Tuesday, November 4, 2008

आतंकवाद, मंदी और क्षेत्रवाद से उपजा संकट

-डॉ. अशोक प्रियरंजन
आतंकवाद, मंदी और क्षेत्रवाद की समस्या ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया है । पूरी दुनिया सिर्फ मंदी को झेल रही है जबकि भारत के समक्ष इसके साथ ही दो और संकट आतंकवाद और क्षेत्रवाद लोगों की परेशानी का सबब बने हुए हैं । आर्थिक संकट के साथ ही जान-माल की हिफाजत का भरोसा भी शिथिल पड रहा है । कब नौकरी पर छंटनी की तलवार लटक जाए, कब कहीं बम विस्फोट हो जाए, कब क्षेत्रवाद का दानव मौत के घाट उतार दे, किसी को पता नहीं । यह हालात अस्थिरता और तनाव की स्थितियां पैदा कर रहे हैं । हर आदमी इन समस्याओं से व्यथित है । पूरे देश में एक अजीब किस्म का खौफ का माहौल बन रहा है जो लोगों को बेचैन किए है । मौजूदा दौर में उपजी समस्याओं पर गंभीर वैचारिक मंथन की जरूरत है ताकि इनका हल निकाला जा सके ।
आतंकवाद की समस्या देश में गंभीर होती जा रही है । दहशतगर्दों ने न जाने कितने घरों के चिराग बुझा दिए हैं और अनेक लोगों को ऐसे जख्म दिए जिनकी टीस वह जिंदगीभर सहने के लिए मजबूर हैं । बीते छह महीने में देश में ६४ सीरियल ब्लास्ट हुए हैं जिनमें २१५ लोग मारे गए और ९०० घायल हो गए । जयपुर, अहमदाबाद, बंगलूरू और दिल्ली के बाद आतंकवादियों ने ३० अक्तूबर को असम को निशाना बनाया । दहशतगर्दों ने गुवाहाटी, कोकराझार, बोंगाइगांव और बरपेटा में भीडभाड़वाले बाजारों में १३ सिलसिलेवार धमाके कर ६१ लोगों को मौत की नींद सुला दिया । विस्फोट में ४७० लोग घायल हुए हैं । वर्चस्व जाहिर करने के लिए अंजाम दी गई इस सनसनीखेज वारदात में शक की सुई हूजी आतंकियों की ओर है।
इस समय पूरी दुनिया एक गंभीर संकट से गुजर रही है । मंदी की मार ने लोगों का जीना मुहाल कर दिया है । मजबूत अर्थव्यवस्था वाले देशों के उद्यमी भी अपने यहां नौकरियों में कटौती करने के मजबूर हैं । अमेरिका में मंदी की सुनामी ने जो तबाही मचाई है उससे भारत भी अछूता नहीं है । एसोचेम की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक सात प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों में आगामी १० दिन में २५ फीसदी कर्मचारियों की छंटनी की आशंका है हालांकि बाद में यह रिपोर्ट वापस ले ली गई । बेरोजगारी की समस्या झेल रहे इस देश में मंदी से उपजी बेरोजगारी नई पीढी में हताशा और मायूसी ही लाएगी । कैरियर को लेकर जो सपने उन्होंने देखे हैं, उन पर ग्रहण लगता प्रतीत हो रहा है । ऐसे में उनके समक्ष चुनौतियां और बढ़जाएंगी । जटिल परिस्थितियों में कैरियर को आकार देना और अपने सुखद भविष्य की जमीन तैयार करना निसंदेह आसान काम नहीं है । नई पीढ़ी को एक नए उत्साह और दृढ संकल्पशक्ति के साथ शिक्षा और कैरियर से जुडे लक्ष्यों को पूरा करने के लिए मेहनत करनी होगी । अभिभावकों और शिक्षकों को उनका मार्गदर्शन करना होगा ।
मंदी के संकट के संग ही देश में क्षेत्रवाद ने गंभीर स्थिति पैदा कर दी है । पिछले कुछ अरसे से मराठी क्षेत्रवाद के नाम पर मुंबई में जिस तरह उत्तर भारतीयों की हत्या की जा रही है, वह बहुत खतरनाक संकेत हैं । सपनों की नगरी मुंबई में जाने का ख्वाब पूरे देश के लोग देखते हैं । अभिनय, नाटक और विविध क्षेत्रों में अपनी प्रतिभाओं से लोगों को आकर्षित कर रहे लोग मुंबई जाकर नाम और पैसा कमाना चाहते हैं । देश की आर्थिक राजधानी होने के नाते मुंबई में रोजगार के व्यापक अवसर उपलब्ध हैं । रोजगार की तलाश में बडी संख्या में लोग मुंबई जाते हैं । मुंबई के भी लोग नौकरी अथवा अन्य व्यवसायों को करने के लिए देश के विविध भागों में जाकर अपनी किस्मत चमकाते है ं। देश में रोजगार के लिए अगर क्षेत्रवाद की दीवारें खींच दी जाएंगीं तो लोगों को आजीविका जुटाने में बडी कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा । इसलिए क्षेत्रवाद पर अंकुश लगाना जरूरी है।
(इस लेख को अमर उजाला कॉम्पैक्ट मेरठ के ३१ अक्तूबर २००८ के अंक में संपादकीय पृष्ठ पर भी पढा जा सकता है)
(फोटो गूगल सर्च से साभार)

