh ke madhyam se ujaagar karne ka bahut hi saraahniy kaam kiya hai....badhaai

प्रकाश गोविन्द said...

काश ऐसी महत्वपूर्ण बातें बच्चों के
अभिभावक समझ पाते !

अत्यंत सार्थक व पठनीय पोस्ट !

शुभकामनाएं !

आज की आवाज

अपनीवाणी said...

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Prabin Jha said...

very nice thought sir

Prabin Jha said...

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