Wednesday, July 28, 2010

राष्ट्रमंडल खेलों में हिंदी प्रयोग के लिए होगा संघर्ष, प्रस्ताव पारित

-डॉ. अशोक प्रियरंजन
नई दिल्ली स्थित इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में 27 जुलाई की शाम जुटे हिंदीप्रेमियों ने एक स्वर में राष्ट्रमंडल खेलों में राजभाषा हिंदी का प्रयोग किए जाने के लिए संघर्ष करने का फैसला किया। इसे राष्ट्रीय अस्मिता का प्रश्न मानकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीयता की पहचान को प्रखर बनाने के लिए सर्वसम्मति से कुछ प्रस्ताव पारित किए गए। राजभाषा समर्थन समिति मेरठ, अक्षरम एवं वाणी प्रकाशन की ओर से आयोजित गोष्ठी पारित प्रस्ताव निम्नांकित हैं-
1. राजभाषा समर्थन समिति मेरठ एवं अक्षरम के संयोजन में एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिंमंडल जिसमें सांसद, पत्रकार, साहित्यकार शामिल होंगे गृहमंत्री, गृहराज्यमंत्री, दिल्ली की मुख्यमंत्री, राष्ट्रमंडल खेलों की आयोजन समिति के अध्यक्ष, खेल मंत्री से मुलाकात कर राजभाषा हिंदी के प्रयोग का प्रश्न उनके संज्ञान में लाएगा।
2. संसद व मीडिया में इस प्रश्न को उठाने के लिए सांसदों तथा मीडियाकर्मियों से संपर्क किया जाए।
3. राष्ट्रमंडल खेलों की वेबसाइट हिंदी में तुरंत बनाई जाए।
4. दिल्ली पुलिस और नई दिल्ली नगरपालिका द्वारा सभी नामपट्टों व संकेतकों में हिंदी का भी प्रयोग हो ।
5. राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान वितरित की जाने वाली सारी प्रचार सामगी हिंदी में भी तैयार की जाए।
6. राष्ट्रमंडल खेलों के आंखों देखे हाल के प्रसारण की व्यवस्था हिंदी में भी हो।
7. पर्यटकों व खिलाडियों के लिए होटलों व अन्य स्थानों हिंदी की किट भी वितरित की जाए।
8. उदघाटन व समापन समारोह भारत की संस्कृति व भाषा का प्रतिबिम्बित करते हों। सांस्कृतिक कार्यक्रम देश की गरिमा के अनुरूप हों। राष्ट्रपति , प्रधानमंत्री व अन्य प्रमुख लोग अपनी भाषा में विचार व्यक्त करें।
9. राष्ट्रमंडल खेलों में हिंदी के प्रयोग के लिए एक जनअभियान चलाया जाए और सरकार द्वारा सुनवाई न किये जाने पर जंतरमंतर व अन्य स्थानों पर धरने व प्रदर्शन की योजना बनाए जाए।
10. इस अवसर का उपयोग करते हुए राष्ट्रमंडल के देशों में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए कार्ययोजना तैयार की जाए।
कार्यक्रम में डॉ. रत्नाकर पांडेय , कलराज मिश्र, हुक्मदेव नारायण यादव, प्रदीप टमटा , राजेन्द्र अग्रवाल ( सांसद) पत्रकार डॉ. वेदप्रताप वैदिक, रामशरण जोशी, साहित्यकार डॉ. गंगा प्रसाद विमल, कमेट्रेटर जसदेव सिंह, रवि चतुर्वेदी, हिंदी सेवी महेश शर्मा, नारायण कुमार, प्रो. नवीन चंद्र लोहनी आदि ने अपने विचार व्यक्त किए। गोष्टी का संयोजन अक्षरम के अध्यक्ष अनिल जोशी ने किया।
(फोटो गूगल सर्च से साभार)

4 comments:

Neelu said...

meri shubhkamnaye aap sabhi k saath hai.. Main bahut door rahta hoon isliye aapke abhiyaan main shamil na ho pane ho bahut dukh hai..

राम त्यागी said...

अच्छा प्रयास है , पर और भी तरीके हो सकते हैं इस प्रयास के ...राष्ट्र मंडल खेल ही क्यूं हर स्तर पर प्रयास होना चाहिए ...और ये मामला राजनीतिक ज्यादा लगता है , क्या मंत्रियों और सांसदों के बिना ये यज्ञ आहूति नहीं लेगा ?

अनुनाद सिंह said...

प्रियरंजन जी,
यह प्रयास अत्यन्त स्तुत्य है। जागरूकता से ही भारतीयता बचेगी और भारत का गौरव बढ़ेगा।

अजय मलिक said...

यह प्रयास अगर राजनैतिक नहीं है तो अच्छा है। मेरा तो यह मानना है कि अंतर्राष्ट्रीय होने से पहले हमें राष्ट्रीय होना चाहिए। पहले अगर मैं अपने घर को बुहार लूँ और फिर बाहर कि सफाई के बारे में सोचूँ तो ज्यादा उपयोगी रहेगा। दिये तले का अंधेरा जीतना गहरा और घुप्प है वह दिये की लौ तक को लील जाने की ताक़त रखता है। यदि केवल हिन्दी भाषी ही हिन्दी को दिल से स्वीकार लें तो हर स्तर पर हिन्दी स्वयं छा जाएगी। फिर किसी प्रस्ताव, किसी संघर्ष की आवश्यकता ही नहीं बचेगी। हिन्दी की बात जब तक दिल, दिमाग और दो वक्त की रोटी से नहीं जुड़ेगी तब तक बहुत ज्यादा अपेक्षाएँ पालने से कुछ होने वाला नहीं है।