30 comments:

सचिन मिश्रा said...

kash! jaldi mil jaye is sankat se nijat.

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा आलेख. बहुत अच्छा विश्लेषण!!

irdgird said...

हम बहुत खतरनाक स्थितियों की तरफ बढ़ रहे हैं। अगर भाषा और क्षेत्रवाद की राजनीति पर अंकुश नहीं लगा तो राष्‍ट्र की एकता नहीं बचेगी और हम एक बार फिर कबीलाई दौर में पंहुच जाएंगे।

Dineshrai Dwivedi दिनेशराय द्विवेदी said...

मूल झगड़ा अर्थव्यवस्था का है। वह संकट में आती है तो राजनैतिक व्यवस्था को भी संकट आता है। जनआक्रोश से बचने को व्यवस्था ही क्षेत्रवाद, आतंकवाद जैसी जनता को बांटने वाली प्रवृत्तियों को उपजाती है।

seema gupta said...

'oh, fir vhee bombblast or unse upje dard kee yadon ko taza kr gyee aapke ye post, "

regards

डॉ .अनुराग said...

एक टटपुन्जिये राजनेता को ये समाज नही रोक सकता ?

फ़िरदौस ख़ान said...

अच्छी तहरीर है...

nirmal gupt said...

regionalism nay is loktantrik vyvastha kay samnay anaik saval rakh diya hain.samsaya kay mool may jaye bina samadhan sambhav nahi.nirmal

makrand said...

bahut acchi pahal
regards

makrand said...

bahut acchi pahal
regards

jamos jhalla said...

Doctor saheb aapne rastra vibhaajan ke rog ke jo aatankwaad ,mandi aur chetra vaad roopi lakshan diagnose kiye ,jhalle vicharanusaar iskaa cure America president elect Obama ke chicago ke bhashan me hai | moujudaa dilon ke isthaan par kewal hindustani dil ko transplant kiyaa jana waqt ki maang hai |

विनीता यशस्वी said...

agar desh ke netao ke yahi haal rahe to mujhe nahi lagta hai ki is musibat se jaldi nijat mil payegi.

रंजना said...

sahi kaha aapne...aaj ke tathakathit netagan jati,dharm,bhasha aadi ke naam par jo vish faila rahe hain,wah atyant ghatak aur chintajanak hai.
Par iske mitne ya kamjor padne ki koi sambhavna nahi dikhti.

Shalini said...

आर्थिक मन्दी के इस दौर मे जहा आम आदमी परेशान है....वहा राज जैसे नेताओ ने स्थिती को और भयावह बना दिया है। निश्चय ही देश कि वर्तमान स्थिती चिन्ताजनक है।

sareetha said...

आतंकवाद की समस्या विश्व व्यापी हो चुकी है । आर्थिक मंदी की मार भी किसी आतंकवाद से कम नहीं । सामयिक मुद्दे पर अच्छा आलेख ।

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

सम-सामयिक मुद्दा उठाने के लिए धन्यवाद!

