Monday, July 13, 2009

शिवभक्ति और आस्था का प्रवाह है कांवड़ यात्रा

-डॉ. अशोक प्रियरंजन
भगवान भोले शंकर की भक्ति, आस्था और श्रद्धा की प्रतीक है कांवड़ यात्रा । भोले के भक्त भगवान आशुतोष को प्रसन्न करने के लिए श्रावण माह में कांवड़ में पवित्र गंगाजल लाकर उससे भगवान आशुतोष का अभिषेक करते हैं । पिछले कुछ वर्षों में कांवड़ मेला विश्व के सबसे बड़े मेले के रूप में माना जाने लगा है । धार्मिक मान्यताओं के लिए पूरे विश्व में अलग पहचान रखने वाले भारतवर्ष के पश्चिमी उत्तरप्रदेश क्षेत्र में कांवड़ यात्रा के दौरान भोले के भक्तों में अद्भुत आस्था, उत्कट उत्साह और अगाध भक्ति के दिग्दर्शन होते हैं । कांवड़ यात्रा के दौरान राजमार्गों पर भगवा वस्त्रधारियों की अनंत श्रंखला बन जाती है । भोले बम के उद्घोष से राजमार्ग गूंजते रहते हैं । भीषण गर्मी में विषम परिस्थितियों कांवड़ लाने वालों में पुरुष, महिला और बच्चे सब शामिल रहते हैं । रंग-बिरंगी सजी कांवड़ों के संग भक्ति से झूमते श्रद्धालुओं का उत्साह देखते ही बनता है । कांवडिय़ों की सेवा के लिए लगने वाले शिविर जनमानस की सेवा भावना के प्रतीक हैं । कांवडिय़ों के लिए भोजन, जल, फल और रात्रि विश्राम की व्यवस्था इन शिविरों में होती है । विविध स्वयंसेवी संगठनों की ओर से आयोजित शिविरों में सेवा करके लोग स्वयं को धन्य महसूस करते हैं । कई बार लोगों के मन में सहज ही यह प्रश्न उठता है कि कांवड़ क्यों लाई जाती है ? भगवान आशुतोष के जलाभिषेक का क्या महत्व है ?
यूं तो कांवड़ यात्रा का कोई पौराणिक संदर्भ नहीं मिलता, लेकिन कुछ किवंदतियां हैं। ऐसी मान्यता है कि भगवान परशुराम दिग्विजय के बाद जब मयराष्ट्र (वर्तमान मेरठ)से होकर निकले तो उन्होंने पुरा में विश्राम किया और वह स्थल उनको अत्यंत मनमोहक लगा । उन्होंने वहां पर शिव मंदिर बनवाने का संकल्प लिया। इस मंदिर में शिवलिंग की स्थापना करने के लिए पत्थर लाने वह हरिद्वार गंगा तट पर पहुंचे । उन्होंने मां गंगा की आराधना की और मंतव्य बताते हुए उनसे एक पत्थर प्रदान करने का अनुरोध किया। यह अनुरोध सुनकर पत्थर रुदन करने लगे । वह देवी गंगा से अलग नहीं होना चाहते थे। गंगा मां की शीतलता त्यागने का विचार उनके लिए अत्यंत कष्टदायक था। इस पर भगवान परशुराम ने आश्वस्त किया कि जो पत्थर वह ले जाएंगे, उस पर शिवरात्रि को गंगाजल से अभिषेक किया जाएगा । इस दिन सदैव वह मंदिर परिसर में विराजमान रहेंगे । इस आश्वासन के बाद हरिद्वार के गंगातट से भगवान परशुराम पत्थर लेकर आए और उसे शिवलिंग के रूप में पुरेश्वर महादेव मंदिर में स्थापित किया । तब से ऐसी मान्यता है कि शिवरात्रि पर यहां गंगाजल से शिवलिंग का अभिषेक करने से शिव की कृपा प्राप्त होती है । इसी मान्यता के कारण शिवभक्त कांवडिय़े तमाम कष्टों को सहते हुए हरिद्वार से गंगाजल लाकर पुरा महादेïव में शिवलिंग पर अर्पित करते हैं । इस दिन यहां कांवडिय़ों का सैलाब उमड़ पड़ता है ।
आस्था का यह पर्व अब विराट रूप धारण कर चुका है। प्रतिवर्ष करीब एक करोड़ शिवभक्त कांवडिये हरिद्वार से जल लेकर आते हैं । अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति केलिए कांवड़ लाने वाले भोले के भक्त पुरा महादेव ही नहीं, अनेक शिवालयों में शिवरात्रि पर जलाभिषेक करते हैं। पुरा महादेव के बाद मेरठ में औघडऩाथ मंदिर की सर्वाधिक मान्यता है ।
इसी संदर्भ में एक तथ्य यह भी है कि भगवान आशुतोष देवी गंगा को ज्येष्ठ दशहरा को इस पृथ्वी पर लेकर आए थे। गंगा उनकी जटाओं में विराजमान हुईं। इसलिए भगवान शंकर को गंगा अत्यंत प्रिय हैं । गंगाजल के अभिषेक से वह अत्यंत प्रसन्न होते हैं । इसी के साथ दुग्ध, बेलपत्र और धतूरा अर्पित करने से भगवान आशुतोष भक्त पर प्रसन्न होते हैं और उस पर कृपा करते हुए मनोकामनाओं की पूर्ति करते हैं । श्रावण मास भगवान शिव की साधना का सर्वश्रेष्ठ समय है । इसीलिए श्रद्धालु श्रावण मास में सोमवार के व्रत रखते हैं और भगवान भोलेशंकर की आराधना करते हुए उनके प्रिय पदार्थ उन्हें अर्पित करते हैं। उत्तर भारत के पश्चिमी उत्तर प्रदेश क्षेत्र में श्रावण मास में शिवभक्ति का विराट रूप और आस्था का अनंत प्रवाह कांवड़ यात्रा के रूप में दृष्टिगोचर होता है ।
(फोटो गूगल सर्च से साभार)

14 comments:

Udan Tashtari said...

बेहतरीन जानकारीपूर्ण आलेख.

राज भाटिय़ा said...

आप ने बहुत सुंदर जानकारी दी, लेकिन ऎसी शिवभक्ति और आस्था किस काम जिस से से लोगो का काम ढप हो, ओर यह भगत लोग बात बात मै लडाई झगडॆ करे, फ़िर यह सारा कांवड का समान कहा जाता है ?कितने बांस के जंगल इस कांवड की बलि चढते है? कभी सोचा है.... इस लिये यह एक गलत तरह की शिवभक्ति और आस्था... अगर भगवान की पुजा करनी है तो उस के लिये समर्पन चाहिये इन कांवडियो मै कितनो के पास शांति ओर समर्पन है... बस देखा देखी कर रहे है सब...
धन्यवाद

Sonal said...

एक बेहतरीन लेख आपने लिखा है।

rachana said...

कांवड यात्रा से सम्बधित अच्छी जानकारी उपलब्ध कराई आपने.

Sadhana Vaid said...

काँवड़ यात्रा के सम्बन्ध में बहुत ज्ञानवर्धक है आपका आलेख । सुन्दर रचना के लिये बधाई और हम सबके ज्ञानवर्धन के लिये आपका धन्यवाद ।

संतोष कुमार सिंह said...

पिंकी इस देश की बेटी हैं जिसे कुछ दरिंदो ने इस हालात में पहुचा दिया हैं जहां से बाहर निकलने में आप सबों के प्यार और स्नेह की जरुरत हैं।

सुनीता शानू said...

हर-हर भोले...इसके अलावा बस और कुछ नही शिव शम्भू को प्रणाम...

sandhyagupta said...

Rochak jankari ke liye dhanywaad.

vandana said...

bahut hi gyanvardhak jankari di hai aapne ........jis katha ke bare mein nhi pata tha wo bhi bata diya.........shukriya.

Season.. said...

many thanks for this useful information..

नीरज जाट जी said...

अशोक जी, आप पहले ऐसे व्यक्ति हो, जो कांवड़ निंदा ना करके कांवड़ गुणगान कर रहे हो. नहीं तो पढ़े लिखे लोग, पैसे वाले लोग जो खुद को मानते हैं कि उन्ही की वजह से देश चल रहा है, अर्थव्यवस्था चल रही है, जी भरकर निंदा करते हैं.
मैं पांच बार कांवड़ ला चुका हूँ. इस बार भी लाया हूँ, अभी तक पैरों में छाले हैं. ब्लॉग पर भी कांवड़ के बारे में खूब लिखा है. तो अपने इस अनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूँ कि करोडों कांवडियों में अगर कहीं दो-चार वारदात हो जाती है तो कौन सा बड़ी बात है? कांवडिये कभी भी अन्य लोगों को तंग नहीं करते. फिर भी पता नहीं शहरों में रहने वाले क्यों इस पर उंगली उठाते हैं.
कांवड़ केवल शिवजी को प्रसन्न करने के लिए नहीं लाई जाती. भला हम मिटटी के खिलोने क्या करेंगे उसे प्रसन्न करके? वो तो सदा ही हम पर प्रसन्न रहता है, भगवान् भी कभी हमसे रुष्ट होता है???
हर साल ऐसे लोगों के मन में सांप लोटता है. मैं वास्तव में बहुत ही आक्रामक हो जाता हूँ, जब कोई हमारी इस संस्कृति की, इस परंपरा की निंदा करता है.
धन्यवाद आपका

नीरज जाट जी said...

राज भाटिया जी,
असल बात तो ये है कि कांवडिये अपनी पुरानी कांवडों को ही इस्तेमाल करते हैं. इससे बांस के जंगल पर कोई असर नहीं पड़ता. दूसरी बात, बांस का पौधा और जंगल बड़ी ही तेजी से पनपते हैं, अगले साल तक फिर वैसे के वैसे हो जाते हैं.
और यह कोई शिवभक्ति और आस्था नहीं है, यह तो एक संस्कृति है, परंपरा है.
लोगों का कोई भी काम ठप नहीं होता. चलो आप बताओ, आपका कौन सा काम कांवड़ के कारण रुक गया. या अपने किसी भी दोस्त से पूछ लो, किसी का कोई भी काम नहीं रुकता, ये तो सब कहने की बातें हैं.

Murari Pareek said...

कावड़ लाना या ऐसा कोई कोई भी कर्म कांड जिससे आपकी इच्छा सकती में वृद्धि होती है अच्छा है, पर आये साल दुर्घटनाए होती है घाटों पर ! कितने डूब कर मर जाते हैं | मंदिर में जाकर जलाभिषेक करते हैं | घर में रहने वाले बुजुर्गों को सुख दो उन्हें कष्ट मत दो | यही भगवान् हैं जिंदा इंसानों को नजरअंदाज करके मंदिरों में भटकने से भगवान् भी नाराज होते हैं |

संगीता-जीवन सफ़र said...

हमारी संस्कृति और परंपरा को भक्ति और आस्था के साथ आगे ले जाती कांवड यात्रा से सम्बधित ये आलेख ईश्वर में हमारी आस्था को दर्शाती है!सुंदर प्रस्तुती के लिये साधुवाद!