योगेन्द्र मौदगिल said...

बिल्कुल सही कहा आपने.... सटीक व सामयिक.

Dr.Bhawna said...

बहुत सही कहा आपने...

अल्पना वर्मा said...

vartmaan sthiti sachmuch chintajanak hai aur agar samy rahtey na chetey to parinaam bhi bhyawah ho saktey hain---lekh mein samayik hai-achcha vishleshan kiya hai

sandhyagupta said...

In samasyaon ka mukabala karne ke liye saamuhik prayaas ki jarurat hai.

guptasandhya.blogspot.com

Abhishek said...

आतंकवाद और छेत्रवाद से पहले से ही त्रस्त इस देश में मंदी ने नै समस्याएं खड़ी कर दी हैं. कामना है जल्द सुधार दिखे. आशा है पिछली पोस्ट पर मेरी टिप्पणी को अन्यथा न लिया होगा आपने. स्वागत मेरे ब्लॉग पर भी.

संगीता-जीवन सफ़र said...

आतंकवाद,मंदी और क्षेत्रवाद की समस्या वास्तव मे बहुत ही गंभीर समस्या है/क्षेत्रवाद भंयकर भुल है जिसका केवल दुष्परिणाम ही हो सकता है/इस पर अंकुश लगाना अति आवश्यक है/

"Nira" said...

paata nahi kab is.se choo.tkara milega
kab jakar yeh tabhahi ka khel khatam hoga.

रंजना said...

सटीक विश्लेषण किया आपने.पर इसके रोकथाम के प्रयास का सामर्थ्य जिन हाथों में है,जब तक वे सक्रिय नही होंगे,कुछ सार्थक नही हो सकता.

प्रदीप मानोरिया said...

आपने यथार्थ को उकेरा हैं अपनी कलम से

बहुत लंबे अरसे तक ब्लॉग जगत से गायब रहने के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ अब पुन: अपनी कलम के साथ हाज़िर हूँ |

BrijmohanShrivastava said...

हम सब जानते है स्थिती खतरनाक है अंकुश जरूरी है तो फिर क्या सहित्यकार का यही काम है कि वस्तुस्थिति से लोंगों को अवगत करादें /एक मार्ग क्यों नहीं बतलाते -एक रास्ता क्यों नहीं दिखाते यह तो कहा कि ऐसा हुआ मगर ऐसा क्यों हुआ भविष्य में क्यों और कैसे न होगा ये बतलाना भी बुध्धी जीवी का काम है -अब आप कहें के कोई सुनता ही नहीं तो हम कहें तो सही ""हम कहे जाते हैं कोई सुन रहा हो या न हो "" मगर साहित्य कारों का तो ये आलम हो गया है के ""जमाना बडे शौक से सुन रहा था ,हामी सो गए दास्तां कहते कहते "

kkyadav said...

इतनी सारगर्भित प्रस्तुति के लिए साधुवाद !!

bahadur patel said...

bahut sundar. badhai.

shama said...

Bohot dilse apna dard wyakt kiya hai...har deshwaasee saath ho aapke, dua karte hun !
Kabhi fursat ho to mera likha," Pyarkee Raah Dikha Duniyako," ye lekh zaroor padhiyega...mujhe khushee hogee aur teen kavitayen jo ek shrinkhalakee taurpe hai...on line jawab dete hue likh dee thee, wo bhee padhen to shukrguzaar rahungee...inke sheershak hain" Kis nateejepe Pohonche","Khata kisne Kee"," Ek Lalakaar".

पल्लव said...

हालांकि दोनो ही समस्‍याएं, कहीं न कहीं एक दूसरे की पूरक हैं, अगर एक न हो तो दूसरी का आस्तित्‍व ही खतरे में पड् जाता है।
दूसरे आतंकवाद से निपटने का एक बेहतर विकल्‍प सैन्‍य या पुलिसिया बर्बरता में नही बल्कि सांप्रदायिक सौहाद्र में छिपा हुआ है।

आपका लेख अच्‍छा लगा